घंटी बाहर नहीं, भीतर बज रही है
राजनीति में पराजय पहले परिणामों में नहीं, मनोभावों में दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में आज जो सबसे गहरी हलचल है, वह विपक्ष के शोर से नहीं, सत्ता पक्ष के पुराने कार्यकर्ताओं की चुप्पी से पैदा हो रही है। Bharatiya Janata Party के भीतर वह वर्ग, जिसने 1980 के दशक से झंडा उठाया, पोस्टर लगाए, साइकिल से गांव-गांव संगठन खड़ा किया—आज खुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है। यह वे लोग हैं जो Bharatiya Jana Sangh के दिनों से विचार की राजनीति करते आए, जिन्होंने सत्ता नहीं, संघर्ष देखा। आज वही लोग पूछ रहे हैं—
“क्या हम सिर्फ इतिहास की तस्वीर बनकर रह गए?”
विकल्पहीनता का भ्रम
जमीनी बातचीत में एक वाक्य बार-बार सुनाई देता है—“पार्टी को लगता है कि लोग विकल्पहीनता में वोट दे रहे हैं, देंगे… हमें आपकी ज़रूरत नहीं।” यह सबसे खतरनाक मनोविज्ञान है।
जब संगठन यह मान ले कि जनाधार स्वाभाविक है, अर्जित नहीं—तब गिरावट की नींव पड़ती है। कई पुराने कार्यकर्ता खुलकर कहते हैं— “हमें पूछा नहीं जाता, बुलाया नहीं जाता। निर्णय ऊपर होते हैं, नीचे सिर्फ पालन होता है।”
डस्टबिन में दिग्गज, मंच पर मैनेजर
शुरुआती दौर से अब तक की राजनीति में जिन चेहरों ने पार्टी को जिलाया, खड़ा किया, संकट में संभाला—वे आज ‘अनुपयोगी’ मान लिए गए। उनकी जगह किसने ली? भीड़ जुटाने वाले, इवेंट मैनेजमेंट करने वाले, ठेके पर सक्रिय लोग। राजनीति विचार से प्रबंधन तक सिमट गई है। और प्रबंधन कभी भी भावनात्मक निष्ठा की जगह नहीं ले सकता।
पार्टी कार्यालयों की खामोशी
कई जिलों में पुराने कार्यकर्ता पार्टी कार्यालयों में जाते तो हैं, पर उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे वे “अनावश्यक” हों। यह मान लिया गया है कि “ये तो हर हाल में यहीं वोट देंगे…
इनके घर से पहले जनसंघ, फिर भाजपा को वोट मिलता रहा है… ये जाएंगे कहां?” यही सोच चुभ रही है। निष्ठा को स्थायी संपत्ति मान लिया गया है। जबकि राजनीति में निष्ठा भी सम्मान चाहती है।
यह बगावत नहीं, पीड़ा है
ध्यान रहे—यह खुली बगावत नहीं है। यह भीतर की कचोट है। और राजनीति में सबसे घातक वही होती है जो दिखती नहीं। पुराना कार्यकर्ता पार्टी छोड़ता नहीं। वह बस सक्रिय होना छोड़ देता है। फोन कम उठाता है। बूथ पर पहले जैसी ऊर्जा नहीं दिखाता। जनमत बनाने की तीव्रता घट जाती है। और चुनाव परिणाम उसी कमी को जोड़कर फैसला सुनाते हैं।
सवाल गंभीर है
क्या पार्टी सचमुच यह मान बैठी है कि विकल्पहीनता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है? क्या यह विश्वास संगठन की जड़ों को कमजोर कर रहा है? उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव हमेशा अचानक नहीं आता। वह पहले भीतर जन्म लेता है। आज जो पीड़ा पुराने कार्यकर्ताओं के भीतर है— वही आने वाले समय की आहट भी हो सकती है। घंटी बज चुकी है। सवाल यह है— क्या उसे सुना जाएगा, या फिर यह मान लिया जाएगा कि “ये जाएंगे कहां?”
देखा जाए तो राजनीति में हार की शुरुआत विपक्ष से नहीं, अपने घर से होती है। उत्तर प्रदेश में आज जो सबसे गंभीर संकेत मिल रहे हैं, वे मंच से दिए गए भाषणों से नहीं, बल्कि खामोश बैठे उस कार्यकर्ता से मिल रहे हैं जिसने पिछले दस साल पार्टी के लिए अपना समय, श्रम और सामाजिक पूंजी झोंक दी। पार्टी ने एक दशक तक लगातार जीत दर्ज की। 2017, 2019, 2022—हर चुनाव ने यह संदेश दिया कि संगठन अभेद्य है। लेकिन लंबी सत्ता अक्सर आत्मविश्वास और अहंकार के बीच की रेखा धुंधली कर देती है। वही यहां पर भी दिख रहा है। भाजपा का प्रदेश कार्यालय आज मिनी सचिवालय बन चुका है जहां आम आदमी घुस नहीं सकता। पहले पर्ची भेजो फिर अंदर बैठा वीआईपी नेता बुलाना चाहे तो जाओ वरना अपनी अर्जी गेट पर देकर रुखसत हो जाओ। काम तो होना ही नहीं है।
“हम जीते रणनीति से, कार्यकर्ता से नहीं”
सभासद से लेकर विधायक और मंत्री तक कोई भी जनता या कार्यकर्ता से संवाद के लिए तैयार नहीं है। जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी टीस यही सुनाई दे रही है। दूसरे दलों से आए नेताओं को पद मिल गए लेकिन संगठन के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता को कोई वजन नहीं मिला। प्रदेश में मंत्री रहे सरदार सरजीत सिंह डंग का कहना है वर्तमान राजनीति में हमारे लिए जगह नहीं है। सवाल करने पर कहते हैंं, “हमें कभी पूछा ही नहीं गया।” यह मान लिया गया है कि चुनाव बूथ के पसीने से नहीं, डेटा और मैनेजमेंट से जीते जाते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति एक्सेल शीट से नहीं, रिश्तों से चलती है।जब कार्यकर्ता यह महसूस करने लगे कि उसकी भूमिका केवल भीड़ जुटाने तक सीमित है, नीति-निर्माण और अवसरों से उसका कोई संबंध नहीं—तो वह सक्रिय समर्थक से निष्क्रिय दर्शक बन जाता है।
सत्ता की मलाई, सीमित चेहरे
दस साल की सत्ता में लाभ किसे मिला? बोर्ड-निगम, ठेके, प्रशासनिक पहुंच—सब कुछ कुछ चेहरों के इर्द-गिर्द सिमट गया। जिस कार्यकर्ता ने गांव-गांव जनमत तैयार किया, उसे प्रतीक्षा के अलावा कुछ नहीं मिला। राजनीति में प्रतीक्षा सबसे बड़ा मोहभंग पैदा करती है। यह नाराज़गी पोस्टर नहीं जलाती। यह पार्टी दफ्तर पर ताला नहीं लगाती। यह बस धीरे-धीरे सक्रियता कम कर देती है। और चुनाव बूथ पर यही कमी निर्णायक हो जाती है।
यह बगावत नहीं, विमुखता है — और यही खतरनाक है
खुली बगावत दिख जाती है। विमुखता नहीं दिखती। कार्यकर्ता फोन उठाना बंद कर देता है। मीटिंग में या तो उसे पूछा नहीं जाता या चुप्पी। “देखेंगे” वाला जवाब। राजनीति में यही सबसे बड़ा खतरा होता है। क्योंकि चुनाव परिणाम उस चुप्पी को आवाज़ दे देते हैं।
https://x.com/IndiaAwakened_/status/1414211253061382153?s=20
अंदर की दरार बाहर की दीवार गिराती है
किले बाहर से नहीं गिरते। वे तब गिरते हैं जब नींव में दरार आ जाती है। यदि भाजपा का हार्डकोर कार्यकर्ता ही यह सोचने लगे कि “सत्ता हमारी नहीं, कुछ लोगों की है” तो यह केवल असंतोष नहीं, चेतावनी है। विपक्ष की ताकत अपनी जगह है। लेकिन असली सवाल यह है— क्या सत्ता पक्ष अपने ही कार्यकर्ता की धड़कन सुन पा रहा है? उत्तर प्रदेश में बदलाव की चर्चा इसलिए नहीं है कि विपक्ष बहुत ताकतवर हो गया है। चर्चा इसलिए है क्योंकि सत्ता का आधार थकान और दूरी से भर गया है।
https://tesariaankh.com/politics-rahul-gandhi-selfie-vote-trend-2029-power-shift/
अब देखना यह है— क्या इसे समय रहते सुना जाएगा, या फिर शोर में दबा दिया जाएगा। लोकतंत्र में जनता अंतिम फैसला करती है। लेकिन जनता से पहले कार्यकर्ता संकेत देता है।
और इस बार संकेत साफ है— आधार हिल रहा है।








