Satua Baba Peeth Varanasi: वैराग्य से वैभव तक—एक परंपरा, एक सवाल
हाल के दिनों में सतुआ बाबा का नाम अचानक चर्चा में है। वजह कोई आध्यात्मिक प्रवचन नहीं, बल्कि लग्जरी गाड़ियों की खरीद है। यह खबर जितनी चौंकाने वाली है, उतनी ही असहज भी—क्योंकि सतुआ बाबा की परंपरा भारतीय लोक-धार्मिक चेतना में त्याग, सादगी और वैराग्य की प्रतीक रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—सतुआ बाबा आखिर थे कौन, उनकी परंपरा क्या रही है और आज उसमें कितना क्षरण आ चुका है?
सतुआ बाबा कौन थे?
लोक परंपराओं में सतुआ बाबा किसी एक ऐतिहासिक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे साधना और लोक-विश्वास की एक धारा हैं। उत्तर भारत—विशेषकर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के ग्रामीण अंचलों—में सतुआ बाबा को ऐसे सन्यासी के रूप में जाना जाता रहा है, जो गृहस्थी, संपत्ति और भोग से दूर रहते थे।
“सतुआ”—अर्थात् सादा भुना हुआ अन्न—उनके जीवन-दर्शन का प्रतीक था। उनका भोजन सीमित, वस्त्र न्यूनतम और जीवन पूरी तरह जनसाधारण के बीच। वे किसी मठ या आश्रम की भव्यता में नहीं, बल्कि गांव की चौपाल, पीपल के नीचे या कच्ची कुटिया में दिखाई देते थे।
सतुआ बाबा की परंपरा: सादगी का अनुशासन
सतुआ बाबा की पहचान तीन मूल तत्वों से रही है:
- अपरिग्रह – संग्रह नहीं, केवल आवश्यकता
- लोक-संवाद – आम लोगों के दुख-सुख में भागीदारी
- आडंबर-विरोध – दिखावे से दूरी
वे न तो चढ़ावे की अपेक्षा रखते थे, न ही चमत्कारों का प्रदर्शन करते थे। उनकी शक्ति उनके जीवन-व्यवहार में थी—जहां उपदेश से अधिक उदाहरण बोलता था।
बदलते समय में परंपरा का क्षरण
आज जब सतुआ बाबा का नाम महंगी गाड़ियों, आलीशान सुविधाओं और सोशल मीडिया प्रचार से जुड़ता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता—यह पूरी परंपरा पर सवाल खड़ा करता है।
आधुनिक समय में धर्म भी एक तरह के ब्रांड में बदलता दिख रहा है। अनुयायी संख्या, दान की राशि और दृश्य प्रभाव—इन सबने साधना के आंतरिक पक्ष को पीछे धकेल दिया है। सतुआ बाबा की परंपरा, जो न्यूनतम में संतोष सिखाती थी, अब कहीं-कहीं अधिकतम प्रदर्शन का माध्यम बनती दिख रही है।
आस्था और आडंबर के बीच की रेखा
यह समझना जरूरी है कि हर साधु-संत पर संदेह करना उचित नहीं, लेकिन परंपराओं की आत्मा को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है। सतुआ बाबा की परंपरा यदि वैराग्य से हटकर वैभव का प्रतीक बनती है, तो यह आस्था के बजाय विपणन का रूप ले लेती है।
ग्रामीण समाज में जहां लोग आज भी सतुआ बाबा को त्याग और आत्मसंयम का आदर्श मानते हैं, वहां यह परिवर्तन उन्हें भ्रमित करता है। आस्था टूटती नहीं—लेकिन वह सवाल पूछने लगती है।
क्या परंपरा को बचाया जा सकता है?
सतुआ बाबा की परंपरा किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं है। यह सामूहिक स्मृति और लोक-चेतना का हिस्सा है। इसे बचाने का रास्ता भी वहीं से निकलता है—
- साधना को प्रचार से ऊपर रखना
- जीवन को संदेश का माध्यम बनाना
- सादगी को कमजोरी नहीं, शक्ति मानना
सतुआ बाबा की चर्चा आज इसलिए नहीं हो रही कि उन्होंने कुछ कहा, बल्कि इसलिए कि उन्होंने कुछ दिखाया। सवाल यही है—क्या वह दृश्य सतुआ बाबा की परंपरा से मेल खाता है?
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यह कहानी किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक परंपरा के आत्ममंथन की है। क्योंकि जब साधना और संपत्ति के बीच संतुलन बिगड़ता है, तो नुकसान केवल विश्वास का नहीं, संस्कृति का भी होता है।
सतुआ बाबा पीठ का इतिहास
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वाराणसी (काशी) के मणिकर्णिका घाट के पास स्थित सतुआ बाबा पीठ की स्थापना साल 1803 में गुजरात के संत जेठा पटेल ने की थी। उन्होंने काशी आकर एक आश्रम की नींव रखी, और उस आश्रम के मुखिया को सतुआ बाबा कहा जाने लगा। इस आश्रम में पारंपरिक वैदिक शिक्षा और साधना की परंपरा रही है।
पीठाधीश (महामंडलेश्वर / जगद्गुरु) की संख्या और परंपरा
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इस पीठ की उत्तराधिकार परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। पीठ की परंपरा के अनुसार अब तक निम्नलिखित प्रमुख (आचार्य/महन्त) या पीठाधीश रहे हैं:
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श्री 1008 महन्त मोहन दासजी महाराज
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श्री 1008 महन्त भोला दासजी महाराज
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श्री 1008 महन्त दामोदर दासजी महाराज
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श्री 1008 महन्त नारोत्तम दासजी महाराज
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श्री 1008 महन्त यमुनाचार्य महाराज
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श्री 1008 महन्त संतोष दासजी महाराज (वर्तमान)
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वर्तमान में संतोष दासजी महाराज सतुआ बाबा के रूप में इस पीठ के मुख्य महामंडलेश्वर/पीठाधीश्वर हैं।
https://x.com/kalyughaibhai/status/2012574054381928570?s=20
जगद्गुरु का पद
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हाल की खबरों के अनुसार सतुआ बाबा संतोष दास को हाल के महाकुंभ 2025 के दौरान “जगद्गुरु” की उपाधि से भी सम्मानित किया गया है।








