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Trump Modi Strategy Middle East: ट्रम्प का ‘मोदी प्रेम’ और मिडिल ईस्ट का युद्ध: भारत के लिए राहत या कूटनीतिक चुनौती?

Trump Modi Strategy Middle East:  मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसे हालात गहराते जा रहे हैं और इसी बीच एक दिलचस्प कूटनीतिक संकेत सामने आया है। Donald Trump ने Narendra Modi को “परिणाम देने वाला साझेदार” बताते हुए खुलकर तारीफ की है। U.S. Embassy in India द्वारा साझा किए गए इस संदेश के साथ दोनों नेताओं की हैंडशेक वाली तस्वीर भी पोस्ट की गई—और यह सब ऐसे समय में हुआ है जब Iran के खिलाफ अमेरिकी-इजरायली हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव चरम पर है।

Trump Modi Strategy Middle East: : महज औपचारिकता या सोची-समझी रणनीति?

यह तारीफ महज एक औपचारिक बयान नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक संकेत देखे जा रहे हैं। सवाल उठता है—क्या यह सच में व्यक्तिगत समीकरण की मजबूती है या फिर बदलते वैश्विक समीकरणों में एक सोची-समझी रणनीति?

मिडिल ईस्ट का त्रिकोणीय संघर्ष और भारत का संतुलन

दरअसल, 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिकी-इजरायली हमलों ने मिडिल ईस्ट को अस्थिरता के नए दौर में धकेल दिया है। इन हमलों में Iran के सर्वोच्च नेता की मौत ने हालात को और विस्फोटक बना दिया। ऐसे में दुनिया भर की नजरें उन देशों पर टिकी हैं जो इस संकट में संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं—और भारत उनमें सबसे अहम बनकर उभरा है।

इजरायल, ईरान और अमेरिका: भारत के लिए ‘कांटों की राह’

भारत की स्थिति इस पूरे घटनाक्रम में बेहद जटिल है। एक ओर उसके मजबूत रिश्ते Israel के साथ हैं, जो रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में अहम साझेदार है। दूसरी ओर, Iran के साथ भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं, जिनमें चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं, जो मध्य एशिया तक भारत की पहुंच का महत्वपूर्ण जरिया है। और तीसरी तरफ, United States के साथ बढ़ती साझेदारी है, जो खासकर China के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

इसी त्रिकोणीय संतुलन के बीच Donald Trump का यह बयान आता है। यह सिर्फ व्यक्तिगत प्रशंसा नहीं, बल्कि एक संदेश है—भारत को अमेरिका के साथ खड़े होने के लिए प्रोत्साहित करने का संदेश। खासकर तब, जब अमेरिका चाहता है कि इंडो-पैसिफिक से लेकर मिडिल ईस्ट तक उसकी रणनीति को सहयोगी देश मजबूती दें।

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भारत ने इस पूरे मामले में सावधानी से कदम बढ़ाया है। उसने हमलों पर चिंता जताई, संयम बरतने की अपील की और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी, लेकिन किसी पक्ष की खुली आलोचना से बचा। यही संतुलन अब आलोचना का कारण भी बन रहा है। The Diplomat जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों और कांग्रेस नेता Jairam Ramesh ने भारत की इस “न्यूट्रल” लाइन पर सवाल उठाए हैं, इसे उसकी पारंपरिक गुटनिरपेक्ष नीति से विचलन बताया जा रहा है।

तो क्या ट्रम्प का यह “मोदी प्रेम” असल में इस संतुलन को प्रभावित करने की कोशिश है? कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। जब आप किसी देश को सार्वजनिक रूप से “विश्वसनीय साझेदार” कहते हैं, तो आप उस पर एक तरह का नैतिक दबाव भी बनाते हैं कि वह आपके साथ खड़ा दिखे।

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हालांकि, इसे पूरी तरह रणनीति कहना भी जल्दबाजी होगी। Donald Trump और Narendra Modi के बीच व्यक्तिगत समीकरण पहले से ही मजबूत माने जाते रहे हैं—चाहे वह “Howdy Modi” जैसे कार्यक्रम हों या फिर विभिन्न द्विपक्षीय मुलाकातें। ऐसे में यह बयान उस व्यक्तिगत संबंध का विस्तार भी हो सकता है।

लेकिन असली सवाल यह है कि इससे भारत की नीति पर क्या असर पड़ेगा? फिलहाल संकेत यही हैं कि भारत अपने “संतुलन” की नीति से पीछे हटने के मूड में नहीं है। वह एक साथ Israel के साथ रक्षा सहयोग बनाए रखना चाहता है, Iran के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखना चाहता है और साथ ही United States के साथ अपनी साझेदारी को भी मजबूत करना चाहता है।

यानी भारत के लिए यह “या तो-या” का सवाल नहीं, बल्कि “सबके साथ” की रणनीति है। यही वजह है कि वह इस संकट में भी खुलकर किसी एक पक्ष में खड़ा होने से बच रहा है।

