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Woman Reservation Bill Reality: चुनावी बिसात पर महिला आरक्षण: हक का ‘कातिल’ कौन? जानें पर्दे के पीछे की सच्चाई

Woman Reservation Bill Reality: भारत के पांच राज्यों के चुनावी समर में ‘महिला आरक्षण’ अचानक एक ऐसा हथियार बन गया है। सत्ता पक्ष यानी भारतीय जनता पार्टी एक ‘ब्रह्मास्त्र’ की तरह इस्तेमाल कर रही है।

इसके लिए चुनावी मंचों से यह स्थापित करने की पुरजोर कोशिश हो रही है कि भाजपा तो महिलाओं को उनका हक देना चाहती थी, लेकिन ‘महिला विरोधी’ विपक्ष ने उनके अधिकारों पर डाका डाल दिया।

मगर, सियासत के इस तिलिस्म के पीछे का गणित कुछ और ही कहानी बयां करता है।

संख्या बल का गणित और ‘ट्रैप’ की राजनीति

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि भाजपा और उसके रणनीतिकार भली-भांति जानते थे कि संशोधन बिल के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाना उनके लिए नामुमकिन था। तो क्या यह विपक्ष को घेरने के लिए बुनी गई एक सोची-समझी ‘व्यूह रचना’ थी?

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह सीधे तौर पर कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन को ‘कठघरे’ में खड़ा करने का एक चुनावी दांव था।

2023 के विधेयक का रहस्यमयी टाइमिंग

सबसे बड़ा सवाल उस अधिसूचना (Notification) पर उठता है, जो 2023 में पारित हुए मूल विधेयक को लागू करने के लिए, नए संशोधन बिल को पेश करने से ठीक एक रात पहले आनन-फानन में जारी की गई।

सवाल लाजिमी है—अगर तीन साल तक भाजपा नीत एनडीए इस विधेयक पर ‘कुंभकर्णी नींद’ सोई रही, तो चुनाव आते ही अचानक यह सक्रियता क्यों? क्या तीन साल तक महिलाओं के हितों की अनदेखी नहीं हुई?

https://x.com/Bearded_ngineer/status/2045209504003051709?s=20

विपक्ष के सिर ठीकरा फोड़ने की रणनीति

सच्चाई यह है कि संशोधन बिलों की खामियों और उन पर सहमति न बन पाने की आशंका से सत्ता पक्ष पहले से परिचित था। बावजूद इसके, इसे एक मुद्दे के रूप में उछालना यह संकेत देता है कि मंशा आरक्षण देने से ज्यादा, विपक्ष को ‘महिला विरोधी’ साबित करने की थी।

जब नीयत साफ हो, तो अधिसूचना जारी करने में तीन साल का लंबा इंतजार नहीं किया जाता।

‘लोकल पर फोकल’ और जमीनी हकीकत

आज के दौर में जब सूचनाएं गूगल और सोशल मीडिया पर तैर रही हैं, मतदाता यह समझ रहा है कि ‘नयापन’ कहां है और ‘प्रोपेगेंडा’ कहां। जैसा कि पत्रकारिता का सिद्धांत है—सत्य को बिना लाग-लपेट के कहना।

वर्तमान परिदृश्य में भाजपा की यह रणनीति चुनावी लाभ दिलाने में कितनी कारगर होगी, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इसने ‘हक और राजनीति’ के बीच की धुंधली रेखा को जरूर साफ कर दिया है।

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 चुनावों में महिलाओं के प्रति ‘अचानक उपजा यह प्रेम’ कहीं केवल कागजी प्रलाप तो नहीं? क्योंकि जिस हक को तीन साल तक दबाए रखा गया, उसे ऐन चुनाव के वक्त ‘विपक्ष की वजह से रुका हुआ’ बताना एक चतुर राजनीतिक चाल तो हो सकती है, लेकिन इसे पारदर्शी शासन नहीं कहा जा सकता।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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