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Narendra Modi Political Crisis: क्या मोदी अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर में हैं?

Narendra Modi Political Crisis: भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व लंबे समय से एक सशक्त, निर्णायक और नियंत्रणकारी नेतृत्व का प्रतीक रहा है। किंतु हाल के घटनाक्रमों ने विपक्ष और विश्लेषकों को यह प्रश्न उठाने का अवसर दिया है कि क्या मोदी अपने अब तक के सबसे जटिल राजनीतिक दौर में प्रवेश कर चुके हैं। संसद के भीतर बढ़ती आक्रामकता, अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुछ घोषणाओं का भारत के बजाय अन्य देशों के नेताओं द्वारा किया जाना, और घरेलू राजनीतिक विवाद—इन सबने सत्ता की धारणा और वास्तविक नियंत्रण के बीच अंतर पर बहस छेड़ दी है।

संसद में बढ़ता दबाव और नैरेटिव की चुनौती

विपक्ष ने हाल के महीनों में कई मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास किया है—पूर्व सेना प्रमुख की पुस्तक के कथित संदर्भ, केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी से जुड़े अंतरराष्ट्रीय आरोपों की चर्चा, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल, और संसद सुरक्षा से जुड़े प्रसंग। इन मुद्दों का राजनीतिक प्रभाव तथ्यात्मक सत्यता से उतना नहीं जितना उनके “नैरेटिव वैल्यू” से बनता है। विपक्ष का उद्देश्य मोदी की अजेयता की छवि को चुनौती देना है—जो 2014 से भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी रही है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में प्रतीकात्मक असंतुलन

हालिया वैश्विक परिदृश्य में कुछ घोषणाएँ—जैसे भारत-अमेरिका व्यापार समझ या क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर बयान—अन्य देशों के नेताओं की ओर से पहले सामने आना, भारत में राजनीतिक चर्चा का विषय बना। आलोचकों ने इसे “कूटनीतिक प्रोटोकॉल” के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि समर्थक इसे वैश्विक शक्ति संतुलन और बहुपक्षीय कूटनीति की सामान्य प्रक्रिया बताते हैं।

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यथार्थ यह है कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में घोषणाओं की टाइमिंग अक्सर रणनीतिक होती है; इससे नेतृत्व की वास्तविक भूमिका स्वतः कम नहीं हो जाती, पर राजनीतिक धारणा अवश्य प्रभावित होती है।

क्या मोदी की स्वायत्तता कम हुई है?

यह तर्क कि प्रधानमंत्री “कठपुतली” बन गए हैं, राजनीतिक भाषा का अतिशयोक्तिपूर्ण रूप अधिक है। भारतीय शासन संरचना में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) आज भी अत्यंत केंद्रीकृत और प्रभावशाली माना जाता है। रक्षा, विदेश, आर्थिक नीति और चुनावी रणनीति—इन सभी में अंतिम राजनीतिक दिशा अभी भी मोदी और उनके करीबी नेतृत्व समूह से ही निर्धारित होती है।

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हाँ, तीसरे कार्यकाल (या दीर्घकालिक शासन) की स्वाभाविक चुनौती यह होती है कि सत्ता-विरोधी ऊर्जा (anti-incumbency) और संस्थागत थकान उभरती है। यही वह चरण है जहाँ विपक्ष अधिक आक्रामक और सहयोगी दल अधिक मोलभाव करने लगते हैं—जिससे नेतृत्व की “पूर्ण नियंत्रण” वाली छवि स्वाभाविक रूप से नरम पड़ती है।

राजनीतिक धारणा बनाम वास्तविक शक्ति

राजनीति में अक्सर वास्तविक शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण उसकी सार्वजनिक धारणा होती है। यदि विपक्ष यह स्थापित कर देता है कि सरकार घटनाओं पर प्रतिक्रिया कर रही है, नेतृत्व नहीं कर रही—तो वह मनोवैज्ञानिक बढ़त बना सकता है। वर्तमान में मोदी सरकार इसी धारणा-युद्ध (perception battle) से जूझती दिखती है।
फिर भी, चुनावी राजनीति में अंतिम कसौटी जनसमर्थन है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का संगठन, संसाधन, और मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी भी विपक्ष से आगे मानी जाती है। इसलिए “सबसे कठिन दौर” का निष्कर्ष राजनीतिक विमर्श में तो उभर सकता है, पर संस्थागत शक्ति संतुलन में अभी निर्णायक परिवर्तन नहीं दिखता।

वर्तमान परिदृश्य नरेंद्र मोदी के लिए चुनौतीपूर्ण अवश्य है—विशेषकर छवि और नैरेटिव के स्तर पर। संसद में आक्रामक विपक्ष, अंतरराष्ट्रीय घोषणाओं की प्रतीकात्मक राजनीति, और घरेलू विवाद—इन सबने उनकी सर्वशक्तिमान नेतृत्व की धारणा को पहली बार व्यवस्थित तरीके से चुनौती दी है।
लेकिन उपलब्ध संकेतों के आधार पर यह कहना कि मोदी “कठपुतली प्रधानमंत्री” बन गए हैं, राजनीतिक अतिशयोक्ति अधिक प्रतीत होता है। अधिक सटीक निष्कर्ष यह होगा कि वे अपने राजनीतिक करियर के उस चरण में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ नियंत्रण बनाए रखने से अधिक चुनौती उसे लगातार सिद्ध करते रहने की होती है। यही किसी भी लंबे समय तक शासन करने वाले नेता की वास्तविक परीक्षा होती है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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