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UP Road Accidents: यूपी की सड़कें या मौत का हाईवे: लखनऊ में फेल हुआ ट्रैफिक मैनेजमेंट, अब ‘दिल्ली मॉडल’ ही आखिरी उम्मीद

रफ्तार का जुनून या मौत का जाल? हर साल 8,000 से ज्यादा जिंदगियां निगल रही हैं सड़कें

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सड़कें इन दिनों ‘डेथ ज़ोन’ में तब्दील होती जा रही हैं। हालिया आंकड़ों ने राज्य में सड़क सुरक्षा के दावों की पोल खोल कर रख दी है। 1 जनवरी से 20 मई 2026 के बीच ही राज्य में 13,000 से अधिक सड़क हादसे और लगभग 7,700 मौतें दर्ज की गई हैं। यदि यही रफ्तार रही, तो इस साल का आंकड़ा पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ सकता है।

विश्लेषण: हादसों का ‘टाइम स्लॉट’ और लापरवाही

उत्तर प्रदेश रोड सेफ्टी सेल की रिपोर्ट के अनुसार, दोपहर (12 PM – 6 PM) और शाम (6 PM – 9 PM) का समय सबसे घातक साबित हो रहा है।

  • दोपहर की मार: चिलचिलाती धूप, ड्राइवर की थकान और ओवरस्पीडिंग के कारण 4,352 हादसे हुए।

  • शाम का संकट: दफ्तरों से घर लौटने वाली भारी भीड़ और ढलते सूरज के साथ कम होती विजिबिलिटी ने 1,945 जानें लीं।

  • देर रात की घात: रात 3 से 6 बजे के बीच हादसे कम (506) हुए, लेकिन मृत्यु दर 77% रही, जिसका मुख्य कारण नींद की झपकी और खाली सड़कों पर अनियंत्रित रफ्तार है।

UP Road Accidents
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संकट के गहरे कारण: केवल सड़क खराब नहीं, सिस्टम भी जिम्मेदार

1. वाहनों के पंजीकरण में अभूतपूर्व वृद्धि

यूपी में पिछले कुछ वर्षों में निजी और व्यावसायिक वाहनों के पंजीकरण में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। सड़कों का जाल तो बिछा, लेकिन उस पर दौड़ने वाले वाहनों के दबाव को संभालने के लिए ट्रैफिक मैनेजमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर उस अनुपात में विकसित नहीं हो पाया। संकरी सड़कें और बढ़ता ‘वेहिकुलर लोड’ हादसों की पहली कड़ी है।

2. ड्राइविंग लाइसेंस वितरण में ‘संस्थागत भ्रष्टाचार’

सड़क हादसों का एक बड़ा और कड़वा सच ड्राइविंग लाइसेंस (DL) की प्रक्रिया में व्याप्त भ्रष्टाचार है। आरटीओ (RTO) कार्यालयों में बिना कड़े परीक्षण के लाइसेंस जारी करना आम बात हो गई है।

  • अकुशल चालक: भ्रष्टाचार के चलते ऐसे लोग भी सड़कों पर भारी वाहन दौड़ा रहे हैं जिन्हें ट्रैफिक नियमों की बुनियादी समझ तक नहीं है।

  • फर्जी सर्टिफिकेट: मेडिकल और फिटनेस सर्टिफिकेट की खरीद-फरोख्त ने सड़कों पर ‘अनफिट’ ड्राइवरों और वाहनों की फौज खड़ी कर दी है।

3. ‘स्मार्ट सिटी’ बनाम जमीनी हकीकत

भले ही हम स्मार्ट सिटी की बात करें, लेकिन सड़कों पर खुले मैनहोल, अवैध कट और स्ट्रीट लाइट्स का अभाव आज भी जानलेवा बना हुआ है। हाल ही में लुधियाना और नालंदा जैसी घटनाएं इस प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण हैं।

क्या है समाधान?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को 50% तक कम करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन यह केवल कागजी आदेशों से संभव नहीं है। इसके लिए कुछ कड़े कदम उठाने होंगे:

