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India New Zealand FTA: नौ महीने में ऐतिहासिक समझौता

India New Zealand FTA: नौ महीने में ऐतिहासिक समझौता, पीएम लक्सन ने बताया पहले कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि

भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर दोनों देशों के संबंधों में एक नया अध्याय जुड़ गया है। न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने इस समझौते को अपने पहले कार्यकाल की एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि बताते हुए कहा है कि उनकी सरकार ने भारत के साथ FTA करने का जो वादा किया था, उसे पूरा कर दिखाया है।

https://x.com/chrisluxonmp/status/2004720237107953813?s=20

प्रधानमंत्री लक्सन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा,

“हमने कहा था कि अपने पहले कार्यकाल में भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हासिल करेंगे, और हमने कर दिखाया। यह ऐतिहासिक समझौता अधिक नौकरियों, बेहतर आय और निर्यात के नए अवसर पैदा करेगा, क्योंकि इससे 1.4 अरब भारतीय उपभोक्ताओं के लिए दरवाज़े खुलेंगे।”

उन्होंने इस समझौते को न्यूज़ीलैंड की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति से जोड़ते हुए कहा कि यह देश के भविष्य के निर्माण की दिशा में एक ठोस कदम है। अपने संदेश के अंत में उन्होंने सरकार की नीति-पंक्ति दोहराई—
“Fixing the Basics. Building the Future.”

नौ महीने में पूरी हुई बातचीत, व्यापारिक रिश्तों को नई गति

गौरतलब है कि भारत और न्यूज़ीलैंड ने मात्र नौ महीनों में FTA वार्ताओं को पूरा कर लिया, जिसे कूटनीतिक हलकों में तेज़ और लक्षित व्यापार कूटनीति का उदाहरण माना जा रहा है। यह समझौता न केवल द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊँचाई देने वाला है, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका को भी रेखांकित करता है।

समझौते के तहत न्यूज़ीलैंड के 95 प्रतिशत निर्यातों पर टैरिफ समाप्त या कम किए जाएंगे। इनमें कीवीफ्रूट, सेब, वाइन, भेड़ का मांस और शहद जैसे प्रमुख कृषि उत्पाद शामिल हैं। इसके साथ-साथ फिनटेक और अन्य सेवा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है, जो भारत की सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था के अनुरूप है।

डेयरी सेक्टर पर भारत का संतुलित रुख

हालाँकि, डेयरी सेक्टर इस समझौते का सबसे संवेदनशील पहलू बना हुआ है। भारत की घरेलू दुग्ध अर्थव्यवस्था और करोड़ों छोटे किसानों को ध्यान में रखते हुए दूध, पनीर और मक्खन पर कोई तत्काल टैरिफ कटौती नहीं की गई है। इसके बावजूद, समझौते में एक वर्ष की समीक्षा और पुनः वार्ता का प्रावधान रखा गया है, जिससे भविष्य में इस क्षेत्र पर बातचीत की गुंजाइश बनी रहेगी।

न्यूज़ीलैंड में घरेलू राजनीति बनी चुनौती

FTA को लेकर न्यूज़ीलैंड के भीतर राजनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं। गठबंधन सरकार के प्रमुख सहयोगी और विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने इमिग्रेशन से जुड़े प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। इनमें भारत के लिए 1,667 स्किल्ड वीज़ा और अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अधिक काम के अधिकार देने का प्रस्ताव शामिल है। पीटर्स का तर्क है कि इससे न्यूज़ीलैंड के घरेलू श्रम बाज़ार पर दबाव बढ़ सकता है।

यह विरोध ऐसे समय पर सामने आया है, जब समझौते की अनुमोदन प्रक्रिया (Ratification) 2026 की शुरुआत में प्रस्तावित है, जिससे सरकार के भीतर तनाव की स्थिति बनती दिख रही है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज़ से क्यों अहम है यह समझौता?

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत–न्यूज़ीलैंड FTA केवल एक व्यापार समझौता नहीं, बल्कि यह आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिल प्रकृति को दर्शाता है। यह समझौता:

  • भारत की विश्वसनीय व्यापारिक साझेदार के रूप में छवि को मजबूत करता है

  • इंडो-पैसिफिक में मध्यम शक्तियों के साथ रणनीतिक गठजोड़ को बढ़ावा देता है

  • चीन-केंद्रित आपूर्ति श्रृंखलाओं के वैकल्पिक विकल्प तैयार करता है

न्यूज़ीलैंड के लिए यह समझौता दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक—भारत—तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करता है।

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निष्कर्ष

जैसे-जैसे 2026 में FTA के अनुमोदन की प्रक्रिया नज़दीक आ रही है, भारत–न्यूज़ीलैंड समझौता यह स्पष्ट करता है कि आज के अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। इनमें घरेलू राजनीति, श्रम गतिशीलता, रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय भू-राजनीति—सभी का समन्वय शामिल है। यह समझौता भारत की उभरती वैश्विक भूमिका का एक महत्वपूर्ण संकेतक बनकर उभर रहा है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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