Lohri Indian Culture: लोहड़ी भारतीय जीवन शैली का अभिन्न अंग, कोर हिन्दुत्व के मूल्यों के है करीब
नई दिल्ली/चंडीगढ़।
उत्तर भारत का प्रमुख लोकपर्व लोहड़ी केवल एक मौसमी उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय जीवन शैली, प्रकृति-पूजा और सामूहिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। सूर्य, अग्नि और अन्न के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाला यह पर्व अपने मूल भाव में कोर हिन्दुत्व की सांस्कृतिक अवधारणाओं के अत्यंत निकट दिखाई देता है।
प्रकृति और अग्नि-पूजा से जुड़ा पर्व
लोहड़ी का केंद्र बिंदु अग्नि (हवन) है, जो वैदिक परंपरा में देवताओं तक आहुति पहुँचाने का माध्यम मानी जाती है। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा, तिल-गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और फसल अर्पित करना भारतीय सनातन परंपरा की उसी निरंतरता को दर्शाता है, जिसमें प्रकृति को माता और अग्नि को साक्षी माना गया है।
मकर संक्रांति से वैचारिक संबंध
लोहड़ी मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाई जाती है। सूर्य के उत्तरायण होने की यह अवधि हिन्दू दर्शन में शुभता, नई ऊर्जा और जीवन चक्र के परिवर्तन का प्रतीक है। यही कारण है कि लोहड़ी केवल पंजाब तक सीमित न रहकर भारतीय सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा बन चुकी है।
परिवार, समाज और सामूहिकता का उत्सव
लोहड़ी के अवसर पर परिवार और समाज एकत्र होते हैं। नवविवाहितों और नवजात शिशुओं के लिए विशेष लोहड़ी मनाने की परंपरा भारतीय जीवन के संस्कार, गृहस्थ आश्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व को रेखांकित करती है। यह सामूहिकता ही हिन्दुत्व की मूल आत्मा मानी जाती है।
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कोर हिन्दुत्व से वैचारिक साम्यता
विशेषज्ञों के अनुसार, हिन्दुत्व कोई संकीर्ण धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है। लोहड़ी जैसे पर्व—
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प्रकृति के साथ सामंजस्य
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अन्न और श्रम का सम्मान
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अग्नि और सूर्य की उपासना
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परिवार व समाज की एकता
जैसे मूल तत्वों को सुदृढ़ करते हैं, जो हिन्दुत्व के कोर विचारों के केंद्र में हैं।
आधुनिक दौर में भी प्रासंगिक
आज भले ही लोहड़ी आधुनिक मंचों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शहरी उत्सवों का रूप ले चुकी हो, लेकिन इसका मूल भाव आज भी वही है—प्रकृति, संस्कृति और संस्कारों से जुड़ाव। यही कारण है कि यह पर्व नई पीढ़ी को भारतीय परंपराओं से जोड़ने का माध्यम बन रहा है।
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लोहड़ी केवल एक क्षेत्रीय पर्व नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस निरंतर परंपरा का प्रतीक है, जो हिन्दुत्व को जीवन शैली के रूप में स्वीकार करती है। यह पर्व बताता है कि भारतीय संस्कृति उत्सवों के माध्यम से समाज, प्रकृति और आध्यात्मिकता को एक सूत्र में पिरोती है।








