Bulldozer Politics: जब कानून दंड का औज़ार बन जाए
Bulldozer Politics: फिलिस्तीन से लेकर भारत तक, बुलडोज़र अब केवल निर्माण या अतिक्रमण हटाने का साधन नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे राज्य शक्ति के ऐसे प्रतीक में बदल चुका है, जिसका इस्तेमाल कानून लागू करने के बजाय डर पैदा करने, समुदायों को नियंत्रित करने और सामूहिक दंड देने के लिए किया जा रहा है।
इज़राइल के कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में दशकों से घरों का ध्वस्तीकरण एक स्थापित नीति रहा है। इन कार्रवाइयों में अक्सर आरोपी व्यक्ति के बजाय उसके पूरे परिवार को दंडित किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और विधि विशेषज्ञों के अनुसार, यह collective punishment का स्पष्ट उदाहरण है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कानून निषिद्ध करता है।
ठीक इसी तरह का चलन भारत में, विशेष रूप से पिछले कुछ वर्षों में, उभरकर सामने आया है। विरोध प्रदर्शनों, सांप्रदायिक हिंसा या कथित अपराधों के बाद मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। कई मामलों में नोटिस बेहद कम समय में दिए गए, जिससे कानूनी बचाव लगभग असंभव हो गया।
विचारधारा और राज्य शक्ति का गठजोड़
विश्लेषकों का मानना है कि भारत और इज़राइल के इन तौर-तरीकों के पीछे केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि गहरी वैचारिक समानताएँ काम कर रही हैं।
इज़राइल में ज़ायनिज़्म और भारत में हिंदुत्व—दोनों ही विचारधाराएँ राष्ट्र को बहुसंख्यक पहचान से जोड़ती हैं। इसके परिणामस्वरूप अल्पसंख्यक समुदायों को अक्सर संदेह, खतरे और अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है।
इन व्यवस्थाओं में असहमति को राष्ट्र-विरोधी या सुरक्षा-खतरे के रूप में पेश किया जाता है। आलोचना को या तो देशद्रोह, या फिर सांप्रदायिक दुर्भावना का नाम दे दिया जाता है। इस माहौल में बुलडोज़र केवल मशीन नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेशवाहक बन जाता है।
कानून का मुखौटा, भय का प्रदर्शन
दोनों देशों में ध्वस्तीकरण को वैधानिक ठहराने के लिए तकनीकी नियमों का सहारा लिया जाता है—जैसे अवैध निर्माण, ज़ोनिंग उल्लंघन या सुरक्षा कारण। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह कानून न्याय का उपकरण न होकर दमन का मंच बन जाता है।
अक्सर बुलडोज़र दिनदहाड़े, मीडिया कैमरों के सामने चलते हैं। यह दृश्य केवल एक इमारत को नहीं गिराता, बल्कि पूरे समुदाय को चेतावनी देता है—लाइन में रहो, वरना अंजाम तय है।
सामूहिक दंड और मानवीय त्रासदी
घर केवल ईंट-पत्थर नहीं होता। वह स्मृति, सुरक्षा और पहचान का केंद्र होता है। जब राज्य किसी व्यक्ति के कथित अपराध के नाम पर पूरे परिवार का घर ढहा देता है, तो वह केवल कानून नहीं तोड़ता—वह मानवीय गरिमा को कुचलता है।
भारत में कई परिवारों ने बताया है कि बुलडोज़र की आवाज़ आज भी उनके सपनों में गूंजती है। फिलिस्तीन में यह पीड़ा और भी व्यापक है—जहाँ घरों के साथ-साथ खेत, जलस्रोत और पूरी बस्तियाँ मिटा दी जाती हैं, जिससे जीवन की निरंतरता ही असंभव हो जाती है।
विद्वान इसे ‘डोमिसाइड’ कहते हैं—राज्य द्वारा घर की हत्या। इसके प्रभाव पीढ़ियों तक चलते हैं।
सांस्कृतिक स्मृति पर हमला
ध्वस्तीकरण केवल आवासीय ढांचों तक सीमित नहीं रहता। धार्मिक स्थल, कब्रिस्तान, स्कूल और सांस्कृतिक चिन्ह भी इसकी चपेट में आते हैं। इससे केवल जमीन नहीं छीनी जाती, बल्कि इतिहास और पहचान को भी मिटाने की कोशिश होती है।
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यही कारण है कि कई शोधकर्ता भारत की हालिया कार्रवाइयों को फिलिस्तीन में अपनाई गई रणनीतियों से प्रेरित मानते हैं—जहाँ भूगोल के साथ-साथ स्मृति को भी बदला जा रहा है।
निष्कर्ष: जब बुलडोज़र बोलता है
कानून तब तक कानून है, जब तक वह न्याय की रक्षा करे। जब वही कानून डर, प्रदर्शन और दंड का साधन बन जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा खतरे में पड़ जाती है।
बुलडोज़र की ताकत उसकी लोहे की भुजाओं में नहीं, बल्कि उस खामोशी में है जो उसके पीछे छोड़ दी जाती है—डरी हुई, उजड़ी हुई, और सवाल पूछने से हिचकती हुई।
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जब किसी का घर गिराया जाता है, तो केवल दीवारें नहीं टूटतीं—नागरिक और राज्य के बीच विश्वास भी मलबे में दब जाता है।








