अगर आप किसी के बहुत प्रिय हैं और वह आप से अपने कर्ज की गारंटी लेने को कहता है तो सावधान हो जाएं। मित्रता, रिश्तेदारी या संबंध अपनी जगह ठीक हैं लेकिन गारंटी लेना इस सबसे अलग है। चाहे संबंध खराब ही क्यों न हो जाएं लेकिन किसी की गारंटी लेने से पहले सौ बार सोच जरूर लें। वरना अगर कर्ज लेने वाले ने कर्ज चुकाने में आनाकानी की या नहीं चुकाया तो कर्जदार से पहले गारंटर से वसूली हो सकती है इस मामले में यह तर्क काम नहीं आएगा कि पहले कर्जदार से वसूली हो।
गारंटर से पहले कर्जदार से वसूली जरूरी नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कल एक फैसले में कहा है कि गारंटर से पहले कर्जदार से वसूली जरूरी नहीं है। अदालत ने यह भी कहा है कि मुख्य कर्जदार के समान ही होती है गारंटर की देनदारी। खंडपीठ ने कहा है कि भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 128 के तहत गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार के समान होती है। इसलिए बैंक मुख्य कर्जदार और गारंटर दोनों से एक साथ वसूली कर सकता है। बैंक को ऋण बकायेदार से कर्ज की वसूली के लिए पहले मुख्य कर्जदार से पूरी रकम वसूलना जरूरी नहीं है।
अब गारंटर कर सकता है मुख्य कर्जदार से वसूली का दावा
गारंटरों ने हाई कोर्ट में दलील दी थी कि बैंक को पहले मुख्य कर्जदार से बकाया वसूलना चाहिए और उसके बाद ही गारंटरों से वसूली की जा सकती है। हाई कोर्ट ने दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि संबंधित गारंटी अनुबंध में गारंटर की देनदारी को बाद के चरण तक टालने की कोई शर्त नहीं थी। कोर्ट ने गारंटर बने लोगों के वेतन से प्रतिमाह 10 हजार रुपये की कटौती को वैध ठहराते हुए दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं। साथ ही कहा कि गारंटर यदि ऋण चुकाता है, तो वह मुख्य कर्जदार से रकम की वसूली का दावा कर सकता है।
मामला ऋणधारक विक्रांत दुबे से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2022-23 में यूपी पोस्टल प्राइमरी कोआपरेटिव बैंक से 50 हजार रुपये का त्योहारी ऋण, तीन लाख रुपये का अल्प अवधि का कर्ज और 18 लाख रुपये का व्यक्तिगत ऋण लिया था। उनके सहकर्मी विनीत पांडेय और अनूप कुमार मिश्रा ने इन ऋणों की गारंटी दी थी। ऋण की अदायगी न होने पर बैंक ने डाक विभाग को दोनों गारंटरों के वेतन से प्रतिमाह 10 हजार रुपये काटकर बैंक में जमा करने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अभधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने विनीत पांडेय और अनूप कुमार मिश्र की दो याचिकाएं खारिज कर दीं।
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