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AI Summit Youth Protest: विदेशी मीडिया ने ‘भारत-विरोध’ नकारा

AI Summit Youth Protest: असहमति ‘भारत-विरोध’ नहीं, युवा बेचैनी का संकेत

AI Summit Youth Protest: नई दिल्ली के AI समिट में हुए युवा विरोध को लेकर देश के भीतर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखी गई। सत्तापक्ष ने इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को नुकसान पहुँचाने वाला कृत्य बताया, जबकि विपक्ष ने इसे बेरोजगारी और अवसर संकट की ओर ध्यान खींचने की कोशिश कहा। किंतु अंतरराष्ट्रीय मीडिया की प्रतिक्रिया इस घरेलू राजनीतिक ध्रुवीकरण से भिन्न रही। वैश्विक कवरेज में यह घटना मुख्यतः लोकतांत्रिक असहमति और युवा बेचैनी की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आई—न कि भारत-विरोधी गतिविधि के रूप में।

विदेशी रिपोर्टों में एक साझा तत्व दिखाई देता है: भारत का युवा वर्ग अब विकास-विमर्श का मौन दर्शक नहीं रहना चाहता। तकनीकी प्रगति और वैश्विक नेतृत्व के दावों के समानांतर वह अपने वास्तविक अवसर, रोजगार और भागीदारी के प्रश्नों को सामने लाना चाहता है। AI जैसे भविष्य-केन्द्रित मंच पर वर्तमान की बेचैनी का उभरना इसी विरोधाभास का प्रतीक माना गया।

यह भी उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों ने इस घटना को किसी राष्ट्र-विरोधी भाव से नहीं जोड़ा। बल्कि इसे उसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना गया जिसमें समाज के भीतर दबे प्रश्न कभी-कभी प्रत्यक्ष और असुविधाजनक रूप में सामने आते हैं। वैश्विक दृष्टि में बड़े आयोजनों के दौरान विरोध का उभरना लोकतांत्रिक समाजों में असामान्य नहीं माना जाता; इसे राजनीतिक तनाव का संकेत तो समझा जाता है, पर राष्ट्र की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जाता।

दरअसल, यहाँ दो नैरेटिवों का टकराव स्पष्ट दिखता है। पहला—राज्य-केन्द्रित, जिसमें राष्ट्रीय छवि सर्वोपरि है और विरोध को अनुशासनहीनता के फ्रेम में देखा जाता है। दूसरा—समाज-केन्द्रित, जिसमें असहमति को लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का संकेत माना जाता है। विदेशी मीडिया का झुकाव दूसरे दृष्टिकोण की ओर अधिक दिखाई दिया।

इस प्रसंग ने एक और सामाजिक प्रवृत्ति को उजागर किया है। जब भी कोई विरोध सत्तापक्ष को असहज करता है, उसे व्यापक राष्ट्रहित के विरुद्ध सिद्ध करने का प्रयास तेज हो जाता है। इससे समर्थन और विरोध की रेखाएँ कठोर हो जाती हैं, और मूल प्रश्न—युवा असंतोष—पृष्ठभूमि में चला जाता है। अंतरराष्ट्रीय कवरेज ने इसी बिंदु पर भिन्नता दिखाई; उसने घटना को राजनीतिक निष्ठा के बजाय सामाजिक संदर्भ में पढ़ा।

युवा गूंगा बहरा दर्शक नहीं

वास्तविकता यह है कि भारत का युवा अब गूंगा-बहरा दर्शक नहीं है। वह अपनी आवाज़ उठाना, उसे सही मंच तक पहुँचाना और जोखिम लेकर भी दर्ज कराना जानता है। विरोध का तरीका विवादित हो सकता है, परंतु उसके कारणों की उपेक्षा अधिक गंभीर भूल हो सकती है। विदेशी मीडिया ने इसी तथ्य को रेखांकित किया—कि तकनीकी महत्वाकांक्षा के साथ-साथ सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव भी बढ़ रहा है।

https://tesariaankh.com/politics-ai-summit-protest-youth-power-politics-analysis/

लोकतंत्र में यह समझना आवश्यक है कि असहमति को दबाने से छवि क्षणिक रूप से बच सकती है, पर समस्या स्थगित ही होती है। स्वीकार और संवाद से ही स्थिरता आती है। AI समिट का युवा विरोध वैश्विक विमर्श में इसी रूप में पढ़ा गया—एक ऐसे समाज के संकेत के रूप में जहाँ नई पीढ़ी सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखती है।

https://x.com/Politicx2029/status/2025082825670906186?s=20

अंततः यह घटना भारत-विरोध नहीं, बल्कि उस जीवंत लोकतांत्रिक ऊर्जा का द्योतक है जिसमें नागरिक—विशेषकर युवा—अपनी उपस्थिति और हिस्सेदारी का दावा करते हैं। और किसी भी लोकतंत्र के लिए यह चेतावनी नहीं, बल्कि अवसर होना चाहिए कि वह असहमति को व्यवधान नहीं, संवाद का प्रारंभ माने।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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