Netaji Subhas Chandra Bose: 23 जनवरी भारत के इतिहास में साहस, स्वाभिमान और निर्णायक नेतृत्व का प्रतीक है। इसी दिन पराक्रम दिवस के रूप में देश नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाता है। 129वीं जयंती पर राष्ट्र उन्हें उस क्रांतिकारी के रूप में स्मरण करता है जिसने केवल स्वतंत्रता का स्वप्न नहीं देखा, बल्कि उसे संगठित सत्ता, सेना, सरकार और अंतरराष्ट्रीय वैधता के साथ साकार करने का प्रयास किया।
नेताजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता केवल आंदोलन से नहीं, बल्कि राज्य-निर्माण की तैयारी से मिलती है। इसी सोच ने 1943 में अज़ाद हिंद सरकार के जन्म को संभव बनाया—जो भारत के इतिहास में स्वतंत्रता-आधारित पहली भारतीय सरकार मानी जाती है।
प्रारंभिक जीवन और वैचारिक निर्माण
23 जनवरी 1897, कटक (ओडिशा) में जन्मे सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही असाधारण प्रतिभा और अनुशासन के लिए जाने गए। कलकत्ता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में उच्च स्थान प्राप्त करने के बाद उन्होंने इंडियन सिविल सर्विस (ICS) परीक्षा उत्तीर्ण की, परंतु ब्रिटिश शासन के अधीन सेवा को अस्वीकार कर दिया। यह त्याग उनके जीवन की दिशा तय करने वाला क्षण था।
कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने पूर्ण स्वराज की मांग को मुखर किया। वैचारिक मतभेदों के कारण वे मुख्यधारा से अलग हुए, किंतु राष्ट्रहित सर्वोपरि रहा। द्वितीय विश्व युद्ध की उथल-पुथल ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रश्न रखने का अवसर दिया।
पलायन से पराक्रम तक: अंतरराष्ट्रीय रणनीति
नेताजी का साहसिक पलायन—कलकत्ता से काबुल, फिर यूरोप और अंततः दक्षिण-पूर्व एशिया—भारतीय इतिहास की सबसे रोमांचक घटनाओं में से है। जर्मनी में उन्होंने फ्री इंडिया सेंटर स्थापित किया और आज़ाद हिंद रेडियो के माध्यम से भारतवासियों को संबोधित किया। बाद में वे जापान के सहयोग से सिंगापुर पहुँचे, जहाँ इंडियन नेशनल आर्मी (INA) को संगठित किया गया।
अज़ाद हिंद सरकार: स्वतंत्र भारत की पहली सरकार (1943)
21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में अज़ाद हिंद सरकार (Provisional Government of Free India) की घोषणा हुई। यह केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं था—यह एक कार्यशील सरकार थी, जिसके पास:
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राष्ट्राध्यक्ष/प्रधान (Head of State & Government): नेताजी सुभाष चंद्र बोस
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सेना: इंडियन नेशनल आर्मी (INA)
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मुद्रा, डाक-टिकट, अदालतें और प्रशासनिक ढाँचा
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अंतरराष्ट्रीय मान्यता: जापान, जर्मनी, इटली सहित कई देशों द्वारा औपचारिक स्वीकार्यता
नेताजी ने अंडमान-निकोबार को “शहीद” और “स्वराज” नाम दिए—यह स्वतंत्र भारत की संप्रभुता का प्रतीकात्मक विस्तार था।
महत्वपूर्ण स्पष्टता: इतिहासकारों के अनुसार नेताजी अज़ाद हिंद सरकार के राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमंत्री—दोनों थे। इसी अर्थ में उन्हें “स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति-सदृश” कहा जाता है—क्योंकि वे पहली भारतीय सरकार के सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख थे, जिसने ब्रिटिश सत्ता को अस्वीकार कर स्वतंत्र भारत का प्रतिनिधित्व किया।
“तुम मुझे खून दो…”—संगठन और संकल्प
नेताजी का नेतृत्व केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज को अनुशासन, रणनीति और उद्देश्य दिया। उनका आह्वान—
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—सैनिकों और प्रवासी भारतीयों के लिए संकल्प-वाक्य बन गया।
रानी झांसी रेजिमेंट का गठन उनके प्रगतिशील दृष्टिकोण का प्रमाण है—महिलाओं की सशस्त्र भागीदारी उस दौर में क्रांतिकारी कदम था।
सैन्य अभियानों और वैश्विक प्रभाव
INA ने इंफाल-कोहिमा अभियान में भाग लिया। भले ही युद्धक्षेत्र में अंतिम सफलता न मिली, पर मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक प्रभाव दूरगामी रहा। युद्धोपरांत INA ट्रायल्स ने देशव्यापी आक्रोश और एकता को जन्म दिया—जिसका असर ब्रिटिश शासन की वैधता पर पड़ा।
रहस्यमयी अंत और अमर विरासत
18 अगस्त 1945 की विमान दुर्घटना से जुड़ा प्रश्न आज भी बहस का विषय है। अनेक आयोग बने, किंतु नेताजी की मृत्यु का रहस्य उनके जीवन की तरह ही असाधारण बना रहा। फिर भी, उनके विचार—राष्ट्रवाद, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और सशक्त राज्य—भारतीय गणराज्य की बुनियाद में रचे-बसे हैं।
पराक्रम दिवस और समकालीन सम्मान
आज भारत पराक्रम दिवस के रूप में नेताजी को सम्मान देता है। सरकारी अभिलेखों का डिक्लासिफिकेशन, इंडिया गेट पर प्रतिमा, और उनके नाम पर संस्थान—यह सब उस ऐतिहासिक ऋण की स्वीकृति है, जो राष्ट्र नेताजी पर मानता है। सत्ता-विपक्ष से परे, नेताजी की विरासत राष्ट्रीय एकता का साझा सूत्र है।
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क्यों नेताजी “स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति-सदृश”?
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उन्होंने पहली स्वतंत्र भारतीय सरकार का नेतृत्व किया।
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वे सरकार के सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख थे।
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उनके पास सेना, प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय मान्यता थी।
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उन्होंने भारतीय संप्रभुता को औपचारिक रूप से घोषित किया।
इसी ऐतिहासिक संदर्भ में विद्वान उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति-सदृश राष्ट्राध्यक्ष के रूप में निरूपित करते हैं—यह संवैधानिक पद की आधुनिक परिभाषा नहीं, बल्कि राज्य-निर्माण के अग्रदूत के रूप में सम्मान है।
https://x.com/narendramodi/status/2014510942390981099?s=20
आज़ादी की अधूरी नहीं, संगठित कल्पना
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्रता को संगठित सत्ता में ढालने का साहस दिखाया। वे केवल क्रांतिकारी नहीं, राज्य-निर्माता थे। पराक्रम दिवस हमें याद दिलाता है कि आज़ादी भावनाओं से नहीं, संस्थाओं, अनुशासन और नेतृत्व से सुरक्षित रहती है—और यही नेताजी की सबसे बड़ी देन है।








