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पार्किंसन की आहट सालों पहले? इन संकेतों को न करें नजरअंदाज

पार्किंसन बीमारी को लेकर अब तक हमारी समझ बहुत सीमित रही है। जब भी इस बीमारी का नाम सामने आता है, तो अक्सर एक बुजुर्ग व्यक्ति की तस्वीर ध्यान में आती है, जिसके हाथ कांप रहे हों या जिसे चलने-फिरने में तकलीफ हो रही हो। लेकिन मेडिकल साइंस की ताजा रिसर्च इस पुरानी धारणा को पूरी तरह बदल रही है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि पार्किंसन की आहट शरीर में इसके मुख्य लक्षण दिखने से सालों पहले ही शुरू हो सकती है, और यह बीमारी हर इंसान पर एक ही तरह से असर नहीं डालती।

लक्षण सामान्य लेकिन मामूली नहीं

दरअसल, जब हाथ कांपने लगते हैं या शरीर में अकड़न आती है, तब तक दिमाग के कुछ खास हिस्से काफी हद तक प्रभावित हो चुके होते हैं। लेकिन नई रिसर्च बताती है कि पार्किंसन की जैविक प्रक्रिया इससे बहुत पहले ही शुरू हो जाती है। मिसाल के तौर पर, सपनों के दौरान असामान्य रूप से हाथ-पैर चलाना या सपनों को शारीरिक रूप से जीना (Sleep Behavior Changes), लंबे समय से सूंघने की क्षमता में कमी आना, और बिना किसी स्पष्ट कारण के कब्ज की शिकायत रहना जैसी समस्याएं इस बीमारी के बेहद शुरुआती और अप्रत्यक्ष संकेत हो सकती हैं। बेशक, इनमें से कोई भी लक्षण अकेले इस बात का सबूत नहीं है कि किसी को पार्किंसन ही है—क्योंकि ये सामान्य बीमारियों या उम्र बढ़ने के असर भी हो सकते हैं। लेकिन अगर ये बदलाव लगातार बने रहें और समय के साथ बढ़ने लगें, तो इन्हें अनदेखा करना समझदारी नहीं होगी।

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इस दिशा में एक बड़ा खुलासा नॉर्थवेस्टर्न मेडिसिन (Northwestern Medicine) के वैज्ञानिकों ने किया है। उन्होंने पार्किंसन से जुड़े ‘LRRK2’ नाम के जीन का अध्ययन किया और पाया कि न्यूरॉन्स (दिमाग की कोशिकाएं) के खत्म होने से बहुत पहले ही उनका काम करने का तरीका बिगड़ने लगता है। यानी अगर वैज्ञानिक इस शुरुआती बदलाव को ठीक वक्त पर पहचान लें, तो भविष्य में ऐसी दवाएं तैयार की जा सकती हैं जो बीमारी के लक्षण दबाने के बजाय उसकी रफ्तार को शुरुआत में ही धीमा कर दें।

जीन्स के हिसाब से थिरेपी की ओर कदम

इसके साथ ही, करीब एक लाख लोगों के आनुवंशिक आंकड़ों पर की गई एक अन्य अंतरराष्ट्रीय रिसर्च से पता चला है कि पार्किंसन से जुड़े जेनेटिक बदलाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों और आबादियों में भिन्न हो सकते हैं। भारत जैसे विविध देश के लिए यह खोज बेहद मायने रखती है, क्योंकि अब तक की ज्यादातर रिसर्च यूरोपीय आबादी पर ही केंद्रित रही हैं। यदि भारतीय आबादी को इन ट्रायल्स में सही प्रतिनिधित्व मिलता है, तो आने वाले समय में मरीजों को उनके जीन के हिसाब से ‘व्यक्तिगत इलाज’ (Personalized Treatment) मिल सकेगा।

घबड़ाएं नहीं समझें

फिलहाल, इस रिसर्च का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आम लोग घबराकर बिना वजह जेनेटिक टेस्ट कराने लगें। अभी ऐसा कोई सामान्य ब्लड टेस्ट नहीं है जो यह बता सके कि भविष्य में किसे यह बीमारी होगी। लेकिन सबसे जरूरी संदेश यही है कि शरीर की हर हलचल पर नजर रखी जाए। अगर चाल का धीमा पड़ना, हाथों का स्वाभाविक रूप से न झूलना, लिखावट का अचानक छोटा हो जाना या नींद से जुड़ी समस्याएं लगातार बढ़ रही हों, तो इसे सिर्फ ‘उम्र का तकाजा’ मानकर टालने के बजाय न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह लेना सबसे बेहतर कदम होगा।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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