बुधवार को संसद के दोनों सदनों में जस्टिस यशवंत वर्मा महाभियोग जांच समिति की रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास पर कथित तौर पर बेहिसाब नकदी मिलने के मामले में उन पर लगे तीनों आरोप सिद्ध हो चुके हैं। तीन सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति की रिपोर्ट लोकसभा और राज्यसभा में संबंधित महासचिवों द्वारा प्रस्तुत की गई।
दो खंडों में पेश किये गए निष्कर्ष
जांच के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को शामिल करते हुए जांच समिति के निष्कर्ष दो खंडों में प्रस्तुत किए गए। न्यायमूर्ति वर्मा के विरुद्ध लगे आरोपों की जांच के बाद महाभियोग समिति ने मई में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपने निष्कर्ष सौंपे थे। समिति ने तीनों आरोपों को सिद्ध पाया। समिति के निष्कर्ष 14 मार्च, 2025 की रात को लगी आग के बाद न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास के एक भंडारगृह से भारी मात्रा में 500 रुपये के नोटों की बरामदगी पर केंद्रित हैं।
स्पष्टीकरण नहीं दे पाए जस्टिस वर्मा
रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति वर्मा भंडारगृह में नकदी के स्रोत, स्वामित्व या उपस्थिति के बारे में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे। समिति ने आग लगने के बाद भंडारगृह से संबंधित परिस्थितियों की भी जांच की। समिति ने पाया कि कमरे को ठीक से सील और निरीक्षण किए जाने से पहले ही उसमें गड़बड़ी हो गई थी, जिसके परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण साक्ष्यों को संरक्षित नहीं किया जा सका।
समिति ने आगे बताया कि न्यायमूर्ति वर्मा ने शुरू में आरोपों से इनकार किया, लेकिन बाद में कई वैकल्पिक सिद्धांत प्रस्तुत किए, जिनमें यह भी शामिल था कि नकदी को जानबूझकर रखा गया हो सकता है, कोई साजिश हो सकती है और अन्य लोग भी इसमें शामिल हो सकते हैं। हालांकि, समिति ने कहा कि इन स्पष्टीकरणों के समर्थन में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
कर्मचारियों के साथ बातचीत पर भी साइलेंस
जांच समिति ने आग लगने की घटना के बाद रात करीब 2 बजे कर्मचारियों के साथ न्यायमूर्ति वर्मा की हुई बातचीत पर भी विशेष रूप से सवाल उठाया। रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति वर्मा ने यह खुलासा नहीं किया कि बातचीत के दौरान क्या चर्चा हुई या क्या निर्देश दिए गए।
समिति ने पाया कि न्यायाधीश के बचाव पक्ष में महत्वपूर्ण संवाद की व्याख्या हेतु संबंधित कर्मचारियों से पूछताछ नहीं की गई। समिति ने रात 2 बजे हुई बातचीत का पूर्ण स्पष्टीकरण न दिए जाने के कारण प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला। समिति ने यह भी पाया कि नकदी को प्लांट करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने के आरोप में कोई एफआईआर या औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई थी।
और इसलिए निकाला ये निष्कर्ष
न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों का मूल्यांकन करते समय समिति ने एक अन्य कारक के रूप में बचाव पक्ष में संबंधित कर्मचारियों से पूछताछ न किए जाने को भी ध्यान में रखा। अपने अंतिम निष्कर्ष में, समिति ने निष्कर्ष निकाला कि न्यायमूर्ति वर्मा का स्पष्टीकरण टालमटोलपूर्ण, अपूर्ण और भ्रामक था।
पैनल ने कहा कि यह आचरण संवैधानिक न्यायालय के न्यायाधीश से अपेक्षित पारदर्शिता, निष्पक्षता और संस्थागत उत्तरदायित्व के अनुरूप नहीं था। ये निष्कर्ष तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति के इस निष्कर्ष के बाद आए हैं कि न्यायमूर्ति वर्मा का उस विशिष्ट भंडारगृह पर “सक्रिय या मौन नियंत्रण” था जहां नकदी मिली थी।
कब शुरु हुआ विवाद
जब यह विवाद सामने आया तब न्यायमूर्ति वर्मा दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। बाद में उन्हें उनके मूल न्यायालय, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया। जुलाई 2025 में, 200 से अधिक सांसदों ने न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए।
पिछले वर्ष अगस्त में, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति का गठन किया। अब रिपोर्ट औपचारिक रूप से संसद में पेश कर दी गई है, जिसमें समिति का यह निष्कर्ष दर्ज है कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप सिद्ध हुए हैं। न्यायमूर्ति वर्मा ने चूंकि इस्तीफा दे दिया है, और परिणामस्वरूप उनके खिलाफ निष्कासन की कार्यवाही लगभग निष्प्रभावी हो गई है। हालांकि, उनके इस्तीफे की सूचना अभी तक विधि मंत्रालय द्वारा नहीं दी गई है।








