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सरदार पटेल 150वीं जयंती: एकता का अमर उत्सव

Sardar Patel: आप जानते हैं, कुछ दिन ऐसे होते हैं जब तारीखें सिर्फ कैलेंडर पर नहीं, बल्कि सीधे दिल पर उतरती हैं। 31 अक्टूबर 2025 का दिन बिल्कुल वैसा ही था। यह हमारे ‘लौह पुरुष’, हमारे प्यारे सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती थी – एक ऐसा महानायक जिसने 562 टुकड़ों में बंटे भारत को अपने बाजुओं में समेटकर एक अखंड राष्ट्र बना दिया। और इस बार का ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि इस धरती पर रहने वाले हर भारतीय के लिए एक भावनात्मक प्रतिज्ञा थी।

यह नजारा था गुजरात के एकता नगर का, नर्मदा के तट पर, जहाँ दुनिया को ताकता है हमारा गौरव, ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’। सुबह की पहली किरणें जब स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर पड़ीं, तो ऐसा लगा जैसे खुद सरदार पटेल इस देश को आशीर्वाद दे रहे हों। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुबह-सुबह वहाँ पहुँचे। उनका आना सिर्फ एक प्रधानमंत्री का आना नहीं था, बल्कि एक कृतज्ञ राष्ट्र के प्रतिनिधि का अपने नायक को नमन करना था।

दिल से ली गई प्रतिज्ञा: एक अटूट रिश्ता

आप जानते हैं, सबसे छू लेने वाला पल क्या था? जब प्रधानमंत्री ने पूरे देश की तरफ से राष्ट्रीय एकता की शपथ ली। उन शब्दों में एक नेता का संकल्प नहीं, बल्कि हर भारतीय की जिम्मेदारी महसूस हो रही थी। उन्होंने जो कहा, वह सिर्फ एक घोषणा नहीं, बल्कि एक वादा था:

“मैं अपने देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने की शपथ लेता हूं और इसके लिए स्वयं को समर्पित करता हूं।”

वहाँ मौजूद हजारों लोगों ने जब यह शपथ दोहराई होगी, तो कल्पना कीजिए, उस आवाज़ में कितनी ताकत रही होगी! यह शपथ थी कि हम सरदार पटेल के उस सपने को टूटने नहीं देंगे, जिसे उन्होंने अपनी जिंदगी दाँव पर लगाकर जोड़ा था।

प्रधानमंत्री मोदी ने जो वीडियो संदेश दिया, उसमें भी एक अलग ही गर्मजोशी थी। उन्होंने सरदार को सिर्फ “नेता” नहीं, बल्कि “भारत की एकता का निर्माता” कहा। उन्होंने याद किया कि सरदार पटेल में वो जादू था कि वे वैचारिक मतभेद रखने वालों को भी साथ ले आते थे। यह सिर्फ कूटनीति नहीं थी—यह थी लोगों को पढ़ने और उन्हें जोड़ने की अद्भुत मानवीय क्षमता।

ईंट-पत्थर से नहीं, संकल्प से बना विकास: ₹1,220 करोड़ की भेंट

राष्ट्रीय एकता दिवस से एक दिन पहले, प्रधानमंत्री ने एकता नगर को एक ऐसी भेंट दी, जो इस जगह को सिर्फ एक पर्यटन स्थल से कहीं ज़्यादा बना देगी। ₹1,220 करोड़ की विकास परियोजनाएँ! यह दिखाता है कि हम सिर्फ सरदार पटेल की मूर्ति नहीं पूजते, बल्कि उनके विचारों को जमीन पर उतारते हैं – प्रगति, स्थिरता और समावेशी विकास।

सोचिए, वहाँ क्या-क्या बना है:

शाही साम्राज्यों का संग्रहालय: ताकि हमारी शानदार विरासत को हम भूल न जाएँ ($367.25$ करोड़)।

वीर बालक उद्यान: जहाँ हमारे बच्चों को खेल-खेल में देश के लिए बहादुरी का पाठ पढ़ाया जाएगा ($90.46$ करोड़)।

25 नई ई-बसें: क्योंकि सरदार पटेल के सपनों का भारत पर्यावरण का भी उतना ही ध्यान रखेगा ($30$ करोड़) ।

ये सब सिर्फ इमारतें नहीं हैं। ये वो नींव हैं, जिस पर एकता नगर एक ऐसा शहर बनेगा, जिसे देखकर दुनिया कहेगी कि हाँ, यह है हमारे लौह पुरुष के विज़न का शहर!

