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Kalinjar Ki Rajnartaki: इतिहास के हाशिये से उठती एक कथा

Kalinjar Ki Rajnartaki: कालिंजर के उस इतिहास को मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसको इतिहास के पन्नो मे कोई स्थान नहीं मिला। मैंने कालिजर क्षेत्र मे लगभग दो वर्ष बिताए हैं और अभी भी जाता रहता हूँ। मैंने स्थानीय लोगों से पर्याप्त चर्चा मंत्रणा की है उन्होंने जो कुछ बताया जो उनके पूर्वजों ने उन्हें बताया, उन्ही तथ्यों को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रखकर उसका विश्लेषण किया है और जो इतिहास मुझे मिला है उसी को तत्कालीन घटना चक्र निर्मित कर मैने नाटक का रूप दिया है, नाटक इसलिये कि कथा और घटना को यह जीवन्त रूप देता है। 11वीं शताब्दी मे महमूद गजनवी के आक्रमण को चंदेल शासक गडदेव ने विफल किया, 13वीं शताब्दी मे कुतुबुद्दीन ने दुर्ग पर कब्जा कर लिया था, पर इस बार बुंदेला शासक ने दुर्ग पर कब्जा कर लिया। 1530 से 1545 तक मुगल शासक हुमायूं प्रयास करता रहा पर दुर्ग को नहीं जीत पाया।

कलात्मक रचनाओं का केंद्र कालिंजर

1545 मे शेरशाह ने 6 माह तक किले पर तोप के गोले बरसाए पर दुर्ग को नहीं जीत सका परन्तु इन छह महीनो में दुर्ग और दुर्ग के चारों ओर स्थापित हजारों शिवलिंगो और मंदिरो का जो विध्वंस हुआ यह कभी भी कालिजर या यहाँ के निवासियों ने नहीं देखा था। सांस्कृतिक गतिविधियों और कलात्मक रचनाओं का केंद्र कालिंजर और यहाँ बसे अन्तःवासी जो भक्तिकाल में आयी वैराग्य की आधी को रोकने के लिये, गृहस्थ आश्रम की ओर समाज को आकर्षित करने के लिए गन्धर्व कलाओ के माध्यम से सृष्टि को बचाने में लीन थे, शिव के नर्तक स्वरूप को विभिन्न आयाम दे रहे थे, एकाएक स्तब्ध हो गए। इस विपत्तिकाल में महान क्षत्रिय वंश चदेल की राजकुमारी दुर्गावती का विवाह जनजाति गोड कुल में होना और युद्ध भूमि में मुगलो से लड़ते-लते स्वयं वीर गति को प्राप्त करना अपने सीने में खंजर घोप कर अपनी अस्मिता को बचाने के लिए जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं को मैं आपके समक्ष रख रहा हूँ। जहाँ चंदेल शासक कीरत सिंह का राष्ट्र की रक्षा के लिए सामाजिक रुढ़िवादिता का परित्याग है वही वीरांगना पुत्री दुर्गावती का इतिहास है जो राजपूताना के क्षत्रिय कुल की वीरांगनाओं को अपनी अस्मिता बचाने के लिए प्रेरणा दे गया।

नीलकण्ठेश्वर यहीं पर हैं

इतना ही नहीं सृष्टि की रक्षा करने के लिए समुद्र मन्थन से निकले विष का पान कर शिव सृष्टि सर्जक ब्रम्हा के अनुरोध पर शांत हो कर नीलकंठेश्वर के रूप में यहीं स्थापित हो गए। शिव के इस त्याग से कालिंजर ही नहीं संपूर्ण बुंदेलखण्ड की हवा मे एक नया रोमांच उस समय आया जब भक्तिकाल के प्रभाव से लोग ब्रम्हचर्य आश्रम से सीधे वानप्रस्थ आश्रम में जाने लगे थे। गृहस्थ आश्रम समाप्त होने की कगार पर था। उस समय इसी दुर्ग के शासक चंदेलों ने जो कुछ किया उसकी कल्पना किसी ने नही की थी। परन्तु मध्य युग में भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे विदेशी आक्रान्ताओं के पांव पड़े जो नारी को देवी नहीं कामवासना की वस्तु मानते थे।

कालिंजर की राजनर्तकी

शेरशाह सूरी भी ऐसा ही एक अफगान योद्धा था जो मुगल सेना में सिपाही था और विद्रोह कर शासक बन गया था। बुंदलेखण्ड विजय के दौरान उसने कालिंजर की राजनर्तकी के सौन्दर्य के विषय में लोगों से सुना और उसको प्राप्त करने के लिए वह छह माह तक कालिंजर की तलहटी में छावनी बनाकर रुका रहा, तोपखाना स्थापित कर कालिंजर पर आग के गोले बरसाता रहा। ऐसे विषम काल में उस राजनर्तकी की मनोव्यथा का चित्रण और उन छह महीनो मे कालिंजर दुर्ग पर हो रहे घटनाचक्रों को मेने नितान्त संयम से चित्रित किया है। कालिंजर दुर्ग पर दिन मे और रात में कई बार रहकर वहाँ की हवा में आज भी बसे कम्पन और स्पंदन को आत्मसात कर कल्पना का सहारा लेकर मैने दृश्यों, घटनाओं और संवाद की रचना की है। इस नाटक को लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि राजनीतिक घटनाचक्र और राजनैतिक उद्देश्यों के लिए बनायी गयी इमारतें. सड़कें, परम्पराएं हमारा इतिहास नही है।

