SP MP Narayandas Ahirwar profile: संघर्ष, विचार और सामाजिक न्याय की राजनीति का चेहरा
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र से निकलकर संसद तक का सफर तय करने वाले नारायणदास अहिरवार उन नेताओं में हैं, जिनकी राजनीति किसी अचानक उभरे अवसर का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों के संघर्ष, संगठनात्मक तपस्या और सामाजिक प्रतिबद्धता की उपज है। 2024 के लोकसभा चुनाव में जालौन (अनुसूचित जाति) सीट से समाजवादी पार्टी के सांसद के रूप में उनकी जीत, इसी लंबे राजनीतिक सफर की स्वाभाविक परिणति मानी जा रही है।
शुरुआती जीवन और शिक्षा
23 जुलाई 1960 को जालौन जनपद के सैद नगर, उरई में जन्मे नारायणदास अहिरवार एक साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिता राजा राम और माता मुल्ली बाई ने सीमित संसाधनों में भी शिक्षा और सामाजिक मूल्यों को प्राथमिकता दी। यही कारण रहा कि नारायणदास ने पढ़ाई के साथ-साथ समाज को समझने और उसके लिए कुछ करने की चेतना बहुत कम उम्र में विकसित कर ली।
उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी से बीए (एलएलबी) की पढ़ाई पूरी की। कानून की शिक्षा ने उन्हें न केवल न्याय व्यवस्था की समझ दी, बल्कि सामाजिक असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाने का औजार भी दिया।
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पेशा और सामाजिक सरोकार
पेशे से अधिवक्ता और कृषक रहे नारायणदास अहिरवार की पहचान हमेशा एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी रही है। उनका विशेष झुकाव डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों की ओर रहा। वे अंबेडकर के जीवन, संघर्ष और लेखन को पढ़ने-समझने के साथ-साथ, उन्हें जमीन पर उतारने की कोशिश करते रहे।
गरीबों, दलितों और वंचित वर्गों के सामाजिक उत्थान के लिए वे लगातार सक्रिय रहे, जिसने उन्हें जमीनी स्तर पर व्यापक स्वीकार्यता दिलाई।
राजनीति में प्रवेश: कांशीराम से मिली दिशा
नारायणदास अहिरवार का राजनीतिक जीवन 1982 में उस समय शुरू हुआ, जब कांशीराम ने बीएस-4 (DS-4) का गठन किया। सामाजिक परिवर्तन की राजनीति से प्रभावित होकर वे इस आंदोलन से जुड़ गए और यहीं से उन्होंने राजनीति का क, ख और ग सीखा।
1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के समय वे उसके संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे। संगठन निर्माण के दौर में उन्होंने बिना किसी पद या सत्ता की अपेक्षा किए, पूरी निष्ठा से काम किया। यही समर्पण उन्हें धीरे-धीरे राजनीतिक पहचान दिलाने लगा।
संगठन और सत्ता की जिम्मेदारियां
उनकी संगठनात्मक क्षमता का पहला बड़ा प्रमाण 1992 में मिला, जब उन्हें उरई विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। लगभग आठ वर्षों तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने पार्टी संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया।
2002 में उन्हें बसपा का जिलाध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 2007 में मायावती सरकार बनने पर उन्हें जल निगम बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जहां वे दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने कानपुर मंडल सहित कई मंडलों में समन्वयक के रूप में भी कार्य किया और 2013 में उत्तराखंड की संगठनात्मक जिम्मेदारी भी संभाली।
राजनीतिक मोड़ और समाजवादी पार्टी में प्रवेश
समय के साथ बसपा से उनका मोहभंग होता गया और 2014 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी। इसके कुछ समय बाद वे समाजवादी पार्टी से जुड़े। यहां उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के, लगातार संगठन और जनता के बीच काम किया।
लंबे समय तक किए गए इस समर्पित कार्य का परिणाम 2024 के लोकसभा चुनाव में सामने आया, जब सपा ने उन्हें जालौन (एससी) सीट से उम्मीदवार बनाया और जनता ने उन्हें सांसद चुनकर संसद भेजा।
2024 की ऐतिहासिक जीत
20 मई 2024 को हुए मतदान में नारायणदास अहिरवार ने जीत दर्ज कर 18वीं लोकसभा में प्रवेश किया। चुनावी शपथ पत्र के अनुसार:
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कुल संपत्ति: लगभग ₹7.4 करोड़
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देयताएं: लगभग ₹6 लाख
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आपराधिक मामले: कोई नहीं
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घोषित आय: शून्य
उनकी साफ-सुथरी छवि और संघर्षपूर्ण राजनीतिक पृष्ठभूमि ने मतदाताओं के बीच भरोसा पैदा किया।
संसद में भूमिका और वर्तमान जिम्मेदारियां
सांसद बनने के बाद वे सक्रिय संसदीय भूमिका में नजर आ रहे हैं। वे—
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जल संसाधन समिति के सदस्य हैं
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जन विश्वास (संशोधन) विधेयक, 2025 पर गठित चयन समिति के सदस्य हैं
ये जिम्मेदारियां उनके प्रशासनिक अनुभव और सामाजिक सरोकारों के अनुरूप मानी जा रही हैं।
निजी जीवन
नारायणदास अहिरवार का विवाह 18 अप्रैल 1976 को कनक लता से हुआ। उनके एक पुत्र और एक पुत्री हैं। उनका स्थायी निवास उरई, जालौन में है, जबकि वर्तमान में वे नई दिल्ली में रहते हैं।
पढ़ना, फिल्में और नाटक देखना उनके शौक हैं। वे 2011 में नेपाल की यात्रा भी कर चुके हैं।
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सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रतीक
नारायणदास अहिरवार की राजनीति सत्ता से अधिक संवेदनशीलता और सामाजिक न्याय पर केंद्रित रही है। कांशीराम से शुरू हुई वैचारिक यात्रा, बसपा के संगठनात्मक संघर्ष और सपा के मंच से संसद तक पहुंचना—यह सफर उन्हें एक अनुभवी, जमीन से जुड़े और विचारधारा-निष्ठ नेता के रूप में स्थापित करता है।








