फिल्में देखना सबको अच्छा लगता है। कुछ घंटे की फिल्म को हम एक झटके में बेकार रद्दी या कूड़ा कहकर कूड़ेदान में डाल देते हैं और हाथ झाड़कर मूड आफ करके उठ जाते हैं लेकिन क्या आपने सोचा है एक फिल्म को आप तक लाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। कितना संघर्ष हताशा और निराशा होती है। करोड़ों रुपये दांव पर लग जाते हैं। एक फिल्म को बनाने में महीनों की मेहनत, खून-पसीना और करोड़ों रुपये का बजट दांव पर लगा होता है। लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि रिलीज से ठीक 24 घंटे पहले अगर फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट न मिले, तो मेकर्स पर क्या गुजरती होगी? भारतीय फिल्म इंडस्ट्री (Bollywood & Regional Cinema) इस समय एक ऐसे ही बड़े संकट और मानसिक संघर्ष से गुजर रही है।
हाल ही में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की ‘तत्काल सर्टिफिकेट सुविधा’ (Tatkaal Certification Facility) को पूरी तरह से बंद कर दिया है। इस फैसले के बाद फिल्म निर्माताओं के सामने अपनी फिल्मों को समय पर रिलीज करने की एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

क्या है पूरा मामला और क्यों बढ़ा फिल्म मेकर्स का संघर्ष?
दो साल पहले सेंसर बोर्ड ने ‘तत्काल’ स्कीम शुरू की थी, जिसके तहत तीन गुना फीस देकर फिल्मों का रिव्यू जल्दी करा लिया जाता था ताकि रिलीज डेट न टले। लेकिन अब इसे अचानक खत्म कर दिया गया है।
22 से 48 दिनों का लंबा इंतजार: > तत्काल व्यवस्था खत्म होने के बाद अब किसी भी फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट मिलने में 22 से 48 दिन का समय लग सकता है। फिल्म इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इतने लंबे इंतजार के कारण छोटे और बड़े बजट, दोनों ही तरह के निर्माताओं का गणित बिगड़ जाएगा।
“कोई जानबूझकर देरी नहीं करता…” – मेकर्स का दर्द
फिल्म प्रोड्यूसर्स का कहना है कि फिल्म मेकिंग का प्रोसेस बेहद पेचीदा होता है। कई बार वीएफएक्स (VFX) के काम में देरी हो जाती है, तो कई बार रिवाइजिंग कमेटी फिल्म में कुछ बदलाव (Cuts) करने को कह देती है। ऐसे में आखिरी वक्त पर ‘इमरजेंसी विंडो’ का होना बेहद जरूरी है।
हालिया उदाहरणों से समझें फिल्म इंडस्ट्री का संघर्ष:
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‘पराशक्ति’ (Parasakthi): इस फिल्म को लंबी खींचतान और रिवाइजिंग कमेटी की जांच के बाद रिलीज से महज एक दिन पहले सेंसर सर्टिफिकेट मिल सका। सोचिए, तब तक मेकर्स के करोड़ों रुपये थिएटर बुकिंग और एडवांस में फंस चुके थे।
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‘जन नायकन’ (Jana Nayagan): इस फिल्म की रिलीज तो कानूनी पचड़ों में ऐसी फंसी कि मेकर्स को मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। कोर्ट के दखल के बाद ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिल पाया।
‘तत्काल’ के दुरुपयोग पर सहमति, लेकिन ‘राहत का रास्ता’ जरूरी
CBFC के अंदरूनी सूत्रों और फिल्म गिल्ड्स के बीच इस बात को लेकर सहमति है कि पुरानी ‘तत्काल योजना’ का कुछ लोगों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा था। हर कोई शॉर्टकट अपना रहा था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए।

इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IMPPA) के अध्यक्ष अभय सिन्हा का मानना है कि तीन गुना ज्यादा फीस होने के कारण छोटे और क्षेत्रीय (Regional) फिल्म निर्माताओं पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा था।
फिल्म इंडस्ट्री की मांग: ‘इमरजेंसी कोटा’ दिया जाए
अब पूरी फिल्म इंडस्ट्री एक सुर में सरकार से गुहार लगा रही है कि ‘तत्काल’ न सही, लेकिन एक ‘सीमित इमरजेंसी कोटा’ (Emergency Clearance Route) जरूर बहाल किया जाए।
यह सुविधा केवल उन विशेष परिस्थितियों में दी जाए जहां:
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फिल्म कानूनी विवाद या कोर्ट केस में फंसी हो।
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पोस्ट-प्रोडक्शन या तकनीकी कारणों से अचानक देरी हुई हो।
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रिलीज डेट बिल्कुल नजदीक आ चुकी हो।
इसके लिए मेकर्स दस्तावेजी सबूत और सीनियर CBFC अधिकारियों की विशेष अनुमति का नियम बनाने के पक्ष में भी हैं। अब देखना यह है कि क्या मंत्रालय फिल्म निर्माताओं के इस करोड़ों रुपये के जोखिम और मानसिक संघर्ष को समझते हुए कोई बीच का रास्ता निकालता है या नहीं।
मूल खबर मिड डे से साभार








