भारतीय राजनीति एक बार फिर अपने शब्दों को लेकर कटघरे में है। ताजा विवाद Himanta Biswa Sarma के उस बयान से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge को लेकर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके बाद माहौल तेजी से गरमा गया। राजनीतिक बयान, फिर प्रतिक्रिया, फिर पलटवार। और देखते ही देखते मुद्दा बहस से हटकर टकराव में बदल गया। उन्होंने राहुल गांधी को भी निशाना बनाया। पवन खेड़ा जिनके आरोप को लेकर विवाद की शुरुआत हुई उनको भी गाली दी और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। कानून अपना काम करेगा। लेकिन राजनीति में आपा खोना उचित नहीं है।
राजनीति में भाषा का पतन: आखिर यह शुरुआत कहां से हुई?
अगर थोड़ा पीछे जाएं, तो तस्वीर साफ दिखती है। एक समय था जब संसद और मंचों पर तीखी बहस होती थी। लेकिन शब्दों में मर्यादा बनी रहती थी। ऐसा जवाहर लाल नेहरू आदि नेताओं के समय भी होता था। लेकिन लोग आरोप प्रत्यारोप का स्तर बनाकर चलते थे। इतना ही नहीं एक दूसरे के यहां होने वाले शादी ब्याह या अन्य आयोजनों में शामिल होते थे। राजनीति में विरोध और आपसी संबंधों में संतुलन रहता था। आज किसी भी स्तर पर राजनीति में यह संतुलन खत्म हो रहा है। रिश्तों में आर रही खटास से चौड़ी होती खाई इतनी गहरी हो गई है कि समाज के सामाजिक ताने बाने को राजनीति प्रभावित करने लगी है।
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आज क्या हो रहा है?
असहमति अब सीधे आरोप में बदलती है। और उसकी भाषा ऐसी है जैसे वह एक दूसरे को जानी दुश्मन हैं और सामने पड़ जाएं तो गोली मार दें। इसी का नतीजा है कि आलोचना अब व्यक्तिगत हमले में बदल जाती है। जिसने चरित्रहनन की राजनीति की परंपरा को जन्म दे दिया है। जब एक जिम्मेदार पद पर बैठा नेता सार्वजनिक रूप से अपमानजनक असभ्य भाषा का इस्तेमाल करता है, तो यह सिर्फ एक बयान नहीं रहता। यह एक ट्रेंड सेट करता है। ऐसा करने में कोई बुराई नहीं है यानी इससे नीचे तक संदेश जाता है कि अब यह “नॉर्मल” है।
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प्रतिक्रिया और पलटवार: सियासत का तयशुदा पैटर्न
जैसे ही बयान आया, सोशल मीडिया की दीवारें प्रतिक्रियाओं से रंग गईं। Rahul Gandhi ने इसे शर्मनाक बताया। Priyanka Gandhi Vadra ने भी कड़ी आपत्ति जताई। लेकिन यहीं कहानी खत्म नहीं होती। दूसरी तरफ से जवाब आया— पुराने बयानों को उठाया गया और आरोपों का नया दौर शुरू हुआ यानी बहस का केंद्र बदल गया।नतीजतन अब चर्चा यह नहीं रही कि “क्या कहा गया?” बल्कि यह बन गई कि “पहले किसने क्या कहा था?” और यहीं से असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
मुद्दे गायब, व्यक्तित्व केंद्र में: राजनीति का बदलता फोकस
आज की राजनीति में एक बड़ा बदलाव साफ दिखता है। पहले चुनाव विकास, नीतियों और योजनाओं पर लड़े जाते थे। अब क्या हो रहा है? सत्ता पक्ष एक सोची समझी राजनीति के तहत वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देता है और नेता ही मुद्दा बन गए हैं और उनकी छवि ही राजनीति बन गई है, Jawaharlal Nehru से लेकर Manmohan Singh तक पूरे अतीत को आज बहस का हथियार बनाया जा रहा है। हर पार्टी यह साबित करने में लगी है कि “दूसरे ने कुछ नहीं किया” तो हम क्यों करें। लेकिन इसी बहस में यही वर्तमान के सवाल गायब हो जाते हैं जैसे—रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य।
सोशल मीडिया: बहस नहीं, भीड़ का शोर
अब राजनीति का सबसे बड़ा मंच बदल चुका है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को आवाज दी है। लेकिन इसके साथ एक समस्या भी आई है। हर बयान सेकंडों में वायरल, हर प्रतिक्रिया तुरंत ट्रेंड और हर बहस भावनाओं में बह जाती है तथ्य पीछे रह जाते हैं। भावनाएं आगे आ जाती हैं। क्योंकि भीड़ को यह नहीं पता कि इस समय असल मुद्दा क्या था उसके लिए क्या महत्वपूर्ण है एक भड़ चाल में सारा देश बह जाता है और नेता भेड़ बकरियों के देश के चरवाहे बनकर माल और मलाई काटने में लगे हैं। कई बार देखा गया है कि आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर पूरी धारणा बना ली जाती है और यही माहौल भाषा को और आक्रामक बना देता है।
क्या यह रणनीति है या मजबूरी?
यह सबसे दिलचस्प सवाल है। क्या नेता जानबूझकर ऐसा करते हैं? या हालात उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करते हैं? कुछ विश्लेषक मानते हैं— तीखी भाषा से ध्यान खींचा जाता है समर्थक वर्ग जल्दी mobilize होता है दूसरी तरफ, यह भी कहा जाता है— जब ठोस मुद्दे कमजोर पड़ते हैं तब भाषा को हथियार बना लिया जाता है दोनों ही स्थितियों में एक चीज साफ है—संवाद कमजोर होता है
राजनीतिक विरासत: हम क्या छोड़कर जा रहे हैं?
यह सवाल सबसे गंभीर है। आज जो राजनीति हो रही है, वही कल की सीख बनेगी। अगर आज—अपमान सामान्य हो गया आरोप ही राजनीति बन गए तो आने वाली पीढ़ी क्या सीखेगी?क्या वह भी यही मानेगी कि बहस का मतलब है एक-दूसरे को नीचा दिखाना? अगर ऐसा हुआ, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो जाएगी।
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राजनीति या भड़ैती?
आरोप-प्रत्यारोप राजनीति का हिस्सा हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है। लेकिन फर्क पड़ता है— भाषा से, तरीके से, नीयत से, आज जरूरत है कि राजनीति फिर से मुद्दों पर लौटे, संवाद को महत्व दे और मर्यादा को स्वीकार करे। अंत में सवाल वही है क्या हम राजनीति कर रहे हैं…या सिर्फ शोर मचा रहे हैं?








