दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ को उनके खिलाफ दर्ज आतंकी मामले में जमानत दे दी है। परवेज को उसकी गिरफ्तारी के लगभग साढ़े चार साल बाद जमानत मिली है। अदालत के फैसले पर सवाल नहीं है लेकिन अगर परवेज के आतंकवादी संगठनों से रिश्ते हैं तो ये देखने की जरूरत है कि उसकी रिहाई के क्या संभावित दुष्परिणाम हो सकते हैं। आम नागरिकों की जिंदगी में ऐसे लोग क्या खलल डाल सकते हैं।
इससे पहले, दिल्ली उच्च न्यायालय ने 10 जून को उन्हें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के एक अन्य मामले में जमानत दी थी। यह आतंकी साजिश का मामला एनआईए ने उनकी गिरफ्तारी के साढ़े चार साल बाद दर्ज किया था। इसके बाद, उनके खिलाफ केवल एक ही मामला लंबित था, जिसमें वे जेल में थे।
शनिवार को पटियाला हाउस कोर्ट के सत्र न्यायाधीश पीतांबर दत्त ने उस मामले में भी उन्हें जमानत दे दी, जिससे उनकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया। हालांकि अदालत ने कुछ शर्तों के साथ परवेज को जमानत दी है लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि रिहाई के बाद वह आतंकवादियों के लिए काम करना बंद कर देगा।
अदालत ने क्या कहा
उच्च न्यायालय ने 10 जून को यह भी कहा था कि परवेज़ द्वारा हिरासत में बिताया गया लंबा समय, मुकदमे की धीमी प्रगति और उनकी विकलांगता, यूएपीए के तहत जमानत पर लगे कड़े प्रतिबंधों के बावजूद उनकी रिहाई को उचित ठहराते हैं। उनके खिलाफ दूसरे एनआईए मामले में, उन्हें औपचारिक रूप से 2023 में हिरासत में रहते हुए गिरफ्तार किया गया था।
इस तरह के मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई होनी चाहिए ताकि लचर और धीमी प्रगति जैसी बातें न आएं। सवाल ये भी है कि किसी की विकलांगता इस बात की गारंटी नहीं हो सकती है कि वह आतंकवाद को समर्थन की अपनी फितरत से बाज आएगा। ये देखा जाना जरूरी है कि उसका अपराध मानवता और मानव जाति के लिए कितना खतरनाक था।
अदालत ने कहा है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अपीलकर्ता के स्वतंत्रता के अधिकार को देखना आवश्यक है और यह अधिकार यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत लगाए गए प्रतिबंध से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। जमानत का यह आदेश उस मामले से संबंधित है जिसमें परवेज़ को नवंबर 2021 में गिरफ्तार किया गया था।
कैसे और कब हुई थी परवेज की गिरफ्तारी
जम्मू एंड कश्मीर कोलीशन ऑफ सिविल सोसायटी के प्रोग्राम कोआर्डिनेटर और एशियन फेडरेशन अगेंस्ट इनवालंटरी डिसैपियरेंसेंस के चेयरपर्सन खुर्रम परवेज को एनआईए ने 22 नवंबर 2021 को गिरफ्तार किया था। एनआईए के मुताबिक खुर्रम परवेज भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ता की आड़ में लश्कर-ए-तैयबा के लिए ओवरग्राउंड वर्कर्स का नेटवर्क संचालित करता था।
एनआईए का यह भी आरोप है कि इसने पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तोएबा के आतंकियों ने खुर्रम परवेज, मुनीर अहमद कटारिया, अर्शीद अहमद टोंच और जफर अब्बास के साथ मिलकर लश्कर-ए-तैयबा की गतिविधियों को आगे बढ़ाने और भारत में आतंकी घटनाओं के लिए एक नेटवर्क चलाने की साजिश रची थी। आरोपियों ने सुरक्षा बलों के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों, तैनाती और आवाजाही के बारे में जानकारी जुटाकर लश्कर-ए तोएबा तक पहुंचाया था।
सवाल कई हैं
पिछले काफी समय से मानवाधिकार की आड़ में आतंकवाद को बढ़ावा देने, आंदोलन चलाने और आतंकवादियों के लिए समर्थन जुटाने का ट्रेंड चल पड़ा है। इसी तरह अपराधियों से मुठभेड़ को भी कठघरे में खड़ा करके पुलिस पर सवाल उठाये जाते हैं।
केंद्र सरकार को इस दिशा में सोचने की जरूरत है कि मानवाधिकार की सीमा क्या हो। अपराधी या आतंकवादी या उनके समर्थकों के लिए कानून में क्या बदलाव किये जाएं। ताकि इस तरह की प्रवृत्ति पर अंकुश लग सके। इसी कड़ी में हिन्दुत्व और सनातन का अपमान भी एक फैशन हो गया है। जिसमें भारत में भी ईश निंदा जैसे कानूनों की जरूरत महसूस की जाने लगी है।








