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UGC Row Gandhi vs Ambedkar on Caste: छात्रों की जाति पर गांधी बनाम आंबेडकर क्या दो अलग राहें

UGC Row Gandhi vs Ambedkar on Caste: जब किसी विश्वविद्यालय में जाति को लेकर तनाव होता है, जब छात्र समूहों में बँटते हैं, या जब पहचान की राजनीति कैंपस तक पहुँचती है—तो एक सवाल बार-बार उठता है: क्या जाति को नज़रअंदाज़ करना समाधान है, या उसे पहचान देना ज़रूरी है? इस सवाल के दो सबसे बड़े भारतीय उत्तर हैं महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर। दोनों सामाजिक न्याय चाहते थे, लेकिन वहाँ पहुँचने का रास्ता दोनों का अलग था—खासतौर पर छात्रों और शिक्षा के संदर्भ में।

गांधी: छात्र जीवन में जाति एक बोझ है

महात्मा गांधी के लिए छात्र जीवन समाज को फिर से गढ़ने का मौका था। वे मानते थे कि अगर बच्चे और युवा एक साथ रहना, पढ़ना और काम करना सीख लें, तो समाज की बड़ी बीमारियाँ अपने-आप खत्म हो जाएँगी। गांधी साफ़ कहते थे “बच्चों के मन में भेद डालना, भविष्य में समाज को बाँटना है।” उनकी नज़र में जाति कोई गर्व की पहचान नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विकृति थी—खासकर तब, जब वह ऊँच-नीच और अस्पृश्यता का रूप ले ले।

छात्रों के जातिगत विभाजन पर गांधी की आपत्ति

गांधी को डर था कि अगर शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित समूह बनेंगे, अलग-अलग पहचान को प्राथमिकता मिलेगी, और छात्र पहले अपनी जाति देखेंगे, इंसान बाद में तो शिक्षा का मूल उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा। वे इसे सिर्फ़ सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि नैतिक संकट मानते थे। गांधी के शब्दों में, छात्र जीवन में जाति सिखाना भय पैदा करता है, अविश्वास बढ़ाता है और लोकतांत्रिक चेतना को कमजोर करता है। इसलिए वे छात्रों के जातिगत विभाजन के सख्त खिलाफ़ थे।

आश्रम: गांधी का ज़मीनी मॉडल

गांधी के विचार भाषणों तक सीमित नहीं थे। साबरमती और सेवाग्राम आश्रम उनके प्रयोग थे। वहाँ—हर जाति के बच्चे साथ रहते थे, एक साथ भोजन करते थे, कोई अलग व्यवस्था नहीं थी, गांधी मानते थे कि साथ रहना ही बराबरी की पहली पाठशाला है। उनके लिए शिक्षा का मतलब था जाति को मिटाना, न कि उसे मज़बूत करना।

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अब आंबेडकर की तरफ़ चलते हैं

डॉ. आंबेडकर की दुनिया गांधी से बिल्कुल अलग अनुभवों से बनी थी। जहाँ गांधी सुधार की उम्मीद रखते थे, वहाँ आंबेडकर ने अपमान, बहिष्कार और संस्थागत भेदभाव को खुद जिया था। आंबेडकर के लिए समस्या सिर्फ़ सामाजिक सोच नहीं थी—समस्या थी सत्ता और संरचना

आंबेडकर: बिना पहचान के न्याय नहीं

आंबेडकर मानते थे कि जाति कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि एक ठोस सामाजिक सच्चाई है। उनका तर्क साफ़ था— “जब तक जाति है, तब तक उससे प्रभावित लोगों की अलग पहचान ज़रूरी है।” आंबेडकर को डर था कि अगर छात्र जीवन में जाति को “अदृश्य” मान लिया गया, तो— वंचित वर्ग की समस्याएँ दब जाएँगी, असमानता जस की तस बनी रहेगी और बराबरी सिर्फ़ एक नैतिक नारा बनकर रह जाएगी। इसलिए वे मानते थे कि शिक्षा में जाति की पहचान स्वीकार करना, न्याय की पहली शर्त है।

UGC Row Gandhi vs Ambedkar on Caste: छात्रों और शिक्षा पर आंबेडकर का दृष्टिकोण

आंबेडकर के लिए शिक्षा  सामाजिक मुक्ति का हथियार थी, आत्मसम्मान का रास्ता थी और सत्ता तक पहुँचने का माध्यम थी, वे चाहते थे कि दलित और वंचित छात्र अपनी पहचान को समझें, अपने अधिकारों को जानें और संगठित होकर आवाज़ उठाएँ, इस संदर्भ में, जाति आधारित छात्र संगठन या अलग मंच उन्हें आत्मरक्षा का साधन लगते थे, न कि विभाजन।

 गांधी और आंबेडकर का बुनियादी फर्क

गांधी आंबेडकर
जाति को मिटाना चाहते थे जाति को पहचान बनाकर चुनौती देना चाहते थे
नैतिक सुधार पर ज़ोर संवैधानिक और संस्थागत सुधार पर ज़ोर
साथ रहने से बदलाव अलग पहचान से शक्ति
छात्र जीवन में जाति खतरनाक छात्र जीवन में जाति अनदेखी नहीं की जा सकती

दोनों का लक्ष्य समान था—समानता लेकिन रास्ते अलग थे।

क्या गांधी जातिगत न्याय के खिलाफ थे?

नहीं। यह एक आम गलतफहमी है। गांधी सामाजिक सुधार चाहते थे, लेकिन वे डरते थे कि जाति की राजनीति समाज को हमेशा के लिए खाँचों में बाँट देगी। वहीं आंबेडकर मानते थे कि बिना उस राजनीति के न्याय कभी मिलेगा ही नहीं।

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आज के कैंपस में यह बहस क्यों ज़िंदा है?

आज जब विश्वविद्यालयों में जाति आधारित संगठन, अलग छात्रावास की माँग, और पहचान की राजनीति दिखाई देती है, तो दरअसल वही गांधी बनाम आंबेडकर की बहस फिर सामने आ जाती है। एक पक्ष कहता है “जाति भूलो, आगे बढ़ो।” दूसरा कहता है “जब तक भेदभाव है, जाति भूलना विशेषाधिकार है।”

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कौन सही, कौन ग़लत?

इस सवाल का कोई सरल उत्तर नहीं। गांधी हमें चेतावनी देते हैं “अगर छात्र जीवन में ही हम बँट गए, तो समाज कभी नहीं जुड़ेगा।” आंबेडकर हमें याद दिलाते हैं “अगर हम अपनी पहचान भूल गए, तो अन्याय कभी नहीं रुकेगा।” शायद आज की ज़रूरत यह है कि गांधी की समानता की आकांक्षा, और आंबेडकर की न्याय की ज़िद को मिलाकर  दोनों को साथ पढ़ा जाए, साथ समझा जाए। क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ़ डिग्री देना नहीं, बल्कि ऐसा नागरिक बनाना है जो न तो अन्याय को स्वीकार करे, न इंसान को इंसान से अलग करे

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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