AI Summit Protest: जब युवा असंतोष सत्ता से टकराने का जोखिम उठाता है
AI Summit Protest: नई दिल्ली में आयोजित AI समिट के दौरान हुआ युवा विरोध केवल एक कार्यक्रम में व्यवधान नहीं था, बल्कि उस बेचैनी का सार्वजनिक विस्फोट था जो लंबे समय से देश के बड़े युवा वर्ग के भीतर पनप रही है। इस घटना ने राजनीतिक विमर्श को दो स्पष्ट ध्रुवों में बाँट दिया—एक पक्ष इसे अनुशासनहीनता और राष्ट्र-छवि को क्षति बताता है, जबकि दूसरा इसे बेरोजगारी और अवसर असमानता पर ध्यान खींचने की मजबूर कोशिश मानता है।
परंतु इस पूरे विवाद के बीच एक गहरी सामाजिक प्रवृत्ति भी उजागर हुई—सत्ता के साथ खड़े होने की मनोवृत्ति। राजनीति के प्रेक्षकों का मानना है कि समाज का एक बड़ा वर्ग अक्सर तात्कालिक लाभ, सुरक्षा या अवसर के गणित में सत्तापक्ष के साथ बहता दिखाई देता है, भले ही उसे प्रत्यक्ष लाभ मिले या नहीं। यही वर्ग सत्ता परिवर्तन के साथ रुख बदलने में भी देर नहीं लगाता। AI समिट विरोध पर तीव्र आलोचना की लहर को कुछ विश्लेषक इसी मनोवैज्ञानिक धारा से जोड़कर देखते हैं।
प्रदर्शन का तरीका विवादित
दूसरी ओर, यह भी उतना ही सत्य है कि विरोध का तरीका विवादित था। अंतरराष्ट्रीय मंच पर सुरक्षा और गरिमा के प्रश्न उठना स्वाभाविक था। लेकिन घटना के बाद जिस तीव्रता से राजनीतिक-प्रशासनिक प्रतिक्रिया सामने आई—गिरफ्तारी, तीखी बयानबाजी और शीर्ष नेतृत्व को सीधे निशाना बनाना—उसने यह संकेत भी दिया कि यह विरोध सत्ता-विमर्श को असहज करने में सफल रहा। कई राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह घटना प्रभावहीन होती तो प्रतिक्रिया इतनी व्यापक न होती।
इस प्रसंग का एक महत्वपूर्ण पहलू विपक्ष की स्थिति भी रही। सामान्यतः ऐसे अवसर विपक्षी एकजुटता को जन्म देते हैं, परंतु यहाँ विभिन्न दलों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही। कुछ ने दूरी बनाए रखी, कुछ ने सीमित समर्थन दिया। विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय राजनीति में स्थान-प्रतिस्पर्धा और संभावित सत्ता-परिवर्तन की आशंकाएँ विपक्षी एकता को कमजोर करती हैं—जहाँ एक दल की पुनरुत्थान संभावना दूसरे के लिए राजनीतिक जोखिम बन जाती है।
युवा कठिनाइयों का सवाल
वास्तविक प्रश्न फिर भी वही है जिससे पूरा विवाद शुरू हुआ—युवाओं की कठिनाइयाँ। रोजगार, कौशल और अवसर को लेकर बढ़ती चिंता को केवल राजनीतिक घटना मानकर टालना दीर्घकालिक रूप से खतरनाक हो सकता है। सामाजिक अध्येताओं का कहना है कि जब असंतोष को संस्थागत संवाद में पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, तो वह प्रतीकात्मक टकराव के रूप में प्रकट होता है। AI समिट का विरोध उसी प्रवृत्ति का उदाहरण माना जा रहा है।
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लोकतंत्र में एकांगी समर्थन या एकांगी विरोध दोनों ही जटिल सामाजिक प्रश्नों को सरल बना देते हैं। न तो हर विरोध उचित होता है, न हर आलोचना असंगत; परंतु असंतोष के कारणों की उपेक्षा सबसे गंभीर भूल हो सकती है। AI समिट प्रकरण ने यही चेतावनी दी है कि भारत का युवा वर्ग केवल विकास-आख्यान का दर्शक नहीं रहना चाहता—वह उसमें अपना वास्तविक स्थान चाहता है।
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अंततः यह घटना सत्ता या विपक्ष की तात्कालिक जीत-हार से अधिक उस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का संकेत है जिसमें युवा वर्ग जोखिम लेकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को तैयार है। लोकतंत्र की स्थिरता केवल समर्थन से नहीं, बल्कि असहमति की स्वीकृति से भी बनती है—और जब युवा असहमति दर्ज करने का साहस दिखाते हैं, तो उसे केवल व्यवधान नहीं, सामाजिक संकेत के रूप में पढ़ना अधिक दूरदर्शी होगा।