भारत के मूल शासकों की बात

मानवजाति की रक्षा के लिए, मानवीय सोच से कार्य करने वाले भारत मूल के शासक भले ही तोप और बारूद से हार गए हों पर समाज और राष्ट्र के लिए उनके योगदान को भी इतिहास के पन्नों में स्थान मिलना चाहिए था। लार्ड मैकाले की अग्रेजी भाषा या विदेशी आक्रांताओं की अरबी और फारसी शिक्षानीति भारतवासियों की सोच बदलने के लिए थी, अग्रेजों द्वारा रेलपथों का निर्माण भारतवासियों के लिए नहीं बल्कि भारत का कच्चा माल ट्रेनों में भरकर बन्दरगाह तक पहुँचाने और वहाँ से पानी के जहाजों में भर ब्रिटेन पहुँचाने के लिए और शेरशाह सूरी द्वारा जी टी रोड और उस पर सरायों का निर्माण पूरे भारत में सेना के जाने और रुकने के लिए था तभी उसने इसे मुल्तान तक बनवाया क्योंकि वही से हुमायूँ के आक्रमण का डर था जिसे वह खदेड़ चुका था।

मन और आत्मा में झांकने का प्रयास

ईस्ट इंडिया का कलकत्ता मे फोर्ट विलियम किला ब्रिटिष ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सुरक्षा के लिए बनाया गया। मुगलों का आगरा, दिल्ली, फतेहपुर सीकरी, इलाहबाद के किले अपने को सुरक्षित रखने, अय्याशी के लिए अवयस्क, वयस्क कन्याओं को हरम बनाकर रखने के लिए थे। यही सब दिखा इतिहासकारों को और कुछ ने भारत के भीतर झांकने का प्रयास किया तो उन्हें केवल आर्थिक असमानता और भौतिक आवश्यकताओं का असमान विवरण ही दिखा। किसी ने भारतवासियों के मन और आत्मा को झांक कर नहीं देखा। देखते भी तो कैसे? विदेशी आक्रांताओ द्वारा संरक्षित इतिहास लेखकों का साहित्य ही उनका मार्ग दर्शक था, अंग्रेजों द्वारा अपने गजट में लिखे गए विद्रोहों चाहे किसानों का हो चाहे मंगल पाण्डेय का, वही जानकारी का मूल स्रोत था।

https://x.com/historiakayasth/status/1991061748179509614?s=20

मध्ययुगीन इतिहास चिंता का विषय

भारत के प्राचीन इतिहास पर इतिहासकारों द्वारा जो भी लिखा गया वह भ्रमित करने वाला नहीं था और इसमें सत्यतता का पुट है क्योंकि तत्समय के साहित्यकार और लेखक स्वछन्द रुप से अपनी भावना को ज्ञान को नाटक, ग्रन्थ, काव्य और महाकाव्य में व्यक्त कर रहे थे। उनके द्वारा लिखे साहित्य में तत्समय की सामाजिक दषा का चित्रण किया गया है। इसी कारण आधुनिक भारत और ब्रिटिष इतिहासकारों द्वारा प्राचीन भारत का इतिहास सत्य के समीप है। परन्तु मध्य युगीन इतिहास में तत्समय की सामाजिक सोच और सत्यतता का अभाव है। मैं इतिहास का छात्र था और ऐसे स्रोतों पर आधारित इतिहास को पढ़ते-पढ़ते ऊब गया था और उसी का परिणाम है कालिंजर की राजनर्तकी।

https://tesariaankh.com/merikahani-aaira-tennis-story-new-angle/

एक छोटा किरदार बड़ा असर

शासकों, राजाओं, सेनापतियों, इमारतों महलों के विषय में तो पर्याप्त साहित्य इतिहास के रूप में मिलता है, परन्तु एक छोटा किरदार जिसकी कोई राजनैतिक पृष्टिभूमि नही है फिर भी वह राजनैतिक घटनाचक्र का कारण हो सकता है, उसकी सोच किसी राष्ट्र का धरातल बना सकती है. उसका योगदान किसी राष्ट्र का निर्माण और उसका त्याग किसी राष्ट्र की रक्षा कर सकता है, यही संदेश देने के लिए मैने इस नाटक की रचना की है। कालिंजर की राजनर्तकी जिसे सुन्दरी के नाम से आज भी कालिंजर के लोग याद करते हैं- चंदेलों के वैभवशाली इतिहास में ऐसा ही एक छोटा किरदार था।

पुस्तक इमेज एंड क्रियेशन वेलफेयर सोसाइटी एस-293, सहारा शापिंग सेंटर, फैजाबाद रोड, लखनऊ में उपलब्ध है।

लेखक – रमेश मिश्र

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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