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Indira Gandhi Jayanti: कांग्रेस की हुंकार, उस लौह-इच्छाशक्ति की वापसी, जिसने हमेशा हारी बाज़ी जीती

Indira Gandhi Jayanti: पूर्व प्रधानमंत्री और भारत की ‘लौह महिला’ इंदिरा गांधी की जयंती पर कांग्रेस ने एक ओर जहां उन्हें श्रद्धांजलि दी, वहीं दूसरी ओर वर्तमान राजनीति को उनकी विरासत से जोड़ते हुए कई संकेत भी दिए। दिलचस्प यह है कि उसी दिन कांग्रेस ने एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) मुद्दे पर चुनाव आयोग और भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए रामलीला मैदान में विशाल रैली की घोषणा कर दी—इंदिरा की शैली में, बड़े संघर्ष की शुरुआत बड़े जनसमर्थन के प्रदर्शन से।

इंदिरा गांधी की 108वीं जयंती पर मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कई वरिष्ठ नेताओं ने शक्ति स्थल पर जाकर उन्हें नमन किया। कांग्रेस ने उन्हें “आत्मनिर्भर भारत की निर्माता”, “आयरन लेडी”, “एकता-अखंडता की प्रतिमूर्ति” और “निर्भीक रणनीतिकार” बताया।

Indira Gandhi: साहस, बलिदान और आपातकाल का सच

राहुल गांधी ने लिखा—
“हर परिस्थिति में देशहित को सर्वोपरि रखने की सीख मुझे दादी से मिली है।”

सचिन पायलट, सुरजेवाला, भूपेश बघेल और अन्य नेताओं ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व को उस रूप में याद किया जिसने—

  • हरित क्रांति

  • बांग्लादेश मुक्ति युद्ध

  • बैंक राष्ट्रीयकरण

  • अंतरिक्ष व परमाणु कार्यक्रम

  • और सामाजिक न्याय के बड़े कदमों—
    के जरिए भारत की दिशा बदल दी।

कांग्रेस का राजनीतिक आक्रमण:

एसआईआर के खिलाफ जनयुद्ध का ऐलान

इंदिरा जयंती के दिन हुए कांग्रेस वर्किंग लेवल की मीटिंग में पार्टी ने एसआईआर के खिलाफ देशव्यापी संघर्ष का फैसला लिया।
वेणुगोपाल और पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि—

  • चुनाव आयोग “भाजपा के दबाव में” वोट हटाने की योजना चला रहा है

  • बिहार की तरह अब 12 राज्यों में वोटर सूची से नाम काटे जा रहे हैं

  • केरल विधानसभा तक इस प्रक्रिया पर रोक लगाने का प्रस्ताव पारित कर चुकी है

  • बीएलओ आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि एक महीने में असंभव लक्ष्य दे दिया गया है

कांग्रेस ने दिसंबर के पहले सप्ताह में रामलीला मैदान में विशाल रैली का ऐलान किया है।

यह रणनीति इंदिरा युग की याद दिलाती है—“कठिन लड़ाइयाँ जनता की भागीदारी से ही जीती जाती हैं।”

इंदिरा गांधी: आज होतीं तो क्या करतीं?

दस्तावेज़ी इतिहास (Nehru Memorial Papers, Congress Working Committee Records, Contemporary Studies by Granville Austin & Pupul Jayakar) यह स्पष्ट करता है कि इंदिरा गांधी के पास चार ऐसी ठोस रणनीतियाँ थीं, जिनसे वे हर कठिन परिस्थिति को जीत में बदल देती थीं।

1. जनता से सीधे संवाद — बाईपास द रोड़ब्लॉक्स

1980 में जब उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा, तब उन्होंने पार्टी संगठन पर निर्भर रहने के बजाय जनता के बीच सीधा अभियान छेड़ा—छोटे गांवों, कस्बों में “मिट्टी और जनता की धड़कन” पढ़ते हुए।

आज होतीं तो?
इंदिरा गांधी एसआईआर जैसे मुद्दे को “जनता के अधिकार” का मुद्दा बनाकर देशव्यापी जनआंदोलन छेड़ देतीं—ठीक वैसा ही जैसा कांग्रेस अब करने की कोशिश कर रही है।

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2. मुद्दे को नैतिक युद्ध में बदलना

इंदिरा हर राजनीतिक टकराव को सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि “देश के भविष्य और लोकतंत्र” के मुद्दे के रूप में पेश करती थीं।

आज होतीं तो?
वे एसआईआर को “मताधिकार पर हमला” बताकर इसे नैतिक लड़ाई का रूप देतीं—जो व्यापक सहानुभूति पैदा करता।

https://x.com/VinodJakharIN/status/1991029716896387516?s=20

3. संगठन का केंद्रीकृत, अनुशासित और तेज़ नेतृत्व

इंदिरा गांधी की नेतृत्व शैली स्पष्ट थी—
✔ त्वरित निर्णय
✔ स्पष्ट संदेश
✔ और किसी भी प्रकार की गुटबाजी पर सख्त रोक

1980 में उन्होंने 1977 की पराजय के बाद पार्टी में व्यापक पुनर्गठन किया।

आज होतीं तो?
वे कांग्रेस में “एक लाइन का संदेश” देकर पूरे संगठन को एक झंडे के नीचे खड़ा करतीं और सभी राज्यों को एकीकृत अभियान में बदल देतीं।

4. भावनात्मक-प्रतीकात्मक राजनीति का उपयोग

इंदिरा गांधी जनता से भावनात्मक रूप से जुड़ने में माहिर थीं—बांग्लादेश युद्ध, गरीबी हटाओ, हरित क्रांति, अंतरिक्ष कार्यक्रम—सब में भावनात्मक कथा थी।

आज होतीं तो?
वे वोटर सूची हटाने के मुद्दे से “सामाजिक न्याय”, “आवाज़”, “अधिकार” जैसे भावनात्मक तत्व जोड़ देतीं—जो मध्य वर्ग, गरीबों और युवाओं में तुरंत गूंजते।

निष्कर्ष: इंदिरा गांधी जीवित प्रतीक क्यों हैं?

क्योंकि—

  • संकट में आक्रामक रणनीति

  • जनता का समर्थन जुटाने की क्षमता

  • प्रशासनिक दृढ़ता

  • और राष्ट्रीय हित पर अडिग रहना

इन गुणों की आज भी भारतीय राजनीति में कमी महसूस की जाती है।

कांग्रेस का एसआईआर के खिलाफ रैली का निर्णय इंदिरा की शैली की झलक है—एक तीखा, जन-संलग्न, संघर्ष आधारित राजनीतिक अभियान।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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