Identity Politics: करीब तीन दशक पहले भारतीय राजनीति ने समाज को साधने का एक आसान लेकिन खतरनाक रास्ता चुना मैं हिन्दू हूँ, मैं मुसलमान हूँ। यह विभाजन कोई नई खोज नहीं था, लेकिन इसे सत्ता की राजनीति का स्थायी औज़ार बना दिया गया। नागरिक की पहचान उसके कर्म, उसकी सोच या उसके योगदान से नहीं, बल्कि उसके धर्म से तय होने लगी। चुनाव जीते गए, सरकारें बनीं और समाज के भीतर एक अदृश्य लेकिन गहरी खाई खिंचती चली गई।
जब धर्म से काम नहीं चला
राजनीति कभी एक जगह ठहरती नहीं। जब धर्म के नाम पर खींची गई रेखा अपेक्षित राजनीतिक लाभ देने में कमजोर पड़ने लगी, तो विभाजन को और महीन, और अधिक घातक रूप दे दिया गया।
जाति की नई रेखाएँ, पुराना खेल
अब कहा जाने लगा—
मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं पिछड़ा हूँ, मैं पिछड़ों में पिछड़ा हूँ, मैं अनुसूचित हूँ, मैं अनुसूचित जनजाति हूँ।
समाज को खांचों में बाँटने की रणनीति
समाज को इस तरह बाँटा गया कि हर व्यक्ति खुद को किसी न किसी खतरे में महसूस करे। भय की यह राजनीति नागरिक को एकजुट करने के बजाय उसे अलग-थलग करती चली गई। सत्ता के लिए यह सुविधाजनक है, लेकिन राष्ट्र के लिए घातक।
देश कहाँ है, हम भारतीय कहाँ हैं?
इस पूरे सिलसिले में एक सवाल लगातार अनुत्तरित रह गया—
देश कहाँ है?
हम भारतीय हैं—यह भावना आखिर किस मोड़ पर छूट गई?
क्या भारत केवल पहचान की लड़ाइयों का अखाड़ा बनकर रह जाएगा?
बेरोजगार युवा और अस्मिता की लड़ाई
आज का युवा रोजगार चाहता है, सम्मान चाहता है और भविष्य की स्पष्ट दिशा चाहता है। लेकिन उसे यह सब देने के बजाय उसकी पहचान को हथियार बना दिया गया है।
सवाल पूछने वाला नागरिक, सिपाही कैसे बना?
नौकरी या अवसर न पाने वाला युवा आज धार्मिक और जातीय अस्मिता की लड़ाई का कर्णधार बना दिया गया है। वह सवाल पूछने वाला नागरिक नहीं, बल्कि किसी न किसी पहचान का सिपाही बन चुका है। उसकी ऊर्जा, उसका आक्रोश और उसका भविष्य—सब कुछ ऐसी लड़ाइयों में झोंक दिया गया है, जिनसे उसका अपना जीवन बेहतर नहीं होने वाला।
नेतृत्व की भूमिका: समाधान या उकसावा?
नेतृत्व उसके लिए सोचने, योजनाएँ बनाने और रास्ते खोलने के बजाय उसकी भटकी हुई सोच को और हवा देता है। उसे समझाया जाता है—
“बटोगे तो कटोगे।”
लेकिन यह नहीं बताया जाता कि लगातार बाँटते रहने का अंजाम क्या होता है।
विरोध, असहमति और कुचला जाता संवाद
आज सत्ता को असहज करने वाले सवाल पसंद नहीं किए जाते। असहमति को देशद्रोह का नाम दिया जाने लगा है। संवाद की जगह शोर है, तर्क की जगह नारे हैं।
लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है
हम भूल जाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की प्रक्रिया नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—
सवाल, आलोचना, असहमति और जवाबदेही।
जब विरोध के स्वर दबा दिए जाते हैं, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिक ढांचा बनकर रह जाता है।
भविष्य की अनदेखी और 2047 का भ्रम
2047 का सपना दिखाया जा रहा है—विकसित भारत, शक्तिशाली भारत। लेकिन 2030 या 2035 का सामाजिक परिदृश्य कैसा होगा, इस पर कोई गंभीर चर्चा नहीं है।
एक या दो दशक बाद भारत कहाँ होगा?
क्या वह भारत होगा जहाँ नागरिक की पहचान उसकी मेहनत और क्षमता से तय होगी,
या वह भारत होगा जहाँ जन्म ही भविष्य का फैसला कर देगा?
https://x.com/aanaik_official/status/2021088994868469901?s=20
पहचान बनाम नागरिकता: अंतिम सवाल
देश के लिए सोचने वाले लोग आज भी हैं, लेकिन उनकी आवाज़ें या तो दबा दी जाती हैं या हाशिये पर धकेल दी जाती हैं। राष्ट्र निर्माण भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि समान अवसर, न्याय और संवाद से होता है।
यदि राजनीति समाज को जोड़ने के बजाय लगातार बाँटती रही, तो यह सिलसिला अंतहीन होगा।
आज धर्म, कल जाति और परसों उप-जाति।
सबसे बड़ा प्रश्न
क्या हम एक पहचान-प्रधान समाज बनना चाहते हैं या एक नागरिक-प्रधान राष्ट्र?
इसी उत्तर में भारत का भविष्य छिपा है।