  • RTO की सफाई: लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम हो।

  • कठोर प्रवर्तन: पीक आवर्स के दौरान पुलिस की तैनाती और सीसीटीवी के जरिए ई-चालान की व्यवस्था को सख्ती से लागू करना।

  • व्यावसायिक चालकों की ट्रेनिंग: लंबी दूरी के ट्रक और बस ड्राइवरों के लिए अनिवार्य ‘रेस्ट स्टॉप्स’ और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच।

  • स्कूल-ऑफिस टाइमिंग: भीड़ कम करने के लिए कार्यालयों और स्कूलों के समय में बदलाव पर विचार।

 उत्तर प्रदेश की सड़कों पर बहता खून थामने के लिए केवल हेलमेट और सीट बेल्ट काफी नहीं है। जब तक सिस्टम की खामियों और भ्रष्टाचार के ‘अंधे मोड़ों’ को ठीक नहीं किया जाएगा, तब तक उत्तर प्रदेश की सड़कें इसी तरह ‘मौत का रास्ता’ बनी रहेंगी।

UP Road Accidents
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लखनऊ का ट्रैफिक: ‘नवाबी’ सड़कों पर ‘बेतरतीब’ रफ्तार का पहरा

राजधानी लखनऊ, जिसे अपनी तहजीब के लिए जाना जाता है, आज अपनी ‘बदहाल’ ट्रैफिक व्यवस्था के कारण ‘हादसों का शहर’ बनती जा रही है। प्रशासन द्वारा किए जा रहे प्रयोग समाधान के बजाय नई मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं।

1. ‘कट’ का खेल और लंबी कतारें

ट्रैफिक पुलिस ने चौराहों पर दबाव कम करने के लिए मुख्य चौराहों को बंद कर आगे ‘कट’ (U-Turn) दे दिए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि एक चौराहे की रेड लाइट पर रुकने वाले वाहनों की कतार अब दूसरे चौराहे तक पहुंच जाती है।

  • विफलता का कारण: ‘कट’ देने से यातायात का प्रवाह सुचारू होने के बजाय ‘बॉटलनेक’ (Bottleneck) की स्थिति पैदा हो रही है, जिससे जाम की समस्या और विकराल हो गई है।

2. ई-रिक्शा और बैटरी ऑटो: नियम ताक पर

शहर की सड़कों पर ई-रिक्शा और बैटरी ऑटो की बाढ़ आ गई है, लेकिन इनके लिए न तो कोई लेन निर्धारित है और न ही कोई कड़ा नियम।

  • मनमानी: रेड लाइट जंप करना, सवारी देखते ही बीच सड़क पर अचानक ब्रेक मार देना और गलत दिशा (Wrong Side) में गाड़ी चलाना इनके लिए सामान्य बात है। प्रशासन की ढील ने इन्हें ‘सड़क का अघोषित मालिक’ बना दिया है।

3. ‘मौत से बेखौफ’ वाहन चालक

सड़क पर हर दूसरा चालक इस मानसिकता के साथ गाड़ी चला रहा है कि— “हमें तो मरना है, तुम्हें बचना है तो बचो।” यातायात नियमों के प्रति यह संवेदनहीनता ही गंभीर हादसों की मुख्य वजह है। ओवरस्पीडिंग और ‘रैश ड्राइविंग’ अब केवल युवाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि सार्वजनिक परिवहन में भी घर कर गई है।

4. पैदल यात्रियों का अस्तित्व संकट में

शहर के विकास की बलि सबसे पहले ‘फुटपाथ’ की चढ़ी है।

  • अवैध कब्जे: जहां फुटपाथ बचे हैं, वहां या तो रेहड़ी-पटरी वालों का कब्जा है या फिर पार्किंग बना दी गई है।

  • मजबूरी की राह: पैदल चलने वालों के पास सड़क के बीचों-बीच चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता, जहां वे तेज रफ्तार वाहनों के सीधे निशाने पर होते हैं। प्रशासन ने सड़कों को चौड़ा करने के नाम पर पैदल यात्रियों के सुरक्षित चलने के अधिकार को लगभग खत्म ही कर दिया है।

समाधान की दिशा: क्या हो सकता है?

