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Indian Rupee Record Low: 94.96 के पार रुपया, ईरान युद्ध या ट्रम्प की चाल?

भारतीय मुद्रा ने आज 94.96 का अब तक का सबसे निचला स्तर छूकर बाजार में हड़कंप मचा दिया है। ईरान युद्ध की आग ने न केवल कच्चे तेल को $107 प्रति बैरल के पार पहुँचा दिया है, बल्कि दलाल स्ट्रीट से एक ही घंटे में ₹7 लाख करोड़ साफ़ कर दिए। लेकिन सवाल यह है: क्या भारत का रुपया कमजोर है, या इसे कमजोर रहने दिया जा रहा है?

1. ‘ट्रम्प टैरिफ’ और ईरान युद्ध का ‘डबल धमाका’

इस गिरावट की पटकथा जनवरी 2026 में ही लिखी गई थी, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नए टैरिफ का ऐलान किया। इसके बाद 28 फरवरी को ईरान पर हुए हमलों ने आग में घी का काम किया।

  • तेल का बोझ: भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारत का मासिक आयात बिल $8 बिलियन तक बढ़ गया है।

  • इन्वेस्टर का डर: अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशकों (FPIs) ने इस साल अब तक ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा निकाल लिए हैं।

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2. क्या यह भारत की ‘राजनीतिक रणनीति’ है?

आमतौर पर आरबीआई (RBI) रुपये को बचाने के लिए आक्रामक तरीके से डॉलर बेचता है, लेकिन इस बार विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई ‘कंट्रोल्ड डेप्रिसिएशन’ (Controlled Depreciation) की नीति अपना रहा है।

  • निर्यात को फायदा (Export Edge): रुपया कमजोर होने से भारतीय सामान विदेशों में सस्ता हो जाता है, जिससे निर्यात बढ़ सकता है।

  • विदेशी मुद्रा भंडार का बचाव: आरबीआई अपने $700 बिलियन के भंडार को युद्ध जैसी लंबी स्थिति के लिए बचाकर रख रहा है, न कि उसे रुपये को एक कृत्रिम स्तर पर टिकाने में बर्बाद कर रहा है।

https://tesariaankh.com/politics-noida-international-airport-analysis/

3. सोशल मीडिया पर ‘रुपी वॉर’ और ट्रेंड्स

ट्विटर और फेसबुक पर #RupeeAt95 और #IndianEconomy ट्रेंड कर रहा है। जहाँ एक तरफ लोग महंगाई बढ़ने (Imported Inflation) को लेकर डरे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर ‘ग्लोबल साउथ’ के समर्थक इसे ‘डॉलर की दादागिरी’ के खिलाफ एक नए ग्लोबल पेमेंट सिस्टम (जैसे कि गोल्ड-बैक्ड सिस्टम) की जरूरत बता रहे हैं।

https://x.com/INCIndia/status/2037495826839204199?s=20

तीसरी आंख का निष्कर्ष:

रुपये का 95 की ओर बढ़ना निश्चित रूप से मिडिल क्लास की जेब पर भारी पड़ेगा (महंगा पेट्रोल, इलेक्ट्रॉनिक्स और विदेश घूमना)। लेकिन अगर भारत अपनी ‘ऑर्डरली डेप्रिसिएशन’ की नीति पर टिका रहता है, तो यह लॉन्ग टर्म में चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ भारतीय निर्यात को मजबूती दे सकता है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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