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Mekedatu Dam Row: किसान फिर क्यों दिल्ली की दहलीज पर, 23 जून को प्रदर्शन

मेकेदातु बांध परियोजना: क्यों तमिलनाडु के किसानों के लिए यह ‘जीवन-मरण’ का सवाल है और क्यों फिर दिल्ली की दहलीज पर है आंदोलन? प्रस्तुत है विस्तृत विश्लेषण।

दक्षिण के दो प्रमुख राज्यों, कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच पानी को लेकर एक बार फिर तलवारें खिंच गई हैं। इस नए विरोध ने करीब 44 साल पुराने कावेरी जल विवाद की कड़वाहट को दोबारा जिंदा कर दिया है। इस बार मोर्चा तमिलनाडु के किसानों ने संभाला है। कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना के खिलाफ किसानों ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए 23 जून को नई दिल्ली में एक बड़े विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है।

विवाद की असल जड़: मेकेदातु परियोजना

यह पूरा विवाद कावेरी नदी पर कर्नाटक के रामनगर जिले में प्रस्तावित मेकेदातु बांध को लेकर है। दोनों राज्यों के हित यहाँ सीधे तौर पर टकरा रहे हैं। कर्नाटक का तर्क है कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों की प्यास बुझाना तथा पनबिजली का उत्पादन करना है। टकराव की असल वजह यह है कि इस बांध को भरने के लिए कावेरी नदी के पानी का एक बड़ा हिस्सा रोका जाएगा, जिससे तमिलनाडु को डर है कि उसके हिस्से के पानी में भारी कटौती हो जाएगी।

तमिलनाडु के किसानों और सरकार की चिंताएं

तमिलनाडु के लाखों किसान अपनी खेती, विशेषकर धान की फसलों के लिए पूरी तरह कावेरी के पानी पर निर्भर हैं। तिरुवरूर में हुई ‘तमिलनाडु कावेरी किसान संघ’ की बैठक में किसानों ने आशंका जताई कि बांध बनने से कावेरी डेल्टा क्षेत्र की उपजाऊ जमीन बंजर हो जाएगी, जिससे उनकी आजीविका पूरी तरह तबाह हो जाएगी।

दूसरी ओर, तमिलनाडु सरकार का रुख है कि यह परियोजना सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित ‘कावेरी जल प्रबंधन अधिकरण’ और ‘कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण’ के नियमों का सीधा उल्लंघन है। जलाशय बनने के बाद पानी के प्रवाह पर कर्नाटक का नियंत्रण बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा, जो निचले राज्यों के हितों के खिलाफ है। संघ के महासचिव पी.आर. पांडियन का कहना है कि तमिलनाडु की सहमति के बिना मेकेदातु में बांध का निर्माण निचले इलाकों के किसानों के साथ अन्याय है, इसलिए वे केंद्र सरकार से अपील करेंगे कि इस परियोजना को किसी भी कीमत पर मंजूरी न दी जाए।

आंदोलन की रूपरेखा और अन्य मांगें

आगामी 23 जून को तमिलनाडु के विभिन्न जिलों से किसान दिल्ली पहुंचेंगे और केंद्रीय जल संसाधन विभाग के मुख्यालय का घेराव करेंगे। किसान संगठन ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से इस परियोजना को रोकने के लिए सभी आवश्यक कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाने की मांग की है। इसके साथ ही, किसान आगामी विधानसभा सत्र में कृषि ऋण माफी के चुनावी वादे को पूरा करने और संशोधित फसल ऋण माफी की घोषणा की उम्मीद भी लगाए बैठे हैं।

मेकेदातु के अलावा, बैठक में परंगीपेट्टई तट के पास इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की प्रस्तावित हाइड्रोकार्बन अन्वेषण परियोजना के खिलाफ भी प्रस्ताव पारित किया गया। किसानों को डर है कि इस परियोजना से तटीय समुदायों, मछुआरों और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। यहां राजनीतिक नेताओं की नीयत पर विश्वास का संकट भी दिख रहा है।

एक नजर में: कावेरी जल विवाद का इतिहास

यह विवाद भारत के सबसे लंबे और जटिल अंतरराज्यीय नदी विवादों में से एक रहा है। 1974 से शुरू हुआ आधुनिक कानूनी संघर्ष 2018 तक यानी करीब 44 सालों तक चला।

वर्ष मुख्य घटनाक्रम
1892 तत्कालीन मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच पहला जल बंटवारा समझौता हुआ।
1924 दूसरा महत्वपूर्ण समझौता हुआ, जिसकी मियाद 50 वर्ष के लिए तय की गई थी।
1974 1924 का समझौता समाप्त होते ही कर्नाटक ने नए बंटवारे की मांग की, जबकि तमिलनाडु पुरानी व्यवस्था पर अड़ा रहा। यहीं से आधुनिक विवाद भड़का।
1990 केंद्र सरकार द्वारा ‘कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण’ (Tribunal) का गठन किया गया।
2007 17 साल की लंबी सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने अपना अंतिम फैसला सुनाया।
2018 सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम निर्णय देते हुए जल आवंटन में कुछ संशोधन किए और ‘कावेरी जल प्रबंधन अधिकरण’ के गठन का रास्ता साफ कि
Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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