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Braj Holi harassment: परंपरा के नाम पर महिलाओं से छेड़छाड़ का सच

Braj Holi harassment: परंपरा, पीड़ा और प्रश्न

Braj की होली सिर्फ रंगों का उत्सव नहीं, भावों का विस्तार मानी जाती है। Mathura और Vrindavan की गलियों में जब रंग उड़ते हैं तो मान्यता होती है कि हर स्त्री राधा का स्वरूप है और हर पुरुष कृष्ण का सखा। यह उत्सव आस्था, लोक-संस्कृति और सामूहिक उल्लास का संगम है।

लेकिन इस बार जो वीडियो सामने आए, उन्होंने उत्सव के रंग में एक कड़वा सवाल घोल दिया है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर वायरल क्लिप्स में कुछ पुरुष महिलाओं के निजी अंगों पर जबरन रंग लगाते, अश्लील टिप्पणियाँ करते और विरोध करने पर फोन नंबर माँगते दिखे। एक महिला का बयान—“त्योहार अब मनचलों के लिए अवसर बन गया है”—सिर्फ शिकायत नहीं, समाज के चेहरे पर तमाचा है।

https://x.com/th_anonymouse/status/2027417139632849367?s=20

परंपरा बनाम विकृति

ब्रज की पारंपरिक होली, खासकर Lathmar Holi, सदियों से प्रतीकात्मक छेड़छाड़ और नाटकीय संवाद की लोक-परंपरा रही है। इसमें स्त्रियाँ लाठियों से पुरुषों को परंपरागत ढंग से पराजित करती हैं—यह शक्ति और हास्य का सांस्कृतिक अभिनय है, न कि वास्तविक उत्पीड़न।

https://x.com/sachya2002/status/2027389307892518922?s=20

लेकिन जब “मस्ती” की आड़ में देह पर हमला हो, सहमति को ठहाकों में डुबो दिया जाए और भीड़ अपराध का कवच बन जाए—तो यह परंपरा नहीं, अपराध है।

कानून की मौजूदगी, मानसिकता की कमी

Uttar Pradesh Police ने होली तक 4,000 से अधिक पुलिसकर्मियों, ड्रोन और 150 स्थानों पर CCTV की तैनाती की बात कही है। हेल्पलाइन 112 सक्रिय है। व्यवस्था मौजूद है।

पर सवाल यह है—क्या सुरक्षा सिर्फ वर्दी से आएगी?
क्या भीड़ में खड़े लोग तमाशबीन नहीं बनेंगे?
क्या समाज यह तय करेगा कि ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ ही है—त्योहार के दिन भी?

https://x.com/RohitDu48986022/status/2027403917219463299?s=20

उत्सव बंद हो या सोच बदले?

कुछ प्रतिक्रियाओं में यह भी कहा गया कि अगर यही हाल है तो ऐसी होली बंद कर देनी चाहिए। यह पीड़ा का स्वाभाविक विस्फोट है। जब आनंद की जगह भय ले ले, तो परंपरा पर प्रश्नचिह्न लगना तय है।

लेकिन क्या समाधान बंद करना है?
या उस मानसिकता को बेनकाब करना है जो देवी की आराधना और देह की अवमानना को एक साथ जीती है?

https://x.com/TweetAbhishekA/status/2027358484388274188?s=20

ब्रज की होली की आत्मा राधा-कृष्ण के प्रेम में है, जिसमें छेड़छाड़ भी काव्य है, हिंसा नहीं। जहां स्त्री पूज्य है, वस्तु नहीं। अगर वही ब्रज स्त्री की अस्मिता की रक्षा नहीं कर पाए, तो यह सिर्फ कानून की नहीं, हमारी सामूहिक चेतना की विफलता होगी।

अंतिम प्रश्न

त्योहार समाज का आईना होते हैं।
अगर आईने में चेहरा विकृत दिख रहा है, तो आईना तोड़ने से चेहरा नहीं बदलता।

https://tesariaankh.com/politics-ncert-controversy-government-judiciary-tension-education-policy/

ब्रज की होली बंद करने की नहीं, उसे उसकी असली गरिमा में लौटाने की जरूरत है।
रंगों को रंग ही रहने दें—उन्हें किसी की देह पर दाग न बनने दें।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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