Crowd Politics: हमारे देश में पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी या अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं को सुनने के लिए भीड़ स्वतः उमड़ती थी। लोगों को बसों में भरकर, कर्मचारियों या शिक्षकों को बाध्य करके सभाओं में नहीं लाया जाता था। इन नेताओं की अपनी विशिष्ट शैली थी; उनके शब्दों में मर्म होता था, दृष्टि होती थी, और भविष्य के निर्माण का आह्वान होता था।
आज आश्चर्य होता है कि देश को बोलने वाला प्रधानमंत्री तो मिल गया, पर सुनने वाले लोग स्वाभाविक रूप से नहीं मिल पा रहे। प्रारंभ में लोगों को विश्वास था कि शायद अटलजी की कमी पूरी होगी, या इंदिरा गांधी जैसे दृढ़ तेवर देखने को मिलेंगे। पर धीरे-धीरे मोहभंग होता गया।
हाल में लखनऊ में प्रधानमंत्री की एक सभा हुई। इस सभा के लिए प्रदेश के अनेक बेसिक स्कूलों के शिक्षक-शिक्षिकाओं को बसों में भरकर लाया गया। शहर की ओर आने वाले रास्ते लगभग बंद थे; आम जन का आवागमन ठप था, और केवल बसों का काफिला सभा स्थल की ओर बढ़ रहा था। सभा समाप्त होने के बाद भी यातायात को इस प्रकार नियंत्रित किया गया कि बसों को प्राथमिकता से निकाला जा सके। यदि यह भीड़ न जुटाई जाती, तो संभवतः श्रोताओं की संख्या नगण्य रहती।
अटल बिहारी वाजपेयी जननेता का स्वरूप
अटल बिहारी वाजपेयी का कद ऐसा था कि वे सत्ता में हों या न हों, जनमानस में प्रतिष्ठित रहते थे। उनकी लोकप्रियता स्वाभाविक थी, प्रचारजनित नहीं। जवाहरलाल नेहरू भी जनप्रिय नेता थे। उस समय न ज़ेड-प्लस सुरक्षा का घेरा था, न ब्लैक-कैट कमांडो की दीवारें। मेरे स्वर्गीय पिताजी मधुसूदन वाजपेयी बताया करते थे कि जब वे सप्तर्षि आश्रम संस्कृत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य थे, तब एक दिन नेहरूजी का काफिला उधर से गुज़रा। खुली जीप में सीमित सुरक्षा के बीच मुस्कुराते हुए वे लोगों का अभिवादन कर रहे थे। मेरे बड़े भाई, जो उस समय तीन-चार वर्ष के थे, को देखकर उन्होंने जीप रुकवाई, उतरकर उन्हें गुलाब की कली दी और स्नेह से गाल थपथपाया। भाई ने तुरंत कहा—“नेहरू जी!”—और वे मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए। यही सादगी और आत्मीयता उन्हें जननेता बनाती थी।
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इंदिरा गांधी में भी ऐसी ही सरलता और दृढ़ता का अद्भुत संगम था। डॉ. मनमोहन सिंह भाषण कला में प्रखर नहीं थे, पर उच्च शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में उनके कार्यकाल का विस्तार उल्लेखनीय रहा। मनरेगा जैसी योजना ने ग्रामीण भारत को कठिन समय में सहारा दिया।
कल्पना में सुख देने की राजनीति
आज हम 2047 के भारत की कल्पना के नारों में जी रहे हैं। दूर भविष्य के वादों को स्वीकार करने की कोशिश कर रहे हैं—ऐसे समय के लिए, जब न हम होंगे न हमारी पीढ़ी। वर्तमान में समाज का जो यथार्थ दिख रहा है, वह अधिक चिंताजनक है: सांप्रदायिक विभाजन, जातीय खांचे, और आपसी अविश्वास। यह प्रवृत्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरनाक संकेत है।
सत्ता स्थायी नहीं होती; न कोई उसे साथ लेकर गया है, न लेकर जाएगा। “केवल मैं ही सही हूँ और पूरा समाज गलत है”—यह धारणा लोकतंत्र के लिए घातक है। सत्ता से उतरने के बाद यदि समाज आपको याद न करे, तो वह किसी भी नेता के लिए सबसे बड़ी विफलता होगी। नाम बदल देने से काम नहीं बदलता। जनता अब सजग है; यह सत्य स्वीकार करना ही होगा।
देश का भविष्य केवल राजधानी या महानगरों की चमक से नहीं बदलता। युवाशक्ति को उसकी योग्यता के अनुरूप अवसर देना होगा। इंजीनियर मोबाइल मैकेनिक नहीं बनेगा, डॉक्टर कंपाउंडर का काम नहीं करेगा। निजीकरण अपने-आप में बुरा नहीं, पर यदि वह श्रम का अवमूल्यन कर दिहाड़ी-निर्भर असुरक्षा पैदा करे, तो वह अन्याय है। कार्य के अनुरूप वेतन और सम्मान मिलना चाहिए।
जीना मुहाल है आप कहते हैं आमदनी दोगुनी कर दी
आय दोगुनी होने के दावे तब सार्थक होंगे जब वे ज़मीनी जीवन में दिखें। मुफ्त अनाज देकर जय-जयकार की अपेक्षा करना समाज को निर्भर बनाना है। हर हाथ को सम्मानजनक काम और उचित मजदूरी मिले, तो लोग अपना अन्न स्वयं खरीद लेंगे—और राष्ट्र भी आत्मनिर्भर बनेगा।
इतिहास गवाह है: बाहरी शासकों द्वारा बनाए गए पुल आज भी टिके हैं, पर हमारे बनाए ढाँचे ढह जाते हैं। रेलपथों का विस्तार भी अपेक्षित गति से नहीं हुआ। इससे स्पष्ट है कि राष्ट्रनिर्माण केवल घोषणाओं से नहीं, गुणवत्ता और ईमानदार श्रम से होता है।
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अंततः लोकतंत्र का मापदंड भीड़ नहीं, विश्वास है। काम ऐसे होने चाहिए जो मिसाल बनें—तभी सत्ता से परे भी सम्मान बना रहता है, और वही किसी नेता की सच्ची विरासत होती है।








