New Delhi: संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत के साथ ही एक नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है। इस बार चर्चा किसी नीति, बिल या आर्थिक मुद्दे पर नहीं बल्कि कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के पहनावे को लेकर हो रही है। संसद पहुंचते समय राहुल गांधी के कार्गो पैंट पहनने का वीडियो सामने आने के बाद भाजपा के कुछ नेताओं ने इसे लेकर सवाल खड़े कर दिए।
भाजपा सांसद ऋषि बगड़ी और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने राहुल गांधी के पहनावे को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि संसद “लोकतंत्र का मंदिर” है और यहां आने वाले जनप्रतिनिधियों को उसकी गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। उनका कहना था कि इस तरह के कैज़ुअल कपड़े संसद की गरिमा के अनुरूप नहीं हैं।
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हालांकि इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में एक अलग बहस शुरू हो गई। कांग्रेस समर्थकों और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे अनावश्यक विवाद बताते हुए कहा कि संसद में सांसदों के लिए कोई औपचारिक ड्रेस कोड तय नहीं है। ऐसे में किसी सांसद के कपड़ों को मुद्दा बनाना वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश माना जा रहा है।
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इन पर चर्चा क्यों नहीं करते
भारत की संसद में अलग-अलग राज्यों और परंपराओं से आने वाले सांसद अक्सर अपनी सांस्कृतिक वेशभूषा में नजर आते रहे हैं। दक्षिण भारत के कई सांसद लुंगी या धोती में संसद आते रहे हैं। वहीं संन्यासी पृष्ठभूमि से आने वाले सांसद भगवा वस्त्रों में भी संसद की कार्यवाही में भाग लेते रहे हैं।
इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कई अवसरों पर कुर्ता-पायजामा या चूड़ीदार पहनकर संसद में पहुंचे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि कोई औपचारिक ड्रेस कोड मौजूद नहीं है, तो राहुल गांधी के पहनावे को लेकर इतना बड़ा राजनीतिक विवाद क्यों खड़ा किया जा रहा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बजट सत्र के दौरान जहां अर्थव्यवस्था, महंगाई, रोजगार और नीतिगत फैसलों जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए, वहां कपड़ों को लेकर विवाद खड़ा होना राजनीति की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़ा करता है।
संबंधों पर व्यवहार पर चर्चा
इसी के साथ एक और पहलू भी सामने आता है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सगे भाई-बहन हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर कई बार उनके संबंधों और व्यवहार को लेकर भी टिप्पणियां की जाती रही हैं। आरोप यह भी लगता रहा है कि इस तरह की टिप्पणियों में सत्ता पक्ष के कुछ नेता और समर्थक भी पीछे नहीं रहते। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन निजी संबंधों या पारिवारिक दायरे को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों को कई लोग “बिलो द बेल्ट” हमला मानते हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की राजनीतिक संस्कृति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करती है। जब बहस नीतियों और मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत जीवन, कपड़ों या पारिवारिक रिश्तों तक पहुंच जाती है, तो इससे लोकतंत्र की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।
बहरहाल, संसद के भीतर और बाहर जारी यह बहस सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं रह गई है। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भारतीय राजनीति में वास्तविक नीतिगत बहसों की जगह अब प्रतीकों और व्यक्तिगत टिप्पणियों ने ले ली है। आने वाले दिनों में बजट सत्र के दौरान यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इस विवाद से आगे बढ़कर देश के वास्तविक मुद्दों पर कितनी गंभीरता से चर्चा करते हैं।