और हाँ, एक और खूबसूरत पल! प्रधानमंत्री ने ₹150 का स्मारक सिक्का और एक विशेष डाक टिकट जारी किया। यह सिक्का अब सिर्फ धातु का टुकड़ा नहीं रहा, यह देश के एकीकरण की निशानी बन गया है।

परिवार का प्यार और सम्मान

सबसे भावुक पल था जब प्रधानमंत्री ने सरदार पटेल के परिवार से मुलाकात की। सोचिए, जब सरदार पटेल के पोते गौतम दह्या पटेल और उनकी पीढ़ियाँ वहाँ मौजूद होंगी, तो उन्हें कैसा महसूस हुआ होगा? यह सिर्फ एक राजनीतिक मुलाकात नहीं थी, यह एक राष्ट्र का अपने नायक के परिवार के प्रति सम्मान जताना था।

परिवार के सदस्यों की उपस्थिति ने इस बात को फिर से पुख्ता किया कि यह विरासत आज भी जीवित है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। उनकी 13 साल की पोती करीना केदार पटेल जब उस कार्यक्रम में खड़ी होंगी, तो उन्होंने जरूर गर्व महसूस किया होगा कि उनके परदादा ने इस देश के लिए क्या किया था।

https://x.com/anishashri13011/status/1984117381011271780

दिल्ली से स्टैच्यू ऑफ यूनिटी तक: दिल की बात

सिर्फ एकता नगर ही क्यों, पूरे देश में एक ही आवाज़ गूंज रही थी।

अमित शाह की दमदार बात:

दिल्ली में ‘एकता दौड़’ के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने जो कहा, उसमें एक सच्चा दर्द और गर्व दोनों था। उन्होंने साफ कहा कि आज का जो भारत का मानचित्र है, वह सरदार पटेल के कारण है। और जब उन्होंने अनुच्छेद 370 को हटाने को सरदार पटेल का संकल्प पूरा होना बताया, तो यह बात सीधी दिल पर लगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर स्टैच्यू ऑफ यूनिटी जैसा स्मारक बना, तो वो नरेंद्र मोदी जी की पहल थी—यह बात बताती है कि देश अपने नायक को कितना सम्मान देना चाहता था।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का संदेश:

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सरदार पटेल को ‘राष्ट्र-निर्माता’ कहा और लोगों से ‘सशक्त, समरस और श्रेष्ठ भारत’ बनाने का आग्रह किया। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने उनकी दूरदर्शिता को नमन किया। ये सिर्फ संवैधानिक पद पर बैठे लोगों के शब्द नहीं थे, ये वो भावनाएं थीं जो देश अपने सबसे बड़े संकटमोचक के लिए महसूस करता है।

31 अक्टूबर: एक तारीख जो हमें ‘हम’ बनाती है

हम 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस क्यों मनाते हैं? यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह सरदार पटेल का जन्मदिन है। यह इसलिए है क्योंकि यह वो दिन है जब हमें याद दिलाया जाता है कि हम एक हैं।

सन् 2014 में जब यह दिवस घोषित हुआ, तो इसका मकसद साफ था: हर साल एक बार ठहरकर सोचना कि इस देश को एक रखने में कितनी मशक्कत लगी है। 565 रियासतों को मनाना, राजी करना, जरूरत पड़ने पर सख्ती दिखाना—यह सब एक इंसान ने किया। यह काम आसान नहीं था।

सरदार पटेल सिर्फ एकीकरणकर्ता नहीं थे, वह एक दूरदर्शी थे। उनका मानना था कि अगर भारत को दुनिया में मजबूत खड़ा होना है, तो उसे पहले भीतर से मजबूत, एकजुट और अखंड होना होगा।

यही वजह है कि जब भी राष्ट्रीय एकता दिवस पर हम ‘एक भारत, आत्मनिर्भर भारत’ की शपथ लेते हैं, तो वह सिर्फ एक प्रतिज्ञा नहीं होती—वह उस लौह पुरुष के प्रति हमारा सच्चा और भावनात्मक समर्पण होता है, जिसने हमारे आज को सुरक्षित किया।

समारोह का अंत ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की थीम पर एक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम से हुआ। यह समापन हमें बताता है कि भले ही हमारी भाषाएँ अलग हों, हमारा खान-पान अलग हो, हमारे त्योहार अलग हों, लेकिन जब बात देश की आती है, तो हमारी धड़कन एक है।

सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती पर, हमने सिर्फ उन्हें याद नहीं किया, बल्कि उनकी ‘एकता’ की विरासत को अपनी आत्मा में महसूस किया। और शायद यही इस दिवस की सबसे बड़ी सफलता है।

जब पटेल ‘सरदार’ बन गए: बारडोली सत्याग्रह की कहानी

कहानी एक संघर्ष की, जहाँ किसान थे सिपाही और पटेल बने सेनापति!

आप जानते हैं, कुछ नाम ऐसे होते हैं जो इतिहास के पन्नों पर नहीं, बल्कि लोगों के दिलों पर लिखे जाते हैं। वल्लभभाई पटेल का नाम ऐसा ही था, लेकिन ‘सरदार’ का तमगा उन्हें कैसे मिला? यह कहानी है 1928 के उस दौर की, जब भारत में आजादी की आग धीमी-धीमी सुलग रही थी, और गुजरात का एक छोटा सा गाँव, बारडोली, अंग्रेज़ी हुकूमत के जुल्म के सामने चट्टान की तरह खड़ा हो गया था।

अन्याय का बोझ और किसानों का दर्द

कल्पना कीजिए उस दौर की। हमारे किसान, जो अपनी मिट्टी को सींचते थे, फसल उगाते थे। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन पर एक ऐसा बोझ डाल दिया, जिसने उनकी कमर तोड़ दी। बिना किसी चेतावनी के, बिना किसी वाजिब कारण के, बम्बई प्रेसीडेंसी की सरकार ने लगान (टैक्स) में सीधे 22% की भारी बढ़ोतरी कर दी!

