‘गोदी मीडिया’, ‘चाटुकार मीडिया’ या किसी भी अन्य नाम से पुकारा जाए, लेकिन यह प्रश्न अब गंभीर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन चुका है कि क्या देश का एक बड़ा युवा वर्ग मुख्यधारा की मीडिया से अपना भरोसा खो चुका है?
पिछले महीने देशभर में हुए युवा नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों ने केवल सरकार के प्रति असंतोष ही नहीं दिखाया, बल्कि मुख्यधारा की पत्रकारिता के प्रति बढ़ते अविश्वास को भी उजागर किया। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने टीवी पत्रकारों के खिलाफ नारे लगाए, कुछ जगहों पर उनके साथ दुर्व्यवहार और हिंसा की घटनाएं भी सामने आईं। लोकतंत्र में ऐसी हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती, लेकिन इन घटनाओं के पीछे मौजूद जनभावना को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर सहित कई शहरों में हुए प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों ने बड़े समाचार चैनलों पर पक्षपातपूर्ण कवरेज का आरोप लगाया। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ आंदोलन से जुड़े बैनरों में कुछ टीवी चैनलों को “भारत का सबसे बड़ा दुश्मन” तक कहा गया। यह भाषा निश्चित रूप से असहमति की स्वस्थ अभिव्यक्ति नहीं कही जा सकती, लेकिन यह उस गहरे अविश्वास की ओर संकेत जरूर करती है जो वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हुआ है।
कई छात्रों और युवाओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे अब अपनी खबरों के लिए पारंपरिक मीडिया के बजाय स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। उनका तर्क है कि मुख्यधारा का मीडिया अक्सर आंदोलनों को एक निश्चित राजनीतिक नजरिए से प्रस्तुत करता है, जबकि उनकी वास्तविक समस्याओं और मांगों को अपेक्षित स्थान नहीं मिलता।
जनविश्वास खोती पत्रकारिता
यह धारणा सही है या गलत, यह अलग बहस का विषय हो सकता है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि जब किसी बड़े वर्ग को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज पर्याप्त रूप से नहीं सुनी जा रही है, तब मीडिया और समाज के बीच विश्वास का संकट पैदा होने लगता है। पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं है; उसकी सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होती है। यदि वही कमजोर पड़ जाए तो सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होता है।
प्रदर्शनों के दौरान कुछ पत्रकारों पर हुए हमलों ने भी गंभीर चिंता पैदा की। टाइम्स नाउ के पत्रकार देव कोटक ने बताया कि दिल्ली में रिपोर्टिंग के दौरान भीड़ ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और हमला किया। मुंबई और पटना से भी पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार के वीडियो सामने आए। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में पत्रकारों पर हिंसा का कोई औचित्य नहीं हो सकता। असहमति का जवाब हिंसा नहीं, बल्कि तथ्यों और संवाद से दिया जाना चाहिए।
सवाल ये भी है
हालांकि इन घटनाओं ने एक दूसरे प्रश्न को भी जन्म दिया है—क्या भारतीय मीडिया का एक हिस्सा अपनी निष्पक्षता को लेकर जनता के बीच भरोसा बनाए रखने में सफल रहा है? वर्षों से मीडिया पर सत्ता के अधिक निकट होने, आलोचनात्मक सवालों से बचने और विरोध के स्वर को पर्याप्त स्थान न देने जैसे आरोप लगते रहे हैं। इन आरोपों को पूरी तरह सही या पूरी तरह गलत कहना आसान नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि जब ऐसे आरोप लगातार बढ़ते हैं तो मीडिया संस्थानों को आत्ममंथन करना पड़ता है।
पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता का प्रचार करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इसलिए कहलाता है क्योंकि उससे अपेक्षा की जाती है कि वह जनता और सरकार के बीच एक निष्पक्ष प्रहरी की भूमिका निभाए। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि मीडिया किसी राजनीतिक या वैचारिक पक्ष के अधिक निकट खड़ा है, तो उसका भरोसा स्वाभाविक रूप से प्रभावित होता है।
दूसरी ओर, यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता का सम्मान करे। किसी पत्रकार की रिपोर्टिंग से असहमति हो सकती है, लेकिन उसके साथ हिंसा लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। आलोचना का अधिकार सभी को है, पर हिंसा का अधिकार किसी को नहीं।
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आज भारतीय पत्रकारिता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है जहां उसे केवल दर्शकों की संख्या नहीं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता भी बचानी होगी। यदि मीडिया निष्पक्षता, तथ्यपरकता और जनसरोकारों को प्राथमिकता देगा तो विश्वास लौट सकता है। लेकिन यदि जनता और मीडिया के बीच यह दूरी लगातार बढ़ती रही, तो सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र और सार्वजनिक विमर्श को ही होगा।
(यह लेख लेखक के निजी विचारों पर आधारित एक संपादकीय है। इसमें व्यक्त मत लेखक के हैं और इन्हें स्थापित तथ्य या किसी संस्था का आधिकारिक दृष्टिकोण नहीं माना जाना चाहिए।)








