RSS at 100: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्ष केवल संगठनात्मक निरंतरता का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय समाज के भीतर चल रही एक दीर्घकालिक वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक प्रक्रिया का भी द्योतक हैं। बांसवाड़ा में आयोजित माही टॉक फेस्ट 4.0 के मंच से संघ के क्षेत्र प्रचारक निंबाराम जी द्वारा व्यक्त विचार इस शताब्दी यात्रा की उसी आत्ममंथनशील प्रवृत्ति को सामने लाते हैं, जिसमें संघ स्वयं को समय, समाज और परिस्थितियों के आलोक में परख रहा है।
“संघ का उद्देश्य संगठन विस्तार नहीं, समाज विस्तार है”—यह कथन संघ की कार्यपद्धति के मूल दर्शन को रेखांकित करता है। शताब्दी वर्ष में संघ स्वयंसेवकों के माध्यम से यह मूल्यांकन कर रहा है कि व्यक्ति निर्माण की उसकी प्रक्रिया समाज के कितने व्यापक वर्ग तक पहुँची है और राष्ट्र सेवा की उसकी अवधारणा कितनी जीवंत बनी हुई है।
आत्मविश्लेषण का दौर और सेवा कार्यों की व्यापकता
निंबाराम जी द्वारा आत्मविश्लेषण पर दिया गया जोर यह संकेत देता है कि संघ अब केवल अपने प्रभाव का उत्सव नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं और संभावनाओं—दोनों पर विचार कर रहा है। इंडिया टुडे के सर्वे में संघ से जुड़े सेवा कार्यों को देश का सबसे बड़ा एनजीओ बताया जाना इस बात का प्रमाण है कि संघ की गतिविधियाँ अब केवल शाखाओं तक सीमित नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा सेवा और सामाजिक समरसता तक विस्तृत हो चुकी हैं।
व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र
संघ की शाखा प्रणाली—शिशु से लेकर प्रौढ़ तक—यह दर्शाती है कि संगठन सामाजिक जीवन के हर चरण को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का प्रयास करता है। मातृ शक्ति, सज्जन शक्ति और सम्पूर्ण समाज के संगठन पर दिया गया बल इस बात की पुष्टि करता है कि संघ राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक परियोजना के रूप में देखता है।
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‘घर से बदलाव’ की अवधारणा
माही टॉक फेस्ट के समापन सत्र में निंबाराम जी द्वारा दिया गया संदेश—“घर से शुरू होगा बदलाव, तभी बदलेगा राष्ट्र”—संघ की सामाजिक रणनीति का सार प्रस्तुत करता है। कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी और कर्तव्यबोध जैसे विचार संघ के उस दृष्टिकोण को उजागर करते हैं, जिसमें राष्ट्र परिवर्तन की शुरुआत सत्ता से नहीं, समाज की इकाई से होती है।
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संवाद, संस्कृति और युवा
माही टॉक फेस्ट जैसे आयोजन संघ की उस कार्यशैली को रेखांकित करते हैं, जिसमें संवाद, साहित्य, मीडिया और कला को सामाजिक चेतना के माध्यम के रूप में अपनाया गया है। युवाओं की सक्रिय भागीदारी, रील्स प्रतियोगिता, कार्यशालाएं और वैचारिक सत्र यह संकेत देते हैं कि संघ अपने शताब्दी वर्ष में युवा संवाद को केंद्रीय स्थान दे रहा है।
निष्कर्ष
संघ के सौ वर्ष पूरे होना केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक वैचारिक पुनर्पाठ का अवसर है। आत्मचिंतन, सेवा, संवाद और सामाजिक समरसता के माध्यम से संघ यह संदेश दे रहा है कि राष्ट्र निर्माण एक सतत सामाजिक प्रक्रिया है—जो व्यक्ति से शुरू होकर समाज और फिर राष्ट्र तक पहुँचती है।