यह सिर्फ टैक्स नहीं था; यह किसानों के पेट पर सीधा लात मारना था। फसल चाहे खराब हो जाए, मुनाफा चाहे न हो, लेकिन आपको अपनी मेहनत का पाँचवाँ हिस्सा सरकार को देना ही होगा।

किसान परेशान थे, त्रस्त थे। उन्होंने खूब मिन्नतें कीं, आवेदन किए, लेकिन सरकारी कान बहरे थे। तब किसानों ने तय किया—अब गुहार नहीं, अब तो सीधी लड़ाई होगी। लेकिन उन्हें चाहिए था एक ऐसा नेता, जो उनकी साधारण सी आवाज को तूफ़ान बना दे।

मैदान में वल्लभभाई पटेल का प्रवेश

तब किसानों की नजर एक ऐसे वकील पर पड़ी, जिसने अपनी शानदार प्रैक्टिस छोड़कर गांधीजी के साथ आजादी की राह पकड़ ली थी—वल्लभभाई पटेल।

जब किसान उनके पास पहुँचे, तो पटेल ने पहले उनकी बात धैर्य से सुनी। उन्होंने देखा कि यह केवल पैसों का मामला नहीं है, यह आत्म-सम्मान का मामला है। पटेल जानते थे कि अंग्रेज आसानी से झुकने वाले नहीं, यह एक लंबी और क्रूर लड़ाई होगी। उन्होंने किसानों से पूछा: “क्या आप तैयार हैं? क्या आप अंत तक खड़े रह सकते हैं, चाहे अंग्रेज आपकी जमीन छीन लें, आपका सब कुछ जब्त कर लें?”

और किसानों ने एक आवाज़ में कहा: “हाँ, हम तैयार हैं!”

जैसे ही पटेल ने नेतृत्व संभाला, वल्लभभाई पटेल, जनता के सेनापति बन गए।

सत्याग्रह का अस्त्र: एक अद्भुत अनुशासन

यह सत्याग्रह कोई शोर-शराबा नहीं था; यह था अद्भुत अनुशासन और अहिंसा की ताकत।

‘नो टैक्स’ अभियान: पटेल ने किसानों को सख्त निर्देश दिया—एक भी पैसा लगान में नहीं जाएगा।

संगठन की शक्ति: उन्होंने बारडोली के हर गाँव को, हर परिवार को छोटे-छोटे समूह में बाँट दिया। पुरुष, महिलाएँ, बच्चे—सब अपनी जिम्मेदारी जानते थे।

महिलाओं का योगदान: इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत थीं बारडोली की महिलाएँ। उन्होंने घर-घर जाकर समर्थन जुटाया और जब अंग्रेज अधिकारी किसानों की संपत्ति जब्त करने आते थे, तो ये महिलाएँ ढाल बनकर खड़ी हो जाती थीं। उनकी बहादुरी ने पूरे देश को प्रेरित किया।

अंग्रेज पागल हो गए। उन्होंने घोड़े दौड़ाए, किसानों के पशु जब्त किए, उनकी जमीनें छीन लीं। पुलिस की क्रूरता अपनी चरम पर थी। लेकिन किसानों ने न तो हिंसा की, और न ही झुके। वे पटेल के एक इशारे पर अडिग रहे।

जब वल्लभभाई बने ‘सरदार’

आंदोलन पूरे देश में फैल गया। बम्बई के गवर्नर परेशान हो गए। अखबारों में रोज बारडोली के किसानों की बहादुरी की खबरें छपने लगीं।

आखिरकार, सरकार को झुकना पड़ा। करीब छह महीने के अथक संघर्ष के बाद, सरकार ने लगान की दर की समीक्षा करने के लिए एक जाँच आयोग गठित करने पर सहमति जताई। आंदोलन की जीत हुई। लगान की बढ़ोतरी को नाजायज ठहराया गया, और अंततः उसे कम कर दिया गया, और जब्त की गई सारी जमीनें किसानों को वापस कर दी गईं। यह सत्याग्रह की एक ऐतिहासिक जीत थी।

और इस जीत के बाद, बारडोली की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को प्यार और सम्मान से एक नया नाम दिया—’सरदार’।

https://tesariaankh.com/amrita-pritam-voice-of-women-and-pain-of-partition/

यह नाम सिर्फ एक उपाधि नहीं था; यह था उस अटूट नेतृत्व, उस साहस, और उस संगठन क्षमता की पहचान, जिसने किसान को भी देश का एक मजबूत सिपाही बना दिया। जिस ‘सरदार’ ने बारडोली को जीता था, उसी ‘सरदार’ ने कुछ साल बाद पूरे भारत को एकजुट कर दिया।

 

 

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Author: Tesari Aankh

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