तीसरी आँख का एग्जिट पोल: बिहार विधानसभा चुनाव 2025
आपके द्वारा प्रदान किए गए बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले और दूसरे चरण के मतदान पर आधारित विभिन्न एग्जिट पोल के इनपुट का गहन विश्लेषण कर, हमारी एजेंसी “तीसरी आँख” (Teesri Aankh) निम्नलिखित व्यापक एग्जिट पोल रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।
सभी एग्जिट पोल के रुझानों की समीक्षा यह संकेत देती है कि एनडीए (NDA) एक बार फिर बहुमत का आंकड़ा पार करने जा रहा है, और नीतीश कुमार (या नए एनडीए नेता) के नेतृत्व में सरकार बनने की प्रबल संभावना है।
मुख्य निष्कर्ष और सीटों का अनुमान
बिहार में सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 122 है। विभिन्न पोल्स के सामूहिक रुझान से स्पष्ट है कि एनडीए यह लक्ष्य आसानी से हासिल कर रहा है।
| गठबंधन/पार्टी | न्यूनतम अनुमानित सीटें | अधिकतम अनुमानित सीटें |
| एनडीए (NDA) | 130 | 170 |
| महागठबंधन (Mahagathbandhan) | 70 | 108 |
| जन सुराज | 0 | 5 |
| अन्य | 2 | 8 |
“तीसरी आँख” का अनुमान: एनडीए की जीत का सबसे संभावित आंकड़ा 150-160 सीटों के बीच रहेगा।
| गठबंधन/पार्टी | सीटों का अनुमानित रेंज |
| एनडीए (NDA) | 130-170 |
| महागठबंधन (Mahagathbandhan) | 70-108 |
| जन सुराज | 0-5 |
| अन्य | 2-8 |
रीजनवाइज (क्षेत्रवार) विश्लेषण
आईएएनएस-मैटराइज के क्षेत्रीय सर्वेक्षणों के आधार पर, एनडीए को चार प्रमुख क्षेत्रों में स्पष्ट बढ़त मिल रही है, जबकि सीमांचल में कड़ा मुकाबला है।
| क्षेत्र | कुल सीटें | एनडीए अनुमानित सीटें | महागठबंधन अनुमानित सीटें | महत्वपूर्ण रुझान |
| अंगिका | 30 | 20-23 | 7-10 | एनडीए को स्पष्ट बढ़त। |
| भोजपुर | 67 | 37-42 | 20-25 | एनडीए आगे, पश्चिमी बिहार में मजबूत प्रदर्शन। |
| मगध | 51 | 30-35 | 17-22 | एनडीए का दबदबा, सुशासन पर विश्वास। |
| मिथिलांचल | 71 | 50-55 | 18-23 | एनडीए की प्रचंड जीत (सबसे बड़ी बढ़त)। |
| सीमांचल | 24 | 10-12 | 8-10 | कड़ा मुकाबला, महागठबंधन (MGB) वोट शेयर में मामूली आगे, अन्य दलों का प्रभाव। |
📊 सामाजिक और वोटर रुझान
वोट शेयर अनुमान (औसत)
- एनडीए: ~48%
- महागठबंधन: ~37%
- जन सुराज/अन्य: ~15%
निर्णायक सामाजिक आधार (वोट शेयर)
| वर्ग | एनडीए (%) | महागठबंधन (%) |
| महिला वोटर्स | 65% | 27% |
| सामान्य वर्ग | 69% | 17% |
| ओबीसी | 51% | 39% |
| मुस्लिम | 10% | 78% |
विश्लेषण:
- महिला शक्ति: महिला मतदाताओं का भारी समर्थन (65%) एनडीए की निर्णायक जीत का सबसे बड़ा कारक है। यह ‘सुशासन’ और सरकारी योजनाओं के प्रति महिलाओं के विश्वास को दर्शाता है।
- व्यापक आधार: एनडीए ने सामान्य, ओबीसी और एससी वर्गों में मज़बूत पैठ बनाए रखी है।
- मुस्लिम एकाधिकार: महागठबंधन ने मुस्लिम वोटर्स का एकतरफा समर्थन (78%) हासिल किया है, लेकिन यह व्यापक आधार की कमी के कारण सीटें जुटाने में पर्याप्त नहीं रहा।
“तीसरी आँख” एग्जिट पोल के अनुसार, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रहा है। हालांकि, अंतिम और आधिकारिक नतीजे 14 नवंबर 2025 को मतगणना के बाद ही सामने आएंगे।
यहां पर आपके मन में एक सवाल होगा कि फिर रिकार्ड तोड़ मतदान के मायने क्या हैं, यह बिल्कुल सही और महत्वपूर्ण सवाल है। इस बार 66.90% (दोनों चरणों का संयुक्त अनुमान) का रिकॉर्ड-तोड़ मतदान प्रतिशत पिछले 20-25 सालों में सबसे अधिक है (2020 की तुलना में लगभग 9% अधिक), और चुनावी विश्लेषण में यह हमेशा सबसे बड़ा पहेली वाला तत्व होता है।
उच्च मतदान का निहितार्थ केवल एक कारक से नहीं समझा जा सकता, बल्कि इसके पीछे कई परस्पर विरोधी कारण हो सकते हैं।
उच्च मतदान: नीतीश के पक्ष या विपक्ष में?
