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UP Board Relevance for Competitive Exams: क्या उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद अपनी प्रासंगिकता खो रहा है?

UP Board Relevance for Competitive Exams: 2026 की बोर्ड परीक्षाओं के पहले दिन तीन लाख से अधिक छात्रों का अनुपस्थित रहना और परीक्षा केंद्रों की संख्या में कमी—ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि एक गहरे संक्रमण का संकेत हैं। नकल पर सख्ती, सीसीटीवी निगरानी, “मुन्ना भाई” पर कार्रवाई और पारदर्शिता की नई व्यवस्था ने परीक्षा को अधिक विश्वसनीय बनाया है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हुआ है—क्या बोर्ड की यह सख्ती गुणवत्ता में भी तब्दील हो रही है?

देश का सबसे बड़ा बोर्ड, लेकिन क्या सबसे सक्षम?

यूपी बोर्ड आज भी देश का सबसे बड़ा बोर्ड है। 2026 में 53 लाख से अधिक छात्र हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा में शामिल हुए। संख्या के लिहाज से यह विराट है, पर गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मक तैयारी के पैमाने पर क्या यह उतना ही मजबूत है?

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आज का छात्र सिर्फ 10वीं-12वीं पास करना नहीं चाहता; वह प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होना चाहता है—चाहे वह Joint Entrance Examination (JEE) हो, National Eligibility cum Entrance Test (NEET), Common Law Admission Test (CLAT) या फिर National Defence Academy and Naval Academy Examination (NDA)। इसके अलावा CA, CS या सरकारी नौकरियों की तैयारी भी उसके लक्ष्य में शामिल है।

मूल प्रश्न: बोर्ड की परीक्षा बनाम प्रतियोगी परीक्षा

कई छात्रों का अनुभव है कि हाईस्कूल या इंटरमीडिएट पास करने के बाद भी उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी “शून्य” से शुरू करनी पड़ती है। अगर छात्र को यह लगे कि बोर्ड की पढ़ाई प्रतियोगी परीक्षा के लिए पर्याप्त आधार नहीं देती, तो यह चिंता का विषय है।

  • बोर्ड परीक्षाएं अभी भी मुख्यतः वर्णनात्मक (descriptive) और रटंत-आधारित पैटर्न पर केंद्रित हैं।
  • जबकि JEE/NEET जैसी परीक्षाएं कॉन्सेप्ट आधारित, एप्लीकेशन और विश्लेषणात्मक क्षमता पर जोर देती हैं।
  • NDA जैसी परीक्षाएं गणित के साथ-साथ जनरल एबिलिटी और समसामयिक ज्ञान की गहराई मांगती हैं।

अगर दोनों के बीच पाठ्यक्रम, मूल्यांकन शैली और कठिनाई स्तर में बड़ा अंतर है, तो छात्र को कोचिंग पर निर्भर होना ही पड़ेगा।

क्या यह बोर्ड की विफलता है?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि बोर्ड असफल है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि:

  1. सिलेबस और परीक्षा पैटर्न में सामंजस्य की कमी है।
  2. योग्यता-आधारित शिक्षा (Competency Based Education) की दिशा में बदलाव अभी प्रारंभिक चरण में है।
  3. स्कूल स्तर पर प्रयोगशाला, प्रोजेक्ट-आधारित सीखने और विश्लेषणात्मक सोच पर अपेक्षित जोर नहीं है।

यदि छात्र 12वीं के बाद खुद को “अप्रासंगिक” महसूस करता है, तो यह संकेत है कि बोर्ड को अपनी भूमिका सिर्फ प्रमाणपत्र देने तक सीमित नहीं रखनी चाहिए।

क्या यूपी बोर्ड को “कॉम्पिटिटिव ओरिएंटेड” बनना होगा?

यह जरूरी नहीं कि बोर्ड सीधे कोचिंग संस्थानों की तरह JEE या NEET की तैयारी कराए। लेकिन यह आवश्यक है कि:

  • प्रश्नपत्रों में MCQ और एप्लीकेशन-आधारित सवालों का अनुपात बढ़े।
  • गणित और विज्ञान में उच्च स्तरीय सोच (HOTS) आधारित प्रश्न शामिल हों।
  • करियर काउंसलिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की बुनियादी समझ स्कूल स्तर पर दी जाए।
  • NDA, CLAT, CA जैसी परीक्षाओं के अनुरूप तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता विकसित की जाए।

सख्ती से पारदर्शिता तक—अब अगला कदम गुणवत्ता

नकल पर नियंत्रण और परीक्षा की शुचिता सुनिश्चित करना एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन पारदर्शिता के बाद अगला चरण प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का होना चाहिए। अगर यूपी बोर्ड अपने पाठ्यक्रम और मूल्यांकन को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुरूप संतुलित करता है, तो यह बदलाव ऐतिहासिक हो सकता है।

अस्तित्व नहीं, प्रासंगिकता की लड़ाई

यूपी बोर्ड का अस्तित्व खतरे में नहीं है, लेकिन उसकी प्रासंगिकता पर बहस जरूरी है।
सवाल यह नहीं कि बोर्ड खत्म हो रहा है या नहीं—सवाल यह है कि क्या वह 21वीं सदी के प्रतिस्पर्धी भारत के लिए विद्यार्थियों को तैयार कर पा रहा है?

https://x.com/nbaburam/status/1919559627299074533?s=20

अगर उत्तर “आंशिक” है, तो सुधार की गुंजाइश अभी भी खुली है।
और शायद यही समय है जब यूपी बोर्ड को सिर्फ “सबसे बड़ा बोर्ड” नहीं, बल्कि “सबसे सक्षम बोर्ड” बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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