  • स्मार्ट सिग्नलिंग: केवल कट देने के बजाय ‘सिंक्रोनाइज्ड ट्रैफिक लाइट्स’ (Green Wave) का इस्तेमाल हो, ताकि एक चौराहे से निकला वाहन अगले पर न फंसे।

  • ई-रिक्शा का पंजीकरण और रूट: हर ई-रिक्शा का रूट तय हो और मुख्य सड़कों पर इनकी संख्या सीमित की जाए।

  • फुटपाथ बहाली: पैदल यात्रियों के लिए ‘एनक्रोचमेंट फ्री’ फुटपाथ और जेब्रा क्रॉसिंग का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो।

माधान या समझौता? दिल्ली मॉडल और ‘लेन अनुशासन’ ही एकमात्र विकल्प

उत्तर प्रदेश की राजधानी में ट्रैफिक सुधार के नाम पर किए जा रहे प्रयोग तब तक विफल रहेंगे, जब तक कि प्रवर्तन (Enforcement) को प्राथमिकता नहीं दी जाती। विशेषज्ञों और त्रस्त जनता का मानना है कि अब ‘सॉफ्ट पुलिसिंग’ का समय निकल चुका है।

1. दिल्ली की तर्ज पर ‘इंस्टेंट चालान’ और लेन कंट्रोल

दिल्ली में जिस तरह बस लेन और कार लेन निर्धारित हैं और ‘लेन जंप’ करते ही कैमरों के जरिए मोबाइल पर चालान पहुंचता है, लखनऊ में उसकी सख्त दरकार है।

  • लेन जंप पर अंकुश: जब तक वाहन चालक के मन में यह डर नहीं होगा कि “कोई देख रहा है और तुरंत जुर्माना होगा”, तब तक सड़कों पर अनुशासन नहीं आएगा।

  • रफ़्तार पर लगाम: शहर के भीतर और हाईवे पर स्पीड रडार की संख्या बढ़ानी होगी ताकि रफ़्तार के शौकीनों को कानून का स्वाद चखाया जा सके।

2. ई-रिक्शा और बैटरी ऑटो: ‘जब्ती’ ही एकमात्र इलाज

हाईवे और मुख्य सड़कों (Main Arterial Roads) पर ई-रिक्शा और बैटरी ऑटो का चलना मौत को दावत देने जैसा है।

  • पूर्ण प्रतिबंध: मुख्य सड़कों पर इन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। केवल ‘लिंक रोड’ या आंतरिक कॉलोनियों तक इनका दायरा सीमित हो।

  • कठोर कार्रवाई: पकड़े जाने पर केवल जुर्माना नहीं, बल्कि ‘वाहन जब्ती’ की व्यवस्था होनी चाहिए। पुलिस प्रशासन की ‘आंख पर पट्टी’ ही इन चालकों के दुस्साहस को बढ़ावा दे रही है।

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3. ‘मरने-मारने’ की मानसिकता और पुलिस की सुस्ती

सड़क पर हर चालक दूसरे की जान जोखिम में डालकर आगे निकलने की होड़ में है। हाईवे पर भी धड़ल्ले से चल रहे ई-रिक्शा यह बताने के लिए काफी हैं कि जमीनी स्तर पर पुलिसिंग शून्य है।

  • प्रशासनिक इच्छाशक्ति: मुख्यमंत्री के ‘50% मौतें कम करने’ के लक्ष्य को तब तक हासिल नहीं किया जा सकता, जब तक चौराहे पर खड़ा सिपाही केवल ‘दर्शक’ बना रहेगा।

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अब आर-पार की लड़ाई जरूरी

उत्तर प्रदेश की सड़कें अब केवल डामर का टुकड़ा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का ‘श्मशान’ बनती जा रही हैं। अगर आज भी दिल्ली की तर्ज पर तकनीकी सुधार और जीरो-टोलरेंस की नीति नहीं अपनाई गई, तो लखनऊ का ट्रैफिक केवल एक ‘जंग’ बनकर रह जाएगा, जिसमें हर दिन एक आम नागरिक हारता है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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