World Radio Day: जब मैं बहुत छोटा था, उस समय मेरे पिताजी दैनिक जागरण के सम्पादकीय विभाग में थे। वह दौर ऐसा था जब सूचना का सबसे सशक्त माध्यम रेडियो माना जाता था। उन्हीं दिनों अख़बार के मालिक नरेंद्र मोहन ने पिताजी को एक रेडियो भेंट किया। आज यह साधारण-सी बात लगे, पर 1970–71 के आसपास रेडियो हर घर में नहीं होता था; वह सम्मान और आधुनिकता का प्रतीक था।
सुबह होते ही रेडियो बजना शुरू हो जाता—समाचार, भजन, फिल्मी गीत—और रात में लोकप्रिय कार्यक्रम हवा महल तक घर में गूंज बनी रहती। तब मुख्यतः आकाशवाणी और विविध भारती के प्रसारण सुने जाते थे, साथ में Radio Ceylon भी बड़े चाव से लगाया जाता था। क्रिकेट मैचों के दौरान तो पान की दुकानों पर भीड़ लग जाती; रेडियो कमेंट्री मैदान की हर घटना को लोगों के दिलों तक पहुँचा देती थी। आवाज़ के सहारे दृश्य रचने की वह कला आज भी बेजोड़ है।
सूचना-सम्प्रेषण की गति तब भी तेज मानी जाती थी, हालांकि भूलें भी होती थीं। एक बार सोहनलाल द्विवेदी के निधन की गलत खबर छप गई। वे उसी समय कानपुर में थे। खबर पढ़कर सब स्तब्ध रह गए। तत्क्षण आकाशवाणी से खंडन प्रसारित हुआ और सच्चाई तेजी से जन-जन तक पहुँची—यह रेडियो की विश्वसनीयता और पहुँच का प्रमाण था।
राष्ट्रीय घटनाओं में भी रेडियो अग्रणी रहा। BBC World Service को सबसे तेज और भरोसेमंद माना जाता था। संजय गांधी और इंदिरा गांधी के निधन की खबरें सबसे पहले बीबीसी से ही सुनने को मिलीं—यह उस समय की मीडिया प्रतिस्पर्धा और तत्परता का संकेत था।
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समय के साथ टीवी चैनलों और डिजिटल मीडिया के उदय ने शहरी जीवन में रेडियो की जगह कम कर दी, लेकिन ग्रामीण भारत में—जहाँ बिजली या नेटवर्क की दिक्कतें हैं—रेडियो आज भी भरोसे का साथी है। ट्रांजिस्टर की छोटी-सी दुनिया में समाचार, मनोरंजन और समाज का स्पंदन एक साथ मिलता है।
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रेडियो दिवस हमें याद दिलाता है कि तकनीक बदलती रहती है, पर आवाज़ का भरोसा नहीं बदलता। रेडियो सिर्फ उपकरण नहीं, स्मृतियों, विश्वसनीयता और संवाद की परंपरा है—एक ऐसी आवाज़, जिसने पीढ़ियों को जोड़ा है।








