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Shaheed Diwas: भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए कुर्बान किया, इंकलाब जिंदाबाद

Shaheed Diwas: 23 मार्च—भारत के इतिहास का वह दिन, जब तीन नौजवानों की हंसी फांसी के फंदे पर भी नहीं रुकी और एक साम्राज्य की नींव हिला गई। 95 साल बाद भी यह तारीख सिर्फ कैलेंडर का हिस्सा नहीं, बल्कि एक जीवित स्मृति है। देशभर में आज Shaheed Diwas के मौके पर Bhagat Singh, Shivaram Rajguru और Sukhdev Thapar को याद किया गया—सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह एक ही नाम गूंजता रहा: इंकलाब जिंदाबाद

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सुबह से ही #ShaheedDiwas और #BhagatSingh जैसे हैशटैग ट्रेंड करते रहे। यूजर्स ने 23 मार्च 1931 को याद करते हुए उन पलों को फिर से जिया, जब इन तीनों क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते फांसी को गले लगाया था। कई पोस्ट में यह भाव साफ दिखा कि “उन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए कुर्बान किया”—एक लाइन, जो आज भी देश के युवाओं के दिल में वैसी ही आग जगाती है जैसी उस दौर में जगाई थी।

https://x.com/narendramodi/status/2035904363781091559?s=20

बहरों को सुनाने की कोशिश

इतिहास के पन्नों में दर्ज कहानी आज फिर चर्चा में रही—कैसे Bhagat Singh, Shivaram Rajguru और Sukhdev Thapar ने Lala Lajpat Rai की मौत का बदला लेने के लिए 1928 में ब्रिटिश अधिकारी को निशाना बनाया और फिर 1929 में सेंट्रल असेंबली में बम फेंककर “बहरों को सुनाने” की कोशिश की। उनका मकसद हिंसा नहीं, बल्कि एक संदेश था—औपनिवेशिक दमन के खिलाफ आवाज उठाने का संदेश।

देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं और संगठनों ने मार्च निकाले, सफाई अभियान चलाए, क्विज प्रतियोगिताएं आयोजित कीं—एक तरह से यह श्रद्धांजलि सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में भी दिखी। वहीं Narendra Modi सहित कई नेताओं ने भी इन क्रांतिकारियों को याद करते हुए उनके साहस और बलिदान को नमन किया।

https://x.com/myogiadityanath/status/2035881502064648603?s=20

लेकिन इस बार की चर्चा सिर्फ श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रही। इतिहासकारों और विचारकों ने Bhagat Singh के उस वैचारिक पक्ष को भी सामने लाने की कोशिश की, जो अक्सर नारों के शोर में दब जाता है। उनके लेखन—रैशनलिज़्म, सेक्युलरिज़्म और समाजवाद पर आधारित विचार—आज के भारत के लिए भी उतने ही प्रासंगिक बताए जा रहे हैं।

“वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं”

सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने उनके प्रसिद्ध कथन को भी शेयर किया—“वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं”—और यही लाइन इस पूरे ट्रेंड का सार बनती नजर आई। यह सिर्फ एक ऐतिहासिक उद्धरण नहीं, बल्कि आज की पीढ़ी के लिए एक सवाल भी है: क्या हम उन विचारों को समझ रहे हैं, जिनके लिए उन्होंने अपनी जान दी?

इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प बात यह भी रही कि डिजिटल युग में शहादत की याद कैसे एक “ट्रेंड” बन जाती है—लेकिन क्या यह ट्रेंडिंग भावना स्थायी भी बनती है? यह सवाल बार-बार उभरता रहा।

आखिर में, 23 मार्च सिर्फ अतीत को याद करने का दिन नहीं, बल्कि वर्तमान को आईना दिखाने का भी मौका है। Bhagat Singh, Shivaram Rajguru और Sukhdev Thapar की शहादत हमें यह याद दिलाती है कि आज़ादी सिर्फ हासिल करने की चीज़ नहीं, बल्कि उसे समझने और बचाए रखने की जिम्मेदारी भी है।

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और शायद यही वजह है कि 95 साल बाद भी, फांसी के उस तख्ते से उठी आवाज आज भी सुनाई देती है—
“इंकलाब जिंदाबाद।”

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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