हालांकि, यह संतुलन हमेशा आसान नहीं रहेगा। अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध लंबा खिंचता है और वैश्विक ध्रुवीकरण बढ़ता है, तो भारत पर दबाव भी बढ़ेगा—खासकर United States की ओर से। ऐसे में ट्रम्प जैसे नेताओं के बयान भविष्य की उस संभावित कूटनीतिक खींचतान की झलक भी दे सकते हैं।

अंततः, ट्रम्प का “मोदी प्रेम” पूरी तरह न तो सिर्फ रणनीति है और न ही पूरी तरह व्यक्तिगत वास्तविकता। यह दोनों का मिश्रण है—जहां व्यक्तिगत संबंधों की गर्माहट को वैश्विक राजनीति के ठंडे गणित के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है।

और इसी में छिपा है आने वाले समय का बड़ा सवाल—क्या भारत इस संतुलन को बनाए रख पाएगा, या फिर वैश्विक दबाव उसे किसी एक खेमे की ओर धकेल देगा? फिलहाल, नई दिल्ली की कोशिश यही है कि वह हर रिश्ते को संभालते हुए अपने राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखे।

पाकिस्तान की मध्यस्थता: चर्चा में पहल, जमीन पर असर शून्य?

दूसरी ओर मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच Pakistan की मध्यस्थता की कोशिशें चर्चा में तो हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर बेहद सीमित नजर आ रहा है। सवाल उठ रहा है—क्या पाकिस्तान की शांति पहल फेल हो गई, या अभी उसे मौका ही नहीं मिला?

दरअसल, पाकिस्तान लंबे समय से खुद को इस्लामिक दुनिया में एक ऐसे देश के रूप में पेश करता रहा है जो संकट के समय बातचीत की राह निकाल सकता है। खासकर Iran और Saudi Arabia के बीच संतुलन बनाने की उसकी कोशिशें पहले भी देखी जा चुकी हैं। लेकिन मौजूदा संकट पहले से कहीं ज्यादा जटिल और खतरनाक है, जहां सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक शक्तियां आमने-सामने खड़ी हैं।

पेचीदे हालात

Israel और Iran के बीच टकराव अब सीधे टकराव में बदलता दिख रहा है, और इसमें United States की सक्रिय भूमिका ने हालात को और पेचीदा बना दिया है। ऐसे माहौल में मध्यस्थता की जगह लगातार सख्त होती सैन्य और रणनीतिक प्रतिक्रियाओं ने ले ली है। यही वजह है कि पाकिस्तान जैसे देश की पहल फिलहाल शोर से ज्यादा असर पैदा नहीं कर पा रही।

असल में इस समय बातचीत की मेज से ज्यादा युद्ध के मैदान का दबदबा है। बड़े फैसले सीधे वॉशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान के बीच तय हो रहे हैं, और छोटे या मध्यम ताकत वाले देशों के लिए बीच में जगह बनाना बेहद मुश्किल हो गया है। Pakistan की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है—इच्छा तो है, लेकिन प्रभाव सीमित है।

रास्ता खुलने के लिए इंतजार

हालांकि इसे पूरी तरह असफलता कहना भी जल्दबाजी होगी। कूटनीति में अक्सर मौके अचानक बनते हैं, खासकर तब जब संघर्ष लंबा खिंचता है और सभी पक्ष थकान महसूस करने लगते हैं। अगर यह टकराव आगे भी जारी रहता है, तो ऐसे देशों के लिए रास्ता खुल सकता है जो खुद को “तटस्थ संवादकर्ता” के रूप में पेश कर सकें। लेकिन फिलहाल हालात उस दिशा में जाते नहीं दिख रहे।

दिलचस्प यह भी है कि इसी दौरान India का रुख पाकिस्तान से अलग नजर आ रहा है। भारत खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करने के बजाय संतुलन बनाने की रणनीति पर चल रहा है—एक तरफ Israel के साथ रिश्ते, दूसरी तरफ Iran से जुड़े आर्थिक हित और तीसरी ओर United States के साथ बढ़ती साझेदारी। यही संतुलन उसे ज्यादा प्रासंगिक और प्रभावी बना रहा है।

पाकिस्तान के लिए चुनौती यह है कि वह इस बहु-स्तरीय संघर्ष में खुद को किस तरह उपयोगी साबित करे। केवल बयान देने या मध्यस्थता की पेशकश करने से बात नहीं बनेगी, जब तक कि उसके पास ऐसा प्रभाव न हो जिसे बड़े खिलाड़ी नजरअंदाज न कर सकें। फिलहाल यही कमी साफ दिख रही है।

राष्ट्रीय हित बनाम वैश्विक दबाव

निष्कर्ष यही निकलता है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशें अभी “फेल” नहीं तो कम से कम “फ्रोजन” जरूर हैं—यानि न पूरी तरह खत्म हुई हैं, न ही किसी ठोस नतीजे तक पहुंची हैं। मौजूदा दौर में जहां ताकत और रणनीति हावी है, वहां बातचीत की गुंजाइश सीमित हो गई है। अगर हालात बदले, युद्ध लंबा खिंचा और कूटनीतिक खिड़कियां खुलीं, तभी पाकिस्तान जैसी पहल को असली परीक्षा और शायद मौका मिल पाएगा।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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