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सौ उठक-बैठक से छात्रा की मौत, क्या शिक्षक नियुक्ति में मनोवैज्ञानिक टेस्ट अनिवार्य हो?

महाराष्ट्र की घटना ने हमारी शिक्षा प्रणाली पर फिर उठाए सवाल हैं, इस घटना में दस मिनट देर से स्कूल आने पर सौ उठक-बैठक के बाद छात्रा की मौत हो गई, क्या हमारे शिक्षक हैवान बन गए हैं। जिन्हें 12 साल की मासूम बच्ची पर ये अत्याचार करते शर्म नहीं आयी। क्या शिक्षा-तंत्र में गहरी बीमारी है?

महाराष्ट्र के एक स्कूल में शिक्षक द्वारा लगवाई गई सौ उठक-बैठक के बाद एक छात्रा की मौत की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह कोई पहली घटना नहीं हैइससे पहले उत्तर प्रदेश के हरदोई ज़िले में भी एक छात्र को दो सौ उठक-बैठक की सज़ा देने का मामला सामने आया था। दोनों ही घटनाएं एक ही प्रश्न छोड़ जाती हैं: क्या भारत की शिक्षा प्रणाली बच्चों को शिक्षित कर रही है, या उन पर अनुशासन के नाम पर अत्याचार थोप रही है?

कानून साफ, फिर भी हिंसा जारीक्या बाल संरक्षण सिर्फ कागज़ों में?

भारत में शारीरिक दंड को लेकर कानून बेहद स्पष्ट हैं: 

राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट, 2009

स्कूलों में सभी प्रकार के शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न पर पूर्ण प्रतिबंध।

जस्टिस लैथम कमेटी सहित विभिन्न राष्ट्रीय आयोगों की सिफारिशें

बच्चों पर हिंसा को मानवाधिकार उल्लंघन माना जाए।

सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि शारीरिक दंड अनुशासन का तरीका नहीं, अपराध है।

फिर भी, देश के कई हिस्सों में शिक्षक अपनी निजी खुन्नस, दबदबा या कथित अनुशासन के नाम पर नाबालिगों को ऐसी सज़ाओं से गुजरने पर मजबूर करते हैं जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर छोड़ती हैं।

क़ानून है, गाइडलाइन हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव गायब।

क्या शिक्षक प्रशिक्षण व्यवस्था में खामी है?

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान शिक्षक प्रशिक्षण में बच्चों की मनोविज्ञान और सेंसेटिविटी ट्रेनिंग पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।

देश में शिक्षक नियुक्ति अक्सर सिर्फ लिखित परीक्षा, इंटरव्यू और डिग्री पर आधारित होती है।

लेकिन सवाल है:

क्या एक शिक्षक सिर्फ किताबें पढ़ा देने से अच्छा शिक्षक बन जाता है?

या उसे बच्चों की भावनाओं को समझने, तनाव प्रबंधन, और सकारात्मक अनुशासन सीखने की आवश्यकता है?

कई देशों में शिक्षक बनने से पहले व्यापक मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य है। भारत में यह अभी भी बहुत सीमित है। हाल की घटनाएं इस बात को रेखांकित करती हैं कि शिक्षक भर्ती में मनोवैज्ञानिक टेस्ट की अनिवार्यता आवश्यकता नहीं, मजबूरी बन चुकी है।

शिक्षा में माफिया संस्कृति: क्या यह सिर्फ शिक्षक की ‘गलती’ है?

विश्लेषक कहते हैं कि इन घटनाओं को केवल शिक्षक की क्रूरता नहीं, बल्कि तंत्र की सड़ांध के रूप में देखा जाना चाहिए।

* कई प्राइवेट स्कूलों में प्रबंधन का दबाव

* रिज़ल्ट और डिसिप्लिन के नाम पर “फियर-कल्चर”

* मनमानी फीस, मनोवैज्ञानिक सपोर्ट सिस्टम का अभाव

* पैरेंट्स की शिकायतों पर कार्रवाई का लगभग शून्य रेट

यह पूरा माहौल बच्चों पर शक्ति-प्रदर्शन वाली मानसिकता को जन्म देता है, जो धीरे-धीरे एक माफिया संस्कृति का रूप ले लेता हैजहाँ स्कूल स्वयं को जवाबदेही से ऊपर समझने लगते हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्यलेकिन ज़मीन पर इसका पालन?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 कहती है कि:

* शिक्षा का केंद्र बच्चों की खुशी, सुरक्षित वातावरण और सीखने का आनंद होना चाहिए।

* शिक्षकों को “फसिलिटेटर” बनाया जाए, दंड देने वाला नहीं।

* सीखने के वातावरण को स्ट्रेस-फ्री बनाया जाए।

परंतु हकीकत यह है कि कई स्कूलों में NEP एक दस्तावेज़ भर है, जिसका असर क्लासरूम में दिखाई नहीं देता।

आख़िर समाधान क्या?

1. शिक्षक भर्ती में अनिवार्य मनोवैज्ञानिक परीक्षण

2. स्कूलों में छात्रों के लिए काउंसलिंग और चाइल्ड प्रोटेक्शन सेल

3. कानून के उल्लंघन पर स्कूल प्रबंधन की सामूहिक जवाबदेही

4. शारीरिक दंड पर ज़ीरो टॉलरेंससस्पेंशन/डिबारमेंट तक की कार्रवाई

5. माता-पिता के लिए शिकायत प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाना

6. शिक्षक प्रशिक्षण में ‘चाइल्ड साइकोलॉजी’ और ‘सेंसिटिविटी मॉड्यूल’ अनिवार्य

https://x.com/Garvjigupta/status/1989757352145539424?s=20

इन घटनाओं को ‘इक्का-दुक्का’ कहकर भूलना खतरनाक होगा

https://tesariaankh.com/sabarkantha-hapa-school-modern-library-education/

महाराष्ट्र और हरदोई जैसी घटनाएँ एक चेतावनी हैं।

ये isolated events नहीं हैंये बताते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली में कहीं कोई गहरी टूट-फूट है।

अगर आज सवाल ना उठाया गया, तो कल फिर किसी बच्चे की जान, किसी बच्चे का आत्मविश्वास, किसी बच्चे का भविष्य इस क्रूरता की भेंट चढ़ सकता है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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