वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

Hindu politics and Sanatan truth: हिन्दू की ठेकेदारी, सनातन का सच और सियासत का मोहरा कौन

Hindu politics and Sanatan truth: हिन्दू और सनातन—ये दोनों शब्द आज जितने बहस के केंद्र में हैं, उतने शायद कभी नहीं रहे। प्रश्न उठता है कि क्या ये दोनों एक हैं या अलग-अलग? क्या “हिन्दू” कोई धर्म है? यदि नहीं, तो हिन्दू कौन है?

वर्तमान परिदृश्य में एक ओर वे लोग हैं जो स्वयं को “हिन्दू धर्म” का अलंबरदार बताते हैं और हिन्दू को एक विशिष्ट, सीमाबद्ध धार्मिक पहचान के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। दूसरी ओर वे लोग हैं जो “सनातन” को एक व्यापक जीवन-दृष्टि और शाश्वत परंपरा मानते हैं। