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Delhi Police Row: दिल्ली थाना कांड, मीडिया और सियासत के सवाल

Delhi Police Row: देश की राजधानी दिल्ली में थाने के अंदर, पुलिसवालों के सामने AISA की महिला नेता अंजली और नेहा को मां की गाली देते हुए “कपड़े निकाल” कहा जाता है। यह कोई सड़कछाप घटना नहीं, यह सत्ता संरक्षित व्यवस्था के भीतर की घटना है — कम से कम आरोप यही कह रहे हैं। एक बिहार की बेटी, दूसरी उत्तराखंड की। दोनों सवर्ण पृष्ठभूमि से, लेकिन वंचितों के हक की आवाज उठाना उनका अपराध बना दिया गया। सवाल सीधा है — अगर यही घटना पंजाब या बंगाल में हुई होती तो क्या तथाकथित राष्ट्रवादी चैनलों के स्टूडियो में चीख-पुकार नहीं मच जाती? फिर मोदी राज में इतनी बड़ी घटना पर यह चुप्पी क्यों? “बेटी बचाओ” का नारा देने वाले प्रधानमंत्री कहाँ हैं?

https://x.com/SanjayAzadSln/status/2022939789427904658?s=20

यह सवाल आम आदमी पार्टी के नेता Sanjay Singh ने 15 फरवरी को अपने ट्वीट में उठाया। उन्होंने एक अन्य ट्वीट में लिखा कि कुछ बजरंग दल के लोग डंडा लेकर पार्क में पहुँचे, लेकिन लोगों ने उन्हें घेर लिया, पूछताछ शुरू की और वे भाग खड़े हुए। उन्होंने इसे “भगवा आतंक” के खिलाफ जनता की सीधी प्रतिक्रिया बताया।

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संजय सिंह ने उत्तराखंड के दीपक कुमार का उदाहरण भी दिया। दीपक कुमार उपद्रवियों के सामने खड़े हुए, खुद को मुसलमान बताया, और इसके बाद कथित तौर पर राजपोषित दमन झेला। उनके कारोबार पर असर पड़ा, दबाव बना, लेकिन वे पीछे नहीं हटे। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, यह उस माहौल की कहानी है जिसमें खड़े होना भी जोखिम बन चुका है। बावजूद इसके, उनके समर्थन में वकीलों और बुद्धिजीवियों की एक पंक्ति खड़ी हुई। सवाल फिर वही — क्या मुख्यधारा मीडिया ने इसे जगह दी?

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संजय सिंह ने मैनपुरी और महोबा के बच्चों के मामलों का भी जिक्र किया। क्या इन मुद्दों पर किसी बड़े चैनल पर प्राइम टाइम बहस हुई? या फिर स्टूडियो की रोशनी सिर्फ उन मुद्दों के लिए बचाकर रखी जाती है जो सत्ता की सुविधा से मेल खाते हों?

https://tesariaankh.com/lifestyle-nun-harassment-social-hate-normalisation-india/

इसी बीच मनीषा चौबे ने एक्स पर आरोप लगाया कि NDTV ने एपस्टीन जैसे दरिंदे का बचाव किया। यहाँ संदर्भ अमेरिकी कारोबारी Jeffrey Epstein से जुड़ी खबरों का है, जिन पर वैश्विक स्तर पर मीडिया ने तीखी रिपोर्टिंग की थी। सवाल यह उठाया गया कि विदेशी अपराधी पर बहस हो सकती है, लेकिन अपने देश के बच्चों के मुद्दों पर सन्नाटा क्यों?

केआर बडगोत्या ने भी यही सवाल दोहराया — एपस्टीन पर बचाव और बच्चों के मामलों पर चुप्पी? क्या यही मीडिया की प्राथमिकता है?

यहाँ बहस सिर्फ मीडिया बनाम विपक्ष की नहीं है। आरोप यह है कि सत्ता पक्ष राष्ट्रवाद को भावनात्मक हथियार बनाकर वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाता है। हिंदू-मुसलमान की बहस छेड़ो, बाबरी और बाबर के नाम पर राजनीति गर्म करो। जब इसकी आंच ठंडी पड़े तो जाति का कार्ड खेलो। समाज को इतना विभाजित कर दो कि वह बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सवाल पूछने की स्थिति में ही न बचे।

आलोचक यह भी कहते हैं कि मुफ्त योजनाओं की झड़ी लगाकर एक मानसिकता तैयार की जा रही है — निर्भरता की मानसिकता। राशन फ्री, बिजली फ्री, पानी फ्री — अब क्या अगला कदम जेब खर्च भी? क्या यह नागरिक को अधिकार संपन्न बनाने का रास्ता है या उसे स्थायी रूप से निर्भर बनाने का? जब रोजगार, उद्योग और आर्थिक अवसरों की चर्चा पीछे धकेल दी जाती है, तब देश अकर्मण्यता की खाई की ओर बढ़ता है।

इतिहास गवाह है कि जब भावनाएं उकसाई जाती हैं तो परिणाम नियंत्रित नहीं रहते। Ram Janmabhoomi movement के दौरान कारसेवा के नाम पर देशव्यापी उथल-पुथल हुई। हजारों कारसेवक मारे गए। उनके परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर कितनी गंभीर राष्ट्रीय बहस हुई? आंदोलन जब जनता के हाथ में चला जाता है तो नेतृत्व अक्सर पीछे हट जाता है, लेकिन कीमत आम लोग चुकाते हैं।

आज सोशल मीडिया पर जो जहर घुला हुआ है, वह सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रह सकता। जातिगत गालियाँ, धार्मिक उन्माद, खुली धमकियाँ — यह सब सामान्यीकृत हो रहा है। लोगों को यह संदेश दिया जा रहा है कि “हमें हटाओगे तो कट जाओगे।” क्या यह लोकतंत्र की भाषा है या भय की राजनीति?

“मैं देश नहीं बिकने दूंगा” कहना आसान है। लेकिन यदि नीतियाँ, संस्थाएँ और संसाधन चंद हाथों में सिमटते जाएँ तो सवाल उठेंगे ही। क्या 2014 से पहले इस देश में लोग साथ नहीं रहते थे? क्या तब भारत राष्ट्र नहीं था? आज समाज में जो अविश्वास, जो डर, जो विभाजन दिख रहा है — वह किसकी देन है?

नफरत की आंधी इतनी चलाओ कि सत्ता की नाव आगे बढ़ती रहे — लेकिन क्या यह सोचा गया है कि कहीं इस आंधी में देश ही बिखर न जाए? सवाल तीखे हैं, लेकिन समय भी कम नहीं है। राजनीति अगर भय पर टिकी होगी तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी ही। आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं — यह सवाल टाला नहीं जा सकता।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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