वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

प्रदूषण की असली कीमत: गर्भ में ही कमजोर फेफड़ों वाले बच्चे

जन्म के बाद बढ़ती बीमारियाँ कम जन्म वजन, समय से पहले प्रसव, नवजातों में निमोनिया और बचपन से ही अस्थमा—बढ़ता हुआ ‘नेशनल हेल्थ इमरजेंसी’ का संकेत है।

दिल्ली। हर सर्दी, 14 वर्षीय आहान भल्ला अपना पसंदीदा खेल—क्रिकेट—छोड़ने को मजबूर हो जाता है। जैसे ही दिल्ली की हवा में स्मॉग की मोटी परत जमती है और AQI 300 के ऊपर पहुँचता है, वह मैदान में कुछ मिनट खेलते ही हाँफने लगता है। पिछले कई वर्षों से अस्थमा से जूझ रहे आहान की दवाइयाँ, इनहेलर और नेज़ल स्प्रे उसके दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। यही दिनचर्या अब उसकी आठ वर्षीय बहन ने भी अपना ली है। दोनों को हर सर्दी डॉक्टरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

AIIMS दिल्ली के पीडियाट्रिक OPD में बच्चों की वही हालत दिखती है—थके, कमजोर, लगातार खाँसते हुए। डॉ. काना राम जाट, प्रोफेसर, पल्मोनोलॉजी, का कहना है, “पिछले 10 सालों में बच्चों में अस्थमा के मामलों में तेज़ वृद्धि हुई है। हर नवंबर, जैसे ही प्रदूषण बढ़ता है, OPD और इमरजेंसी दोनों में बच्चों की भीड़ बढ़ जाती है।”

गर्भ में शुरू होती समस्या: ‘पॉल्यूशन-फेटस कनेक्शन’

डॉ. जाट बताते हैं कि समस्या सिर्फ जन्म के बाद की नहीं है—यह गर्भ में ही शुरू हो जाती है।
गर्भवती माँ द्वारा साँस में ली गई जहरीली हवा सीधे भ्रूण तक पहुँचती है। इससे बच्चा कम वजन लेकर जन्म लेता है, फेफड़ों का विकास अधूरा  रह जाता है, एलर्जी एवं अस्थमा का खतरा कई गुना बढ़ जाता है और जन्म के बाद NICU में लंबा समय बिताना पड़ता है। वे बताते हैं, “माँ के खून में प्रदूषक घुलकर प्लेसेंटा तक पहुँचते हैं, जिससे सूजन और ऑक्सिजन की कमी होने लगती है। इससे भ्रूण का शारीरिक विकास बाधित होता है। कई बार फेफड़े बाहर की दुनिया के लिए तैयार ही नहीं होते।”

अध्ययन बताते हैं कि PM2.5, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे प्रदूषक बच्चों के DNA में बदलाव तक कर सकते हैं, जो भविष्य में मधुमेह, हृदय रोग और फेफड़ों की बीमारियों की जमीन तैयार करते हैं।

गुड़गाँव में बढ़ते मामले: ‘पहले दुर्लभ था, अब सामान्य’

30 किलोमीटर दूर, गुड़गाँव स्थित पारस अस्पताल में डॉ. मनीष मानन, हेड ऑफ पीडियाट्रिक्स और नियोनेटोलॉजी, पिछले कुछ वर्षों में मरीजों में आए बदलावों को लेकर बेहद चिंतित हैं।

https://x.com/GoFundMe_Nate/status/1985961289739604369?s=20

उनका साफ कहना है, “पहले कम जन्म वजन, समय से पहले प्रसव और नवजातों में निमोनिया दुर्लभ था—अब रोज़मर्रा की बात हो गई है।” वे बताते हैं कि प्रदूषण न सिर्फ माँ की प्रतिरक्षा को कमजोर करता है, बल्कि नवजात के फेफड़ों की क्षमता भी कम कर देता है, जिसके कारण जन्म के तुरंत बाद साँस लेने में दिक्कत, लंबी NICU स्टे, शुरुआती दिनों में ही निमोनिया और खाँसी और भविष्य में क्रॉनिक रेस्पिरेटरी डिज़ीज़ का खतरा रहता है।

हवा में तैरते माइक्रोप्लास्टिक्स: नया खतरा

डॉक्टरों के अनुसार, सिर्फ धूल या PM2.5 ही नहीं, बल्कि हवा में तैरते माइक्रोप्लास्टिक भी शरीर के हार्मोनल सिस्टम को बाधित कर रहे हैं। ये प्लास्टिक: प्लेसेंटा, नाल (umbilical cord), भ्रूण के खून तक में पाए जा रहे हैं, जो सीधा संकेत है कि हवा का हर कण गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास को प्रभावित कर रहा है।

बच्चे जन्म से ही बीमार क्यों?

विशेषज्ञ बताते हैं कि फेफड़ों का विकास पूरा होने में 9 महीने लगते हैं, गर्भावस्था के हर चरण में प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है, बच्चे छोटे फेफड़ों, कमजोर इम्यून सिस्टम और संवेदनशील एयरवेज के साथ जन्म लेते हैं। डॉ. मानन कहते हैं, “हम अब ऐसे बच्चों को देख रहे हैं जो जन्म के कुछ हफ्तों के भीतर ही गंभीर निमोनिया से पीड़ित हो जाते हैं। यह स्थिति दस साल पहले दुर्लभ थी।”

क्या है समाधान?

गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए घर में एयर प्यूरीफायर सिस्टम हो, धूपबत्ती, मच्छर कॉइल जैसे धुएँ से दूरी रखें। पीक प्रदूषण टाइम में खिड़कियाँ बंद रखें। बाहर खेलना या गतिविधि सीमित रहे। विटामिन C और E जैसे एंटीऑक्सीडेंट फूड का सेवन करें। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराएं। समुदाय स्तर पर स्कूली बच्चों के लिए एयर प्यूरीफायर, पौधारोपण, मास्क उपयोग की जागरूकता, प्रदूषण-आधारित स्कूल नीति की जरूरत

नीति स्तर पर:

डॉ. मानन का स्पष्ट संदेश है— “यह सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं है, यह नवजात स्वास्थ्य का संकट है। प्रदूषण कम करने की नीति अब विलासिता नहीं, अनिवार्यता है।” वे मांग करते हैं साफ ईंधन, सख़्त उत्सर्जन मानक, मजबूत निगरानी प्रणाली, शहरी प्लानिंग में ‘क्लीन एयर इंडेक्स’ को प्राथमिकता की। प्रदूषण अब सिर्फ खाँसी, जलन या आँखों में पानी भर आने तक सीमित समस्या नहीं रहा।

https://tesariaankh.com/mobile-syndrome-rising-cases-digital-addiction-health-risks/
यह आने वाली पीढ़ियों के फेफड़ों, DNA और जीवन-समय को प्रभावित करने वाली राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति बन चुका है। गर्भ में बीमार पड़ते बच्चे और जन्म से अस्थमा का बोझ उठाते लाखों परिवार—यह संकेत हैं कि अब समाधान नहीं, तत्काल हस्तक्षेप का समय आ चुका है।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अंकिता उपाध्याय और अनोना दत्ता के लेख पर आधारित

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें