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Buddha, Piprahwa Relics: इतिहास, स्थिति और आध्यात्मिक महत्व

Buddha, Piprahwa Relics: आस्था, इतिहास और विरासत की अमूल्य कड़ी

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित पिपरहवा केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं है, बल्कि यह भगवान बुद्ध की ऐतिहासिक उपस्थिति और उनके निर्वाण के बाद की परंपरा का जीवंत प्रमाण माना जाता है। यहीं से प्राप्त बुद्ध के अस्थि-अवशेष (Relics) बौद्ध जगत में अत्यंत पवित्र और दुर्लभ माने जाते हैं।

पिपरहवा क्या है?

पिपरहवा को प्राचीन कपिलवस्तु का हिस्सा माना जाता है, जहाँ शाक्य गणराज्य की राजधानी थी। यहीं बुद्ध ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष बिताए। यह स्थान नेपाल सीमा से सटा हुआ है और ऐतिहासिक, भौगोलिक व सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अवशेषों की खोज: इतिहास का निर्णायक क्षण

वर्ष 1898 में ब्रिटिश इंजीनियर और पुरातत्वविद विलियम क्लैक्सटन पेप्पे (W.C. Peppé) ने पिपरहवा में एक प्राचीन स्तूप की खुदाई कराई। यहाँ से एक पत्थर का कलश मिला, जिसमें अस्थि-अवशेष, रत्न और एक ब्राह्मी लिपि का अभिलेख था।

उस अभिलेख में उल्लेख था कि ये अवशेष “भगवान बुद्ध के हैं, जिन्हें शाक्यों द्वारा प्रतिष्ठित किया गया”। यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि बौद्ध ग्रंथों में वर्णित है कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों को आठ भागों में बाँटकर विभिन्न गणराज्यों में स्तूप बनाए गए थे—शाक्य गणराज्य उनमें से एक था।

https://x.com/amanthi4/status/2008409193707905120?s=20

धार्मिक महत्व: बौद्ध आस्था का केंद्र

बौद्ध धर्म में बुद्ध के अवशेष केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि जीवित आस्था के प्रतीक हैं।

  • ये अवशेष बुद्ध की करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग की शिक्षा से जुड़े माने जाते हैं।
  • बौद्ध मान्यता के अनुसार, अवशेषों के दर्शन से पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • यही कारण है कि जब भी पिपरहवा अवशेषों को किसी देश में प्रदर्शित किया जाता है, लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं।

वर्तमान स्थिति: राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विरासत

आज पिपरहवा के अवशेष भारत सरकार के संरक्षण में हैं।

  • इन्हें समय-समय पर श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, मंगोलिया जैसे बौद्ध देशों में प्रदर्शनी के लिए भेजा जाता है।
  • ये अवशेष भारत की बौद्ध कूटनीति (Buddhist Diplomacy) का भी अहम हिस्सा बन चुके हैं, जिससे एशियाई देशों के साथ सांस्कृतिक संबंध मजबूत होते हैं।

ऐतिहासिक विवाद और वैज्ञानिक पुष्टि

कुछ इतिहासकारों ने प्रारंभ में पिपरहवा को लेकर सवाल उठाए, लेकिन बाद की खुदाइयों (विशेष रूप से 1970 के दशक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा) और वैज्ञानिक विश्लेषण ने इस स्थल की प्रामाणिकता को और मजबूत किया। अधिकांश विद्वान अब इसे प्राचीन कपिलवस्तु क्षेत्र से जोड़ते हैं।

आज के समय में महत्व

आज, जब दुनिया हिंसा, असहिष्णुता और संघर्ष से जूझ रही है, बुद्ध के पिपरहवा अवशेष शांति और सह-अस्तित्व का संदेश देते हैं।

  • ये अवशेष भारत की सभ्यतागत पहचान को रेखांकित करते हैं।
  • साथ ही, यह स्मरण कराते हैं कि बुद्ध केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक जीवित विचार हैं।

पिपरहवा के बुद्ध अवशेष इतिहास और आस्था के संगम हैं। ये हमें बुद्ध के जीवन से जोड़ते हैं और उनके संदेश—करुणा, अहिंसा और प्रज्ञा—को आज के युग में भी प्रासंगिक बनाते हैं। पिपरहवा केवल मिट्टी में दबा अतीत नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक शाश्वत धरोहर है।

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Author: Tesari Aankh

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