न्यायपालिका से जुड़े मिडलमैन यानी वकीलों की भारी लाव लश्कर अब कानून और व्यवस्था के वाच डाग कहे जाने वाले पुलिस महकमे के रडार पर है। यह कदम हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा की गई काली भेड़ों की पहचान की सख्ती के बाद उठाया गया है।
वकालत पेशे की आड़ में आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वालों पर अब लखनऊ पुलिस ने शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है। काफी समय से वकीलों के खिलाफ अवैध कब्जे व आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की शिकायतें मिलती रही हैं। कोर्ट परिसर के अंदर मारपीट के भी तमाम मामले हो चुके हैं।
ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की सख्ती और अदालत परिसर में वकीलों के व्यवहार को लेकर दिए गए निर्देशों के बाद लखनऊ पुलिस ने वकीलों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों की जांच के लिए बने स्पेशल सेल को एक बार फिर सक्रिय कर दिया है। यह सेल काले कोट के पीछे छिपे हर चेहरे को बेनकाब करेगा। जो वकालत के पेशे को कथित तौर पर अराजक तत्वों के दबाव और संरक्षण के रूप में इस्तेमाल कर लगातार आपराधिक गतिविधियों में शामिल हैं।
आपको बता दें कि इस साल का सबसे गंभीर और व्यापक रूप से रिपोर्ट हुआ मामला लखनऊ जिला अदालत का था। आरोप है कि कुछ अधिवक्ताओं ने दिल्ली से आए तीन वकीलों और उनके मुवक्किल को अदालत परिसर में रोका, उनके साथ मारपीट की और धमकाया। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए रिपोर्ट मांगी। बाद में चार अधिवक्ताओं को अदालत परिसर में प्रवेश से रोक दिया गया और उनके खिलाफ खुफिया जांच के आदेश दिए गए। रिपोर्ट में चार नामजद वकीलों के अलावा 10-20 अज्ञात अधिवक्ताओं का भी उल्लेख है।
अगस्त माह में चंडीगढ़ में हाईकोर्ट के एक अधिवक्ता पर बेदखली की कार्रवाई के दौरान 57 वर्षीय महिला को गोली मारने का आरोप लगा है।
पंचकूला में जुलाई 2026 में एक अधिवक्ता के खिलाफ सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल ने FIR दर्ज कराई। आरोप था कि पारिवारिक विवाद की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता और उसके साथ आए करीब 10-17 वकीलों ने अधिकारी से मारपीट की, उसे कथित तौर पर एक चैंबर में ले जाकर पीटा, धमकाया और समझौते पर हस्ताक्षर कराने का प्रयास किया। हालांकि आरोपी अधिवक्ता ने आरोपों को खारिज करते हुए उल्टा सेना अधिकारी पर हमला करने का आरोप लगाया है।
इससे पहले मई में लखनऊ में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान जिला अदालत के आसपास वकीलों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई थी। करीब एक दर्जन वकील और पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस के अनुसार कुछ लोगों ने पथराव कर कार्रवाई रोकने की कोशिश की। वकीलों ने पुलिस पर बल प्रयोग का आरोप लगाया। यह मामला पूरी तरह “वकीलों की गुंडागर्दी” की श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों पक्षों पर आरोप लगे थे।
30 अप्रैल को इसी तरह एक अन्य वादी के साथ लखनऊ कोर्ट में मारपीट हुई थी और पुलिस की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। हाईकोर्ट ने पुराने मामलों और अदालत परिसर में कथित दबंगई की शिकायतों को भी रिकॉर्ड पर लिया।
जुलाई 2026 में अदालत के सामने कई अधिवक्ताओं की ओर से आरोप लगाए गए कि वकीलों का एक समूह दबंगई के जरिए संपत्तियां हड़पने, फर्जी दस्तावेज तैयार करने, फर्जी मुकदमे दायर कर जमीन कब्जाने और मुकदमेबाजों को डराने का काम करता है।
फरवरी 2026 में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने ग्रेटर कैलाश-I की एक करोड़ों की संपत्ति पर कब्जे की कथित कोशिश के मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें एक वकील भी था। पुलिस के मुताबिक गिरोह ने फर्जी दस्तावेज और सिविल मुकदमों का इस्तेमाल कर संपत्ति पर अपने दावे को वैध दिखाने की कोशिश की।
जुलाई 2026 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट को जमीन कब्जाने के मामले में नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया। आरोप है कि उसने सह-आरोपियों के साथ मिलकर फर्जी ट्रस्ट दस्तावेजों को वैध दिखाने और न्यायिक प्रक्रिया में हेरफेर करने की कोशिश की।
दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार यूपी बार काउंसिल ने पुलिस रिकॉर्ड में हिस्ट्रीशीटर या गैंगस्टर के रूप में चिन्हित वकीलों के लाइसेंस निलंबित करने का फैसला किया था। उस समय बार काउंसिल ने 98 वकीलों के खिलाफ स्वतः कार्रवाई की थी और 23 के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही चल रही थी। यह बताता है कि वकीलों के आपराधिक नेटवर्क से जुड़े होने का मुद्दा इतना गंभीर हो चुका है कि बार काउंसिल को लाइसेंस संबंधी कार्रवाई पर विचार करना पड़ा।
2026 में अब तक कम से कम दो ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें अधिवक्ताओं पर सीधे जमीन कब्जाने या कब्जे की साजिश में शामिल होने के आरोप लगे और अदालतों/पुलिस ने कार्रवाई की। इसके अलावा लखनऊ में वकीलों के एक कथित नेटवर्क पर फर्जी दस्तावेज और मुकदमों के जरिए संपत्ति कब्जाने के गंभीर आरोपों की हाईकोर्ट ने जांच शुरू कराई है।








