वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

Collapse of Family Bonds: घर के भीतर पितृ सत्ता को चुनौती, प्रतिशोध और रक्तरंजित रिश्ते

Collapse of Family Bonds: टूटती दीवारें, दरकते रिश्ते, पितृसत्ता, प्रतिशोध और रिश्तों का रक्तरंजित विघटन

आज के अखबारों में छपी तीन खबरें केवल अपराध कथाएँ नहीं हैं; वे हमारे सामाजिक ढांचे में आई दरारों की भयावह गूंज हैं। पहली घटना लखनऊ के आशियाना क्षेत्र की है, दूसरी मुजफ्फरनगर की और तीसरी बलरामपुर जनपद की। तीनों में एक समान सूत्र है—संतान के हाथों पिता का अंत। पर कहानी केवल हत्या की नहीं, उस मानसिक और सामाजिक परिदृश्य की है जहाँ परिवार अब आश्रय नहीं, संघर्ष का अखाड़ा बनता जा रहा है।

1. जब महत्वाकांक्षा और दबाव के बीच संबंध मर जाते हैं

लखनऊ में 21 वर्षीय बेटे ने अपने पिता की हत्या कर शव के टुकड़े कर दिए। कारण—पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर दबाव। यह केवल एक घर का मामला नहीं है; यह उस मध्यमवर्गीय स्वप्न का अंधेरा पक्ष है जिसमें सफलता को जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना दिया गया है।
यहाँ पिता ‘अनुशासन’ का प्रतीक था, पुत्र ‘आत्मसम्मान’ और ‘स्वतंत्रता’ के नाम पर आक्रोश का। संवाद की जगह आदेश थे, और आदेशों की प्रतिक्रिया में जमा हुआ प्रतिशोध।

2. रोक-टोक से प्रतिशोध तक

मुजफ्फरनगर में दो बेटियों ने पिता की हत्या कर दी। एक 32 वर्ष की अविवाहित बेटी—जिसे लगता था कि पिता उसकी शादी नहीं कर रहे। दूसरी 16 वर्ष की—जिसे भेदभाव का अहसास था। नींद की गोलियाँ, चाकू के वार, और सुबह का सामान्य व्यवहार—यह केवल अपराध नहीं, मनोवैज्ञानिक विच्छेदन का उदाहरण है।

यहाँ प्रश्न पितृसत्ता का है—जहाँ पिता निर्णयकर्ता है, बेटियाँ निर्णय की वस्तु। पर त्रासदी यह है कि विद्रोह ने विमर्श का रास्ता नहीं चुना; उसने हिंसा को चुना।

3. रोज़मर्रा की झुंझलाहट से मृत्यु तक

बलरामपुर में एक बुजुर्ग पिता ने बेटे को गलत खानपान पर टोका। धक्का लगा, सिर जमीन से टकराया और जीवन समाप्त। यह घटना बताती है कि हिंसा हमेशा योजनाबद्ध नहीं होती; वह क्षणिक क्रोध में भी जन्म लेती है। शराब, असंतोष और आत्मसंयम की कमी ने एक परिवार को उजाड़ दिया।

क्या यह बीमारी है?

मनोविज्ञान बताता है कि जब व्यक्ति लंबे समय तक अपमान, अस्वीकृति या नियंत्रण का अनुभव करता है, तो भीतर ‘दबी हुई आक्रामकता’ (repressed aggression) पनपती है। यदि संवाद और सहानुभूति के रास्ते बंद हों, तो वह विस्फोटक हो सकती है।
पर केवल मनोविज्ञान से तस्वीर पूरी नहीं होती।

क्या यह स्वार्थ है?

आज का समाज व्यक्तिकेंद्रित हो चुका है। ‘मैं क्या चाहता हूँ’—यह प्रश्न ‘हम क्या हैं’ से बड़ा हो गया है। परिवार अब सामूहिक इकाई कम, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का मंच अधिक बन गया है। आर्थिक दबाव, सामाजिक तुलना और डिजिटल दुनिया में सफलता के आक्रामक मॉडल ने अपेक्षाओं को अस्वाभाविक बना दिया है।

पितृसत्ता बनाम संवाद

इन घटनाओं में पिता ‘नियंत्रण’ का चेहरा हैं—पढ़ाई का दबाव, शादी का निर्णय, खानपान पर रोक। परंतु संतान का प्रतिरोध भी संतुलित नहीं है; वह संवाद की जगह हिंसा चुन रहा है।
यह पितृसत्ता के विरुद्ध विद्रोह नहीं, बल्कि संबंधों के विघटन की पराकाष्ठा है।

https://x.com/Anviksiki/status/1814121240342188520?s=20

सामाजिक ताना-बाना क्यों छिन्न हो रहा है?

  1. संवाद का अभाव – घरों में बातचीत कम, निर्देश अधिक हैं।
  2. मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा – अवसाद, क्रोध, असुरक्षा को ‘जिद’ कहकर टाल दिया जाता है।
  3. परिवार का एकाकीकरण – संयुक्त परिवारों के टूटने से भावनात्मक संतुलन के स्तंभ कम हुए हैं।
  4. सफलता का दबाव – परीक्षा, करियर, विवाह—हर मोर्चे पर प्रतिस्पर्धा।

भविष्य की आहट

यदि परिवार संवाद की जगह नियंत्रण और प्रतिरोध की जगह हिंसा चुनते रहे, तो आने वाले वर्षों में ऐसे अपराध असामान्य नहीं रहेंगे।
हमें स्कूलों और घरों में भावनात्मक शिक्षा (emotional literacy) को उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी जितनी गणित और विज्ञान को देते हैं।
पिता को भी समझना होगा कि अधिकार का अर्थ भय नहीं है। और संतानों को भी यह सीखना होगा कि असहमति का समाधान हत्या नहीं है।

https://tesariaankh.com/politics-ghanti-bheetar-baj-rahi-hai-bjp-old-workers/

इन तीन खबरों को अलग-अलग पढ़ा जा सकता है, पर साथ रखकर देखें तो वे एक ही कथा कहती हैं—परिवार की दीवारें बाहर से नहीं, भीतर से दरक रही हैं।

घंटी सचमुच बाहर नहीं, भीतर बज रही है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

Leave a Comment

और पढ़ें