वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

UGC Equity Regulations 2026: मंशा सही, मगर अमल की परीक्षा अभी बाकी

UGC Equity Regulations 2026: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 उच्च शिक्षा परिसरों में जातिगत भेदभाव से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं। ये नियम 2012 की एंटी-डिस्क्रिमिनेशन व्यवस्था का स्थान लेते हैं और गैर-अनुपालन पर कठोर दंड का प्रावधान करते हैं—जिसमें डिग्री कार्यक्रमों पर रोक, UGC योजनाओं से वंचित किया जाना और यहां तक कि मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची से हटाया जाना शामिल है।

इन नियमों का आना केवल नीतिगत सुधार नहीं, बल्कि न्यायिक दबाव और सामाजिक पीड़ा की पृष्ठभूमि में हुआ है। रोहित वेमुला की मृत्यु को दस वर्ष पूरे होना और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनवरी 2025 में UGC को जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों का डेटा एकत्र करने का निर्देश—दोनों इस बात की याद दिलाते हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता अब भी एक अधूरा वादा है।

डेटा जो सख्ती की जरूरत को उजागर करता है

2019-20 से 2023-24 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की वृद्धि दर्ज की गई—173 से बढ़कर 378 तक। 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों में कुल 1,160 शिकायतें दर्ज हुईं। इससे भी चिंताजनक तथ्य यह है कि लंबित मामलों की संख्या 18 से बढ़कर 108 हो गई।

यह आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि 2012 की व्यवस्था न तो शिकायतों की रोकथाम कर पाई और न ही समयबद्ध न्याय सुनिश्चित कर सकी। ऐसे में नई नियमावली का सख्त स्वरूप समयोचित प्रतीत होता है।

ड्राफ्ट से बेहतर, लेकिन अब भी अपूर्ण

अंतिम अधिसूचना ने ड्राफ्ट में मौजूद दो गंभीर खामियों को ठीक किया है।
पहला, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है—जो सामाजिक यथार्थ की स्वीकृति है।
दूसरा, ‘झूठी शिकायतों’ पर प्रस्तावित दंडात्मक प्रावधान को हटा दिया गया है। यह बदलाव अहम है क्योंकि पहले से हाशिए पर खड़े छात्रों पर संदेह का बोझ डालना शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को हतोत्साहित करता।

इन सुधारों से यह संदेश जाता है कि आयोग कम से कम यह समझता है कि समानता केवल कानून से नहीं, बल्कि विश्वासजनक प्रक्रियाओं से आती है।

जहां नई नियमावली कमजोर पड़ती है

हालांकि, 2026 की नियमावली में कई अहम खाली जगहें भी हैं।
2012 के नियमों में भेदभाव की ठोस और व्यवहारिक परिभाषाएं थीं—जैसे प्रवेश प्रक्रिया, मूल्यांकन, हॉस्टल, छात्रवृत्ति और संस्थागत व्यवहार में पक्षपात। नई व्यवस्था व्यापक शब्दावली तो देती है, लेकिन कई जरूरी गार्डरेल्स को छोड़ देती है।

सबसे बड़ी चिंता Equity Committees को लेकर है। यदि ये समितियां संस्थान प्रमुखों की अध्यक्षता में ही काम करेंगी, तो उनकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। बिना बाहरी प्रतिनिधित्व, स्वतंत्र रिपोर्टिंग और जवाबदेही के, ये समितियां महज़ प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह सकती हैं।

अमल के लिए पारदर्शिता जरूरी

नियमों की प्रभावशीलता केवल दंड प्रावधानों से तय नहीं होगी। इसके लिए

  • जांच की स्पष्ट समय-सीमा,

  • मामलों के अनाम लेकिन सार्वजनिक परिणाम,

  • और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य होंगी।

इसके साथ ही, संकाय और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को जातिगत पूर्वाग्रह पहचानने और उससे निपटने का प्रशिक्षण देना भी जरूरी है। भेदभाव अक्सर नीतिगत नहीं, बल्कि व्यवहारिक और अनजाने में होता है।

शिकायतकर्ता की सुरक्षा: सबसे बड़ा अभाव

नई शिकायत प्रणाली की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह प्रतिशोध (retaliation) से पर्याप्त सुरक्षा नहीं देती। शिकायत के बाद अकादमिक उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार या मानसिक दबाव जैसी आशंकाएं आज भी छात्रों को चुप रहने पर मजबूर कर सकती हैं।

https://x.com/grok/status/2013478972735041935?s=20

UGC की प्रस्तावित मानसिक स्वास्थ्य नीति, जिसमें काउंसलिंग सेंटर, हेल्पलाइन और पीयर सपोर्ट शामिल हैं, स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन भावनात्मक सहयोग कभी भी संस्थागत जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।

https://tesariaankh.com/science-and-technology-development-in-india/

UGC की नई समानता नियमावली एक आवश्यक और देर से उठाया गया कदम है। इसकी मंशा स्पष्ट है—उच्च शिक्षा परिसरों को अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण बनाना। लेकिन यदि इसे केवल अनुपालन की चेकलिस्ट तक सीमित कर दिया गया, तो यह भी अपने पूर्ववर्ती नियमों की तरह अप्रभावी साबित हो सकती है।

समानता कानून से नहीं, संस्कृति, संरचना और जवाबदेही से आती है। नई नियमावली की असली परीक्षा उसके ईमानदार और पारदर्शी अमल में होगी।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें