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UNESCO’s Living Heritage: यूनेस्को की जीवंत संस्कृति की कहानी

शैलेंद्र मौर्य- लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय विषयों के विशेषज्ञ हैं

UNESCO’s Living Heritage: जब हम यूनेस्को की विश्व धरोहर की बात करते हैं, तो ताजमहल, चीन की दीवार या मिस्र के पिरामिड जैसी भव्य इमारतें हमारे दिमाग में उभरती हैं। लेकिन क्या विरासत केवल पत्थरों, गुम्बदों और स्थापत्य तक सीमित है? क्या संस्कृति केवल देखने और छूने की वस्तु है, या जीने और साझा करने का भाव?

यूनेस्को का “अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” (Intangible Cultural Heritage – ICH) का विचार इसी सवाल का उत्तर है। यह वह जीवंत परंपरा है जो किसी समुदाय की आत्मा को आकार देती है — वे गीत, अनुष्ठान, रिवाज, कथा या ज्ञान जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।

यूनेस्को का दृष्टिकोण: अमूर्त संस्कृति क्यों ज़रूरी

यूनेस्को के 2003 के कन्वेंशन ने स्पष्ट किया कि “अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” वे अभ्यास, अभिव्यक्तियाँ, ज्ञान और कौशल हैं जिन्हें समुदाय अपने अस्तित्व और पहचान का हिस्सा मानते हैं ।

यह सोच मास्टरपीस यानी “श्रेष्ठ कृति” की पूर्व अवधारणा से आगे बढ़ी है। पहले यूनेस्को उत्कृष्ट परंपराओं को ‘Masterpieces of Oral and Intangible Heritage’ कहकर चयन करता था। लेकिन वर्षों बाद यह समझ विकसित हुई कि सभी संस्कृतियां बराबर हैं; किसी में श्रेष्ठता नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है।

यूनेस्को का लक्ष्य अब यह है —

  • संस्कृति को जीवंत बनाए रखना, संग्रहालयों में बंद नहीं।
  • परंपरा के असली संरक्षक समुदाय खुद हैं, न कि कोई विशेषज्ञ पैनल।
  • संरक्षण का अर्थ केवल सम्मान नहीं, बल्कि उसके संचरण और सुरक्षा के ठोस प्रयास हैं।

भारत में अमूर्त धरोहरों की भूमिका

भारत की सांस्कृतिक पहचान सदियों से ‘जीवंत परंपराओं’ पर टिकी है। यही कारण है कि यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में भारत की 14 से अधिक अमूर्त धरोहरें दर्ज हैं, जिनमें शामिल हैं —

  1. वैदिक मंत्रोच्चार परंपरा
  2. रामलीला – रामायण का पारंपरिक नाट्य रूपांतरण
  3. केरल का कुटियाट्टम संस्कृत थिएटर
  4. गढ़वाल का रममाण उत्सव
  5. मुदियेट्टू धर्मनाट्य परंपरा
  6. कालबेलिया लोकगीत और नृत्य (राजस्थान)
  7. छऊ नृत्य
  8. लद्दाख का बौद्ध जप
  9. मणिपुर का संकीर्तन
  10. पंजाब के ठठेरों की शिल्पकला
  11. योग
  12. नवरोज़
  13. कुंभ मेला
  14. कोलकाता की दुर्गा पूजा

https://tesariaankh.com/manavta-ke-paanch-sabse-bade-khatre-2025/

ये केवल संस्कृतियां नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक स्मृति हैं — जो पीढ़ियों के जीवन और उत्सव से जुड़ी हैं।

विरासत के सजीव उदाहरण

दुनिया भर की अमूर्त परंपराएं भी उतनी ही विविध हैं। उदाहरण के लिए —

  • ब्राजील का सांबा दे रोडा सामुदायिक संगठनों में संगीत और कविता का संगम है।
  • वानुअतु का सैंड ड्रॉइंग कला और संचार का अनूठा रूप है।
  • कंबोडिया का रॉयल बैले आध्यात्मिकता और भव्यता दोनों का प्रतिनिधित्व करता है।
  • बोलीविया का कल्लावाया कॉस्मोविज़न दिखाता है कि परंपरा केवल नृत्य या संगीत नहीं, बल्कि पूरी एक ज्ञान प्रणाली हो सकती है जो ब्रह्मांड की व्याख्या करती है

समुदाय: संस्कृति के असली संरक्षक

यूनेस्को ने अपने 2003 कन्वेंशन में यह तय किया कि किसी भी नामांकन को तभी मान्य किया जाएगा जब स्थानीय समुदाय की सहमति स्पष्ट रूप से दर्ज हो। यह नया दृष्टिकोण विरासत संरक्षण की परिभाषा बदल देता है —
अब संरक्षक समिति नहीं बल्कि जनता संस्कृति की वाहक है।

यह मॉडल भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश के लिए खास मायने रखता है, जहां हर प्रदेश में लोककथाएं, अनुष्ठान और शिल्पकला जीवित हैं और समुदाय ही उन्हें आगे बढ़ाते हैं।

संरक्षण का अर्थ: पुरस्कार नहीं, कार्रवाई

यूनेस्को का कार्यक्रम केवल सूची बनाने तक सीमित नहीं। इसमें ठोस योजनाएं शामिल हैं —

  • स्थानीय दस्तावेज़ीकरण और शोध
  • पारंपरिक कला विद्यालयों की स्थापना
  • युवाओं में ज्ञान हस्तांतरण
  • त्योहारों, मंचों और मीडिया अभियानों के जरिये जागरूकताpib

इन प्रयासों के लिए जापान, संयुक्त अरब अमीरात और दक्षिण कोरिया जैसे देश वित्तीय सहयोग भी प्रदान करते हैं। भारत में संस्कृति मंत्रालय राष्ट्रीय ICH सूची को नियमित रूप से अपडेट करता है।

संकट और समाधान

आधुनिकता, पलायन, डिजिटल मनोरंजन और बाज़ार की अर्थव्यवस्था ने कई परंपराओं को हाशिये पर धकेला है। कारीगरों और प्रदर्शनकारियों के पास अक्सर संसाधनों की कमी होती है। यूनेस्को का प्रयास है कि हर परंपरा को उसकी स्थानीय जरूरतों के अनुसार मजबूत किया जाए — चाहे वह राजस्थान के कालबेलिया नर्तक हों या लद्दाख के बौद्ध भिक्षु।

यह “सांस्कृतिक लोकतंत्र” का विचार है — जहां हर समुदाय अपनी पहचान खुद परिभाषित करता है।

जीवंत विरासत, जीवंत समाज

यूनेस्को की यह पहल हमें सिखाती है कि संस्कृति सिर्फ अतीत की वस्तु नहीं, वर्तमान का अनुभव और भविष्य की पहचान है। यह कहानी कहने, संगीत, नृत्य और भाषा के माध्यम से पीढ़ियों को जोड़ती है।

भारत के लिए यह न केवल गौरव का विषय है, बल्कि जिम्मेदारी भी — कि इन परंपराओं को केवल संग्रहालयों में न रखें, बल्कि उनके कलाकारों और समुदायों को सशक्त करें।

https://x.com/allycaralgoa/status/1982305478953582938

यही असली विश्व धरोहर है — जो पत्थरों या दीवारों में नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं, शब्दों और रागों में बसती है।

 

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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