उत्तराखंड के चमोली जिले में विष्णुगढ़-पिपलकोटी जलविद्युत परियोजना के लिए निर्माणाधीन एक सुरंग गुरुवार को ढह गई। कई श्रमिकों के सुरंग के अंदर फंसे होने की आशंका है। यह घटना चमोली के पिपलकोटी इलाके में हुई। चमोली के जिला मजिस्ट्रेट गौरव कुमार के अनुसार, घटना के समय लगभग 18 श्रमिक सुरंग के अंदर मौजूद थे। इस ताजा घटना ने एक बार सुरंग हादसों की याद को ताजा कर दिया है।
हादसे दर हादसे
अगर देखा जाए तो 2021 में चमोली जिले के तपोवन-विष्णुगाड में सात फरवरी की आपदा में सुरंगों में मलबा और पानी घुस गया था, जिसमें बड़ी संख्या में लोग फंसे और लापता हुए थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना ग्लेशियर/बर्फ-चट्टान से जुड़ी त्रासदी थी जब अचानक आई फ्लैश फ्लड और भारी मलबा सुरंग में घुस गया था। इसी तरह 2023 में सिलक्यारा-बड़कोट, उत्तरकाशी में 12 नवंबर को सुरंग का करीब 60 मीटर हिस्सा धंस गया था जिसमें 41 मजदूर फंस गए थे। यह हादसा कमजोर चट्टान, भूगर्भीय फाल्ट शीयर जोन में हुआ था, जिसमें रॉक डिफार्मेशन और निर्माण संबंधी कमियां सामने आई थीं। इससे पहले भी 2023 में सिलक्यारा-बड़कोट की परियोजना में 19-20 छोटे/मध्यम सुरंग धंसने के हादसे हुए थे।
संकेतों को नजरअंदाज करने की कीमत
इनकी वजह चुनौतीपूर्ण भूगर्भीय संरचना और सिग्निफिकैंट डिफार्मेशन बताया गया था। इसके बाद 2025 में विष्णुगाड-पिपलकोटी परियोजना में चमोली में निर्माण स्थल पर हुए भूस्खलन में आठ श्रमिक घायल हुए थे। 2026 में सिलक्यारा-बड़कोट, उत्तरकाशी सुरंग में पत्थर गिरने से एक 21 वर्षीय मजदूर की मौत हुई थी। इसकी वजह चट्टान/मलबा गिरना बताया गया था। घटना ने निर्माण-सुरक्षा पर सवाल उठाए थे। 2026 में ही विष्णुगाड-पिपलकोटी, चमोली सुरंग के भीतर दो लोको ट्रेनों की टक्कर, दर्जनों घायल हुए थे। हालांकि यह collapse नहीं था बल्कि tunnel-construction transport accident बताया गया था।
आखिर क्या कीमत चुकाएंगे हम
इस तरह सवाल सिर्फ सिलक्यारा के हादसे का नहीं, पहाड़ के भीतर बार-बार मिल रहे चेतावनी संकेतों का है—जब एक ही सुरंग पांच साल में करीब 20 बार धंसने का सामना कर चुकी थी तो उसे सामान्य मानने की कीमत आखिर कितनी बड़ी होनी चाहिए? यह एक बड़ा सवाल है।
सवाल ये भी है कि पहले के हादसों और चेतावनियों से क्या सीखा गया, और अगली घटना रोकने के लिए क्या बदला गया?
खतरे को नजरअंदाज करने का खेल
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में यह और महत्वपूर्ण है। अगर किसी सुरंग में वर्षों के दौरान बार-बार छोटे-मोटे धंसाव होते हैं, तो हर घटना को स्वतंत्र दुर्घटना मानकर फाइल बंद करना खतरे को नजरअंदाज करना हो सकता है। बार-बार घटनाएं होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि हर बार मानवीय लापरवाही हुई। हिमालय की भूगर्भीय परिस्थितियां वास्तविक और अत्यंत जटिल हैं। लेकिन यही कारण है कि बार-बार होने वाली घटनाओं को जोड़कर स्वतंत्र तकनीकी जांच और सुरक्षा का आकलन किया जाना चाहिए।
संयोग दर संयोग
अगर हर बार हादसा अलग है, तो क्या पहाड़ के भीतर लगातार मिल रहे संकेत भी अलग-अलग हैं? एक हादसा दुर्घटना हो सकता है, दो हादसे संयोग हो सकते हैं, लेकिन बार-बार मिलते समान संकेतों को क्या सिर्फ संयोग कहकर आगे बढ़ा जा सकता है?
इससे पहले जुलाई में सिक्किम में सुरंग में विस्फोट हुआ था तब मीडिया में यह बात आई थी कि अगर वे दुर्घटना से ठीक दस दिन पहले टेंडर जारी कर रहे थे, तो इसका मतलब है कि उन्हें मीथेन के भंडारों के बारे में पता था। लेकिन टेंडर जारी करने के बाद भी उन्होंने लापरवाही से काम जारी रखा। सुरंग को सुरक्षित बनाने तक काम रोक देना चाहिए था। यह बात एक विशेषज्ञ ने कही थी। इसी तरह उत्तराखंड में यह देखने की जरूरत है कि हादसे क्यों हो रहे हैं।
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