आम तौर पर, उच्च मतदान को दो प्रमुख तरीकों से देखा जाता है, और 2025 के बिहार चुनाव में यह दोनों ही कारक प्रभावी दिख रहे हैं:
- “एंटी-इंकम्बेंसी” (सत्ता विरोधी लहर) का संकेत (विपक्ष में)
जब मतदाता बड़ी संख्या में बाहर निकलते हैं, तो इसका एक क्लासिक अर्थ यह होता है कि मौजूदा सरकार के प्रति गहन नाराजगी है। मतदाता इतने प्रेरित हैं कि वे “बदलाव लाने” के लिए घरों से निकले हैं।
- तर्क: 20 वर्षों से अधिक समय से सत्ता में रहने के कारण, नीतीश कुमार के खिलाफ एक सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) का होना स्वाभाविक है। युवा और पहली बार वोट करने वाले मतदाता, जो रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों से प्रेरित हैं, वे बदलाव के लिए लामबंद हुए होंगे, और उनका वोट महागठबंधन की ओर जा सकता है।
- ऐतिहासिक पैटर्न: कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतिहास में जब भी बिहार में 60% से अधिक मतदान हुआ है (जैसे 1990, 1995), तो या तो सत्ता परिवर्तन हुआ है या फिर त्रिशंकु परिणाम सामने आए हैं।
- “प्रो-इंकम्बेंसी” (सरकार के पक्ष में लहर) का संकेत (पक्ष में)
उच्च मतदान का दूसरा प्रमुख कारण यह भी हो सकता है कि सत्ताधारी दल के समर्थक, खासकर नया और मौन वोटर, सरकार को वापस लाने के लिए अत्यधिक प्रेरित थे।
- तर्क (सबसे महत्वपूर्ण): आपके एग्जिट पोल इनपुट और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस बंपर वोटिंग का सबसे बड़ा कारण महिलाओं की रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी है।
- पहले चरण में महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों से 5-7% अधिक रहा।
- आपके एग्जिट पोल के अनुसार, 65% महिला वोटर्स ने एनडीए के पक्ष में मतदान किया है।
- निष्कर्ष: यह वर्ग नीतीश कुमार की सुशासन की छवि, सुरक्षा, और शराबबंदी जैसी नीतियों पर विश्वास जताता है। यह उच्च मतदान वास्तव में नीतीश कुमार की नीतियों को मजबूत जनादेश देने के लिए हुआ हो सकता है।
निर्णायक कारक: महिला और युवा मतदाता
विश्लेषण से पता चलता है कि यह उच्च मतदान किसी एक पक्ष में जाने के बजाय, दो विशिष्ट समूहों के बीच तनाव का परिणाम है:
| समूह | रुझान/मुद्दा | संभावित लाभार्थी |
| महिला मतदाता | सुरक्षा, सरकारी योजनाएँ, सुशासन | एनडीए (NDA) – (महिला वोटर्स का भारी समर्थन एनडीए के पक्ष में होने के कारण) |
| युवा मतदाता | बेरोजगारी, बदलाव की चाहत | महागठबंधन – (महागठबंधन के प्रचार का मुख्य केंद्र रोजगार रहा) |
“तीसरी आँख” का विश्लेषण
उच्च मतदान के इस पहेली को एग्जिट पोल के नतीजों से मिलाकर देखें तो, यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं का ‘प्रो-इंकम्बेंसी’ वोट (एनडीए के पक्ष में) युवाओं और अन्य वर्गों के ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ वोट (महागठबंधन के पक्ष में) पर भारी पड़ गया है।
यही कारण है कि मतदान प्रतिशत रिकॉर्ड तोड़ होने के बावजूद, एग्जिट पोल एनडीए को बहुमत देते हुए दिखाई दे रहे हैं।
कह सकते हैं कि उच्च मतदान एक डबल-एज्ड तलवार था, लेकिन बिहार के एग्जिट पोल से पता चलता है कि महिला मतदाताओं के रिकॉर्ड-तोड़ और एकतरफा समर्थन ने सत्ता विरोधी लहर के संभावित प्रभाव को बेअसर कर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों और जातीय समीकरणों का प्रभाव
उच्च मतदान और एग्जिट पोल के रुझानों को समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान और बिहार के जटिल जातीय समीकरणों के प्रभाव को समझना आवश्यक है।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों का प्रभाव
एग्जिट पोल के मजबूत रुझानों को देखते हुए, यह मानना सुरक्षित है कि प्रधानमंत्री मोदी का सघन प्रचार अभियान एनडीए की जीत में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक कारक साबित हुआ।
प्रभाव के मुख्य बिंदु:
- राष्ट्रीय चेहरा बनाम स्थानीय असंतोष: नीतीश कुमार के खिलाफ कुछ हद तक सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकम्बेंसी) होने के बावजूद, मोदी ने चुनाव को राष्ट्रीय विश्वसनीयता और विकास बनाम अस्थिरता की बहस में बदल दिया।
- मतदान उत्प्रेरक (Voting Catalyst): मोदी की रैलियों ने एनडीए के पारंपरिक वोटरों में उत्साह भरने और उन्हें मतदान केंद्र तक लाने का काम किया। यह विशेष रूप से उन क्षेत्रों में प्रभावी रहा जहाँ भाजपा की अपनी पकड़ मज़बूत है (जैसे भोजपुर)।
- क्रेडिट ट्रांसफर (योजनाओं का लाभ): प्रधानमंत्री ने केंद्र सरकार की योजनाओं (जैसे आवास, उज्ज्वला, शौचालय) का क्रेडिट सीधे जनता तक पहुँचाया। यह उन महिला मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल रहा जो योजनाओं की प्रमुख लाभार्थी हैं, और जैसा कि हमने देखा, 65% महिला वोट एनडीए को मिला है।
- “डबल इंजन” का नैरेटिव: मोदी ने लगातार केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की “डबल इंजन” सरकार के फायदों पर ज़ोर दिया, जो मतदाताओं को स्थिरता और निरंतर विकास का आश्वासन देता है।
- जातीय समीकरणों का प्रभाव
बिहार में जाति हमेशा से राजनीति की धुरी रही है। 2025 के चुनाव में, एनडीए ने अपने पारंपरिक जातीय समीकरण को मजबूत बनाए रखा, जबकि महागठबंधन ने अपनी मुख्य ताकत पर भरोसा किया।
https://x.com/_Meganews/status/1988450199111647535?s=20
| गठबंधन/पार्टी | मजबूत जातीय आधार | वोटिंग पैटर्न (एग्जिट पोल के आधार पर) |
| एनडीए (NDA) | उच्च जातियाँ (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार), कुर्मी, कोयरी, अति पिछड़ा वर्ग (EBC) का बड़ा हिस्सा, पासवान। | |
| महागठबंधन (Mahagathbandhan) | मुस्लिम, यादव (M-Y समीकरण) का बड़ा हिस्सा, कुछ दलित (एससी) और ओबीसी वर्ग। |
प्रभाव:
- एम-वाई समीकरण (M-Y Factor): महागठबंधन ने मुस्लिम (78% समर्थन) और यादव वोटबैंक को एकजुट रखने में सफलता पाई। हालाँकि, यह केवल 30-35% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जो बहुमत हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं था।
- अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और दलित: एनडीए की सबसे बड़ी ताकत EBC और दलित (एससी) वोटों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हासिल करना रहा। नीतीश कुमार की सरकार ने इन वर्गों को विशेष रूप से लक्षित किया था। एग्जिट पोल के अनुसार, एनडीए को एससी का 49% और ओबीसी का 51% वोट मिला, जो महागठबंधन के MY समीकरण को आसानी से पछाड़ देता है।
- उच्च जातियों का समेकन: उच्च जातियों (सामान्य वर्ग) का रिकॉर्ड तोड़ समर्थन (69%) एनडीए के पक्ष में गया, जो भाजपा के कोर वोटरों की वफादारी को दर्शाता है।
एनडीए की संभावित जीत में प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका ने राष्ट्रीय विश्वसनीयता और योजनाओं के लाभ के नैरेटिव को स्थापित किया, जबकि जातीय समीकरणों के मोर्चे पर, एनडीए EBC और दलितों के महत्वपूर्ण समर्थन को बरकरार रखने में सफल रहा। इन दो कारकों ने मिलकर महागठबंधन के MY समीकरण के प्रभाव को कम कर दिया।
🚩 जन सुराज और अन्य नई पार्टियों के प्रदर्शन का महत्व
आपके एग्जिट पोल इनपुट में जन सुराज (संभावित सीटें: 0-5) और अन्य (संभावित सीटें: 2-8) दलों का उल्लेख है। भले ही ये दल सीटों के मामले में बहुमत से दूर रहे, लेकिन इनका प्रदर्शन बिहार के राजनीतिक परिदृश्य के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
- सीटों पर प्रत्यक्ष प्रभाव (Spoilers Role)
हालांकि जन सुराज को केवल 0-5 सीटें मिलने का अनुमान है, लेकिन उनका असली महत्व यह है कि उन्होंने कई सीटों पर प्रमुख गठबंधनों के वोट काटे होंगे:
- वोट कटना (Vote Splitting): एग्जिट पोल के अनुसार, जन सुराज को सामान्य वर्ग से 7%, ओबीसी से 4%, और एससी/मुस्लिम से भी 4-5% वोट मिले हैं।
- परिणाम: इन वोटों ने कई सीटों पर जीत और हार का अंतर पैदा किया होगा। यह मुख्य रूप से उन सीटों पर असर डालता है जहाँ मुकाबला कांटे का होता है।
- किसको नुकसान?: जन सुराज ने मुख्यतः एंटी-इंकम्बेंसी वोटों के एक हिस्से को अपनी ओर खींचा होगा, जिससे महागठबंधन को नुकसान हुआ होगा। साथ ही, इसने एनडीए के कुछ असंतुष्ट सामान्य वर्ग के वोटों को भी आकर्षित किया होगा।
- नए राजनीतिक विमर्श की शुरुआत
जन सुराज का महत्व सिर्फ सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में एक नए मॉडल के उदय का संकेत देता है:
- विकास-केंद्रित राजनीति: जन सुराज ने पारंपरिक जाति-आधारित राजनीति के विपरीत, विकास, शिक्षा और सुशासन के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। यह भविष्य में बिहार की राजनीति के विमर्श को बदलने की क्षमता रखता है।
- गैर-राजनीतिक नेतृत्व का उदय: इस पार्टी का नेतृत्व एक पेशेवर व्यक्ति द्वारा किया गया, जिसने यह साबित किया कि चुनावी युद्ध में भी एक गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति जनता का ध्यान आकर्षित कर सकता है।
- भविष्य की राजनीति के लिए संकेत
जन सुराज और अन्य छोटी पार्टियों का प्रदर्शन 2025 के बाद की राजनीति के लिए संकेत देता है:
- महागठबंधन के लिए चिंता: यदि जन सुराज ने मुख्य रूप से एंटी-इंकम्बेंसी वोट काटे हैं, तो यह महागठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसका अर्थ है कि विपक्ष के पास अपनी ताकत को एकजुट करने की क्षमता नहीं है।
- एनडीए के लिए चेतावनी: यह दर्शाता है कि पारंपरिक दलों से असंतुष्ट एक वर्ग है जो एक तीसरा विकल्प चाहता है। यदि प्रमुख गठबंधन इन मुद्दों को हल नहीं करते हैं, तो भविष्य में यह तीसरी शक्ति और मज़बूत हो सकती है।
- वोटिंग पैटर्न में बदलाव: ‘जन सुराज’ जैसे दलों को मिला समर्थन दिखाता है कि बिहार के मतदाता अब केवल जाति या दल के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रदर्शन और मुद्दों के आधार पर भी वोट देने को तैयार हैं।
https://tesariaankh.com/bihar-election-jhajha-banka-seat-battle-2025/
सीटों के लिहाज़ से जन सुराज का प्रदर्शन भले ही छोटा हो, लेकिन राजनीतिक विमर्श के लिहाज़ से यह बड़ा है। इसने कुछ सीटों पर गठबंधनों का खेल बिगाड़ा होगा और भविष्य में बिहार की राजनीति को पारंपरिक MY-फैक्टर्स से हटाकर विकास और सुशासन की ओर मोड़ने का प्रयास किया है।








