Ambedkar Jayanti Special: आज भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती है। यह अवसर केवल उत्सव का नहीं, बल्कि उन वैचारिक संघर्षों के पुनरावलोकन का भी है जिन्होंने आधुनिक भारतीय समाज की नींव रखी। हिंदी जगत में जब हम सामाजिक न्याय की चर्चा करते हैं, तो आचार्य किशोरीदास वाजपेयी और संतराम बी.ए. (जात-पाँत तोड़क मंडल) के बीच का वह प्रसिद्ध ‘शास्त्रार्थ’ याद आता है, जो ‘सुधा’, ‘माधुरी’ और ‘चाँद’ जैसी पत्रिकाओं के पन्नों पर दर्ज है।
दो ध्रुव: सुधार बनाम रूपांतरण
1930 के दशक का वह दौर वैचारिक उथल-पुथल का था। एक तरफ बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित संतराम बी.ए. थे, जो यह मानते थे कि जातिवाद की जड़ें हिंदू धर्मग्रंथों और वर्ण-व्यवस्था में हैं। दूसरी तरफ आचार्य किशोरीदास वाजपेयी थे—एक प्रखर व्याकरणाचार्य और सनातनी विद्वान, जिनका मानना था कि वर्ण-व्यवस्था एक वैज्ञानिक सामाजिक विभाजन है और दोष व्यवस्था में नहीं, बल्कि उसके विकृत अभ्यास (जातिवाद) में है।
टकराव के बिंदु: शास्त्र और परंपरा
वाजपेयी जी का तर्क अक्सर इस बात पर टिकता था कि “वर्ण गुण-कर्म पर आधारित है।” उन्होंने संतराम बी.ए. के उन तर्कों का डटकर विरोध किया जिसमें शास्त्रों को जलाने या त्यागने की बात कही गई थी। वाजपेयी जी का लेखन उस समय की उस ‘सनातनी सुधारवादी’ धारा का प्रतिनिधित्व करता था जो गांधी जी के करीब थी—वे अछूतोद्धार तो चाहते थे, लेकिन प्राचीन सामाजिक ढांचे को सुरक्षित रखकर।
इसके विपरीत, संतराम बी.ए. और अम्बेडकरवादी खेमा यह स्पष्ट देख रहा था कि बिना ‘वर्ण’ की सीढ़ियों को तोड़े ‘जाति’ का ऊंच-नीच खत्म नहीं हो सकता। वाजपेयी जी ने अपनी प्रखर भाषा में संतराम जी के तर्कों को ‘शास्त्रीय अज्ञान’ करार दिया, तो वहीं मंडल की ओर से इसे ‘ब्राह्मणवादी जड़ता’ कहा गया।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह टकराव केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का था। जहाँ वाजपेयी जी भाषा और संस्कृति की शुद्धता के प्रहरी थे, वहीं बाबा साहेब और उनके सहयोगी सामाजिक संरचना की शुद्धता के आग्रही थे।
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बाबा साहेब ने ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में जिस ‘मानसिक गुलामी’ का जिक्र किया, वाजपेयी जी के साथ हुए उस दौर के शास्त्रार्थ उसके जीवंत उदाहरण हैं। वाजपेयी जी जैसे विद्वान जहाँ ‘सुधार’ (Reform) की बात कर रहे थे, बाबा साहेब ‘रूपांतरण’ (Transformation) की मांग कर रहे थे।
निष्कर्ष
अम्बेडकर जयंती के इस पावन अवसर पर, किशोरीदास वाजपेयी और संतराम बी.ए. के उस तीखे विमर्श को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि वह हमें सिखाता है कि लोकतंत्र केवल सहमति का नाम नहीं है। समाज को आचार्य वाजपेयी जैसी भाषाई प्रखरता भी चाहिए और बाबा साहेब जैसी व्यवस्था-परिवर्तन की दृष्टि भी।
https://tesariaankh.com/sahitya-sanskriti-kalinjar-ki-rajnartaki-anchahi-itihas/
आज का भारत उसी विमर्श की उपज है, जहाँ शास्त्रों की मर्यादा और मनुष्य की समानता के बीच एक निरंतर संतुलन साधने की कोशिश जारी है। बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उन ऐतिहासिक असहमतियों से सीखें और एक ऐसे समाज की ओर बढ़ें जहाँ ‘वर्ण’ की दीवारें नहीं, बल्कि ‘मानवता’ के सेतु हों।
नोट: यह लेख उस कालखंड की पत्रिकाओं के वैचारिक रुझान और वाजपेयी जी की सनातनी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।








