एक्सप्लेनर: AI के दौर में UPSC क्यों “समय की बर्बादी” लगती है?
संजीव सान्याल के तर्क और उससे उठती बड़ी बहस
भारत में UPSC (Union Public Service Commission) केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतीक बन चुकी है—सुरक्षा, प्रतिष्ठा और सत्ता तक पहुंच का प्रतीक। लेकिन इसी “पवित्र” मानी जाने वाली परीक्षा पर अब प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (PM-EAC) के सदस्य और अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने सीधा सवाल खड़ा कर दिया है।
उनका दावा है—
AI और तेज़ी से बदलती अर्थव्यवस्था के दौर में UPSC की अंधभक्ति समय और मानव क्षमता की बर्बादी बनती जा रही है।
🧠 संजीव सान्याल UPSC को समय की बर्बादी क्यों मानते हैं?
1️⃣ अत्यंत कम सफलता दर, अत्यधिक जोखिम
संजीव सान्याल का सबसे बड़ा तर्क है—Risk vs Reward का असंतुलन।
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हर साल 10–12 लाख से अधिक उम्मीदवार
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चयन होते हैं लगभग 800–1000
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यानी सफलता दर 0.1% से भी कम
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99% से अधिक असफलता
सान्याल के अनुसार:
“अगर आप इतनी बड़ी अनिश्चितता झेल रहे हैं, तो वह स्थिरता की नौकरी कैसे हो सकती है?”
वे इसे career lottery जैसा मानते हैं, जहां लाखों युवा अपने सबसे उत्पादक साल दांव पर लगा देते हैं।
https://x.com/ArtiSharma001/status/2006190247806394649?s=20
2️⃣ ‘Professional UPSC Aspirants’ की समस्या
सान्याल स्पष्ट करते हैं कि उनकी आलोचना—
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न तो ईमानदार सिविल सर्वेंट्स पर है
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न ही एक-दो प्रयास करने वालों पर
बल्कि निशाना है:
“Professional UPSC aspirants”
जो 5–7–10 साल सिर्फ एक परीक्षा के पीछे लगा देते हैं।
उनके मुताबिक:
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यह मानव पूंजी (human capital) का नुकसान है
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अर्थव्यवस्था को काम करने योग्य युवा देर से मिलते हैं
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असफलता की स्थिति में व्यक्ति न कौशल में फिट होता है, न बाजार में
3️⃣ UPSC की मानसिकता: Status > Skills
सान्याल मानते हैं कि UPSC के प्रति आकर्षण कौशल नहीं, सामाजिक स्टेटस से पैदा होता है।
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सरकारी पद = रुतबा
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अफसर = सामाजिक सुरक्षा
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जोखिम से बचने की मानसिकता
AI-युग में, उनके अनुसार:
“जो व्यवस्था जोखिम से बचना सिखाती है, वह नवाचार पैदा नहीं कर सकती।”
4️⃣ विश्वविद्यालय और कोचिंग: समय से पीछे
UPSC की तैयारी सीधे तौर पर भारत की यूनिवर्सिटी व्यवस्था से जुड़ी है।
सान्याल का आरोप:
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लेक्चर-आधारित शिक्षा
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जड़ पाठ्यक्रम
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वास्तविक दुनिया से कटाव
उनका दावा:
“AI आज किसी भी यूनिवर्सिटी प्रोफेसर से बेहतर, तेज़ और अपडेटेड ज्ञान दे सकता है।”
ऐसे में वर्षों तक:
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क्लासरूम
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नोट्स
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रटंत
को वे अप्रासंगिक मानते हैं।

5️⃣ Apprenticeship और Early Work का विकल्प
संजीव सान्याल का समाधान है—
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जल्दी काम शुरू करो
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साथ में लचीली, ऑनलाइन पढ़ाई
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मॉड्यूलर डिग्री
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जब तैयार हों, तब परीक्षा
उनका मानना है कि:
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इतिहास में भी अधिकांश लोग बिना विश्वविद्यालय गए सफल रहे
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उच्च शिक्षा कभी भी सबके लिए नहीं थी
📜 क्या UPSC पर पहले भी सवाल उठे हैं?
हां, लेकिन इतनी तीव्रता से नहीं
संजीव सान्याल पहले व्यक्ति नहीं हैं जिन्होंने UPSC प्रणाली पर सवाल उठाए हों।
🔹 1️⃣ पूर्व नौकरशाहों की आलोचना
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टी.एन. शेषन, एन. विट्ठल, ई.ए.एस. सरमा जैसे अफसरों ने कहा:
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UPSC चयन करता है, लेकिन ट्रेनिंग सिस्टम कमजोर है
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जनरलिस्ट मॉडल सीमित हो चुका है
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🔹 2️⃣ द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC)
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ARC ने सिफारिश की थी:
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lateral entry
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domain expertise
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continuous assessment
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यह अप्रत्यक्ष रूप से UPSC की सीमाओं की स्वीकारोक्ति थी।
🔹 3️⃣ निजी क्षेत्र और स्टार्टअप जगत की राय
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नंदन निलेकणी, नारायण मूर्ति जैसे लोग कह चुके हैं:
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भारत को अफसर नहीं, problem solvers चाहिए
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कौशल आधारित शासन जरूरी है
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🔹 4️⃣ नई शिक्षा नीति (NEP 2020)
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मल्टी-एंट्री, मल्टी-एग्ज़िट
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स्किल्स पर जोर
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लचीली शिक्षा
यह भी संकेत है कि पुरानी रेखीय (linear) career सोच टूट रही है।
⚖️ आलोचना बनाम यथार्थ: UPSC पूरी तरह अप्रासंगिक?
यहां संतुलन जरूरी है।
✔ UPSC आज भी प्रासंगिक है:
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नीति निर्माण
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संविधानिक संस्थाएं
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सार्वजनिक प्रशासन
❌ लेकिन समस्या तब है जब:
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UPSC को एकमात्र सम्मानजनक करियर माना जाए
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असफलता को सामाजिक अपमान समझा जाए
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युवा वर्षों तक वैकल्पिक कौशल न सीखें
🔚 निष्कर्ष: असली बहस UPSC नहीं, ‘Career Mindset’ की है
संजीव सान्याल का बयान केवल UPSC पर हमला नहीं है, बल्कि एक wake-up call है—
क्या भारत अपने युवाओं को
21वीं सदी की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार कर रहा है
या
20वीं सदी के सपनों में फंसा रहा है?
UPSC रहे या न रहे—
लेकिन एक ही परीक्षा को जीवन का अंतिम सत्य मानने की मानसिकता शायद अब सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।








