वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

Laddakh में गोलियों की गूंज: लोकतंत्र, पहचान और अधिकारों की लड़ाई खतरनाक मोड़ पर

Laddakh: हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच पसरी खामोशी हाल के वर्षों में कभी इतनी भारी नहीं रही। जिस लेह की गलियों में पर्यटकों की भीड़ और स्थानीय संस्कृति की जीवंतता दिखाई देती थी, वहां आज एक ऐसा सन्नाटा है जो केवल एक बात कहता है—लद्दाख आहत है, और गहरे आहत है।

24 सितंबर को लद्दाख की राजधानी लेह में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी ने पूरे क्षेत्र को एक झटके में बदल दिया।
चार नागरिक मारे गए, 90 से अधिक घायल हुए, और इसके तुरंत बाद कर्फ्यू, इंटरनेट बैन और भारी सुरक्षा बंदोबस्त ने इस संवेदनशील सीमा क्षेत्र को एक संघर्ष-क्षेत्र में बदल दिया।

लेखिका Tarushi Aswani की रिपोर्ट ने इसी भय, पीड़ा और असंतोष की परतों को उजागर किया है—लेकिन इस घटना के मायने सिर्फ लद्दाख तक सीमित नहीं हैं; यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक चेतावनी है।

संवैधानिक अधिकारों की मांग, और राज्य की कठोर प्रतिक्रिया

2019 में जम्मू–कश्मीर का पुनर्गठन और लद्दाख को अलग केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा मिलना स्थानीय जनता के लिए उम्मीद लेकर आया था।
परंतु छह साल बाद स्थिति उलट चुकी है—लद्दाख को न तो विधायिका मिली, न जनप्रतिनिधित्व, न ही जमीन और नौकरियों पर किसी तरह का संवैधानिक संरक्षण।

जब लोगों ने शांतिपूर्ण धरने, भूख हड़तालें और संवाद के प्रयासों से अधिकार मांगे—
तो जवाब में आँसू गैस, लाठीचार्ज, और फिर गोलियां मिलीं।

लद्दाख का दावा यही है—
“हम भारत से अलग नहीं होना चाहते; हम चाहते हैं कि भारत हमें सुने।”

सोनाॅम वांगचुक की गिरफ्तारी: विश्वास का टूटना

पर्यावरणविद सोनम वांगचुक का नाम केवल लद्दाख ही नहीं, पूरे देश में सम्मान के साथ लिया जाता है।
उनकी गिरफ्तारी को कई स्थानीय लोग “टूटे हुए भरोसे का प्रतीक” मानते हैं।

उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत 1,400 किमी दूर राजस्थान की जेल में भेजना इस संघर्ष को और गहरा कर गया।
लद्दाखियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या पर्यावरण, पहचान और स्वशासन की बात करना अब ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ’ हो गया है?

परिवारों की त्रासदी: गोलियों से कहीं गहरी चोटें

Tarushi की रिपोर्ट ऐसे परिवारों की कहानी सामने लाती है जिनके बेटे, भाई या पिता गोलियों से मारे या घायल हुए—

  • कुछ प्रदर्शन में थे,

  • कुछ बस रास्ते से गुजर रहे थे,

  • कुछ भीड़ को शांत करा रहे थे।

इनके घरों में आज भी कोई सरकारी अधिकारी संवेदना जताने नहीं गया।
इस चुप्पी ने पूरे लद्दाख को संदेश दिया है—
“आपकी पीड़ा हमारी प्राथमिकता नहीं है।”

परिवारों और युवाओं के बीच यह चुप्पी ही सबसे बड़ा दर्द बन गई है।

https://tesariaankh.com/gen-z-protests-mexico-nepal-bangladesh-corruption/

लद्दाख पर दोहरा दबाव: जलवायु संकट और सैन्यीकरण

पहले से ही चीन और पाकिस्तान की सीमाओं के बीच बसे इस क्षेत्र पर सुरक्षा कारणों का दबाव है।
ऊपर से जलवायु संकट—

  • पिघलते ग्लेशियर

  • बदलता मौसम

  • पानी की कमी

  • पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

लद्दाखियों को डर है कि दिल्ली का “विकास मॉडल” उनकी संस्कृति और नाजुक पारिस्थितिकी को निगल सकता है।

क्यों यह घटना सिर्फ लद्दाख की नहीं—भारत की चेतावनी है?

Tarushi Aswani की रिपोर्ट एक पैटर्न की तरफ इशारा करती है—
जहाँ केंद्र से दूर स्थित क्षेत्र, चाहे उत्तर-पूर्व हो या पहाड़ी राज्य, वहां नागरिक अधिकार और असहमति को अक्सर “राष्ट्र-विरोध” की तरह प्रस्तुत किया जाता है।

लद्दाख में भी:

  • शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसक बताया गया

  • बाहरी फंडिंग के आरोप लगाए गए

  • प्रदर्शनकारियों की देशभक्ति पर सवाल उठाए गए

यह वही नैरेटिव है जिसने भारत के लोकतांत्रिक विमर्श को संकुचित कर दिया है।

https://x.com/NumanSayed70828/status/1985569964003365054?s=20

लद्दाख की लड़ाई: लोकतंत्र के भविष्य की लड़ाई

लद्दाख की जमीन पर भले कुछ लोग हों, लेकिन यह संघर्ष राष्ट्रीय महत्व का है।
यह मांग रहा है:

  • संविधान में संरक्षण

  • भूमि और नौकरियों पर अधिकार

  • पर्यावरण के लिए सुरक्षा

  • लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व

  • और सबसे बढ़कर—राज्य द्वारा सम्मान

लद्दाख के लोगों की आवाज साफ है—
“हम देशभक्त हैं, लेकिन हमें नागरिक अधिकार भी चाहिए।”

Based on reporting by Tarushi Aswani (The Diplomat)

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें