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सनातन धर्म में ध्वज-परंपरा: वैदिक ‘केतु’ से रामायण-पुराणकाल तक का विस्तार

भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान में ध्वज हमेशा सिर्फ एक चिन्ह नहीं, बल्कि शक्ति, पहचान और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक रहा है। आज जब आधुनिक राजनीति से लेकर धार्मिक आयोजनों तक में ध्वज को निर्णायक पहचान के रूप में देखा जा रहा है, ऐसे समय में यह समझना आवश्यक है कि सनातन धर्म में ध्वज-परंपरा कैसे शुरू हुई, कैसे विकसित हुई और इसके मूल स्रोत क्या हैं

यह रिपोर्ट वैदिक ग्रंथों, रामायण-काल, महाभारत और पुराणों की तुलना के आधार पर ध्वज-परंपरा का विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

 वैदिक युग में ध्वज की जड़—‘केतु’ का उद्भव

ध्वज का सबसे प्रारंभिक उल्लेख वैदिक साहित्य में ‘केतु’ शब्द से मिलता है। ‘केतु’ का अर्थ सिर्फ लहराता झंडा नहीं, बल्कि—

  • संकेत

  • दिशा

  • पहचान

  • ज्योति

  • दिग्दर्शन

इन सभी से है।
इसका अर्थ यह है कि ध्वज का जन्म उपयोगिता से अधिक दार्शनिक अवधारणा के रूप में हुआ था।

वैदिक ध्वज कैसे होते थे?

ग्रंथों में किसी निश्चित आकार, रंग या चित्र का उल्लेख नहीं मिलता। परंपरा से स्पष्ट है कि ध्वज—

  • एकरंगा,

  • ऊँचे दंड पर स्थापित,

  • और अधिकतर बिना चित्र के होते थे।

युद्ध, यज्ञ और सामुदायिक आयोजनों में ध्वज दिशा और पहचान का साधन था।

 क्या त्रिदेव के अलग-अलग ध्वज थे?

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि क्या ब्रह्मा, विष्णु और महेश—तीनों के अलग ध्वज थे?

वैदिक काल—कोई अलग ध्वज नहीं

प्राचीन वैदिक ग्रंथों में त्रिदेव के “ध्वज-चिह्न” का कोई उल्लेख नहीं मिलता। यह अवधारणा बाद में पुराणों में विकसित हुई।

पुराणकाल में विकसित प्रतीक

पुराणों में देवताओं को उनके वाहनों और आयुधों से पहचाना जाने लगा—

  • विष्णु – गरुड़

  • शिव – नंदी, त्रिशूल

  • ब्रह्मा – हंस, कमल

इन प्रतीकों को बाद में कई परंपराओं ने “ध्वज-चिह्न” का रूप दिया, लेकिन यह कोई वैदिक नियम नहीं था।

क्या एक साझा ध्वज था?

त्रिदेव को किसी एक “धर्म-ध्वज” के तहत रखने की अवधारणा ग्रंथों में नहीं मिलती।
सनातन धर्म में देवताओं के बीच समानता और स्वतंत्रता दोनों मानी गई हैं।

सूर्यवंशीय ध्वज—रामायण काल की प्रतीक परंपरा

यदि भारत के प्राचीन ध्वजों की बात करें, तो सूर्यवंश सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
रामायण के अनुसार—

  • दशरथ,

  • राम,

  • भरत,

  • और सूर्यवंशी राजाओं

के ध्वज का मुख्य प्रतीक सूर्य था।

सूर्य-ध्वज कैसा था?

परंपरागत वर्णन के अनुसार—

  • चमकीला लाल या पीला

  • सूर्य की किरणों का चिह्न

  • और महल तथा रथ—दोनों पर स्थापित होता था

यह “तेज, पराक्रम और धर्म-पालन” का प्रतीक माना जाता था।

चंद्रवंशीय ध्वज—महाभारत काल की पहचान

चंद्रवंश का मूल ध्वज चंद्र-केतु था।
महाभारत में सेनाओं के ध्वजों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

पांडवों के व्यक्तिगत ध्वज

  • अर्जुन – गरुड़/कपिध्वज (हनुमान)

  • भीम – सिंह

  • नकुल – अश्व

  • सहदेव – मयूर

  • युधिष्ठिर – धर्मचिह्न

ध्वज यहाँ केवल पहचान नहीं, बल्कि मानसिक बल और आध्यात्मिक संरक्षण का प्रतीक था।

 पुराणकाल और ध्वज-प्रतीकों का विस्तार

पुराणों में ध्वज-परंपरा और व्यवस्थित रूप लेती है—

  • गणेश – स्वस्तिक

  • देवी दुर्गा – सिंह

  • कार्तिकेय – मयूर

  • सूर्य – रथ और किरण

यह काल धार्मिक प्रतीकों के दृश्य रूप से समृद्ध होने का काल था।

धार्मिक बनाम राजनैतिक ध्वज—स्पष्ट अंतर

सनातन परंपरा धार्मिक ध्वज और राजनैतिक ध्वज में भेद रखती थी—

  • धार्मिक ध्वज = शक्ति, स्मृति, दिग्दर्शन

  • राजनैतिक ध्वज = राज्य, वंश, सेना की पहचान

यह अंतर विविध परंपराओं को जीवन्त बनाए रखता था।

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क्या आज सनातन धर्म का कोई एक ध्वज है?

शास्त्रों में ऐसा कोई सार्वभौमिक ध्वज निर्धारित नहीं है।
आधुनिक समय में भगवा ध्वज को सनातन संस्कृति का प्रतिनिधि माना जाता है, पर यह शास्त्रीय आदेश नहीं बल्कि संस्कृति और परंपरा के व्यापक स्वीकार से आया है।

https://x.com/AshwiniSahaya/status/1993189180097327186?s=20

ध्वज सनातन धर्म का प्रतीक-चेतन इतिहास

ध्वज-परंपरा का विकास तीन चरणों में स्पष्ट होता है—

  1. वैदिक युग – संकेत, चेतना, दिशा

  2. रामायण-युग – राजवंशीय ध्वजों का उदय

  3. महाभारत-पुराण – देव-प्रतीकों का ध्वज-स्वरूप

सनातन धर्म में ध्वज किसी सत्ता का नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, धर्मपालन, पराक्रम और चेतना का प्रतीक रहा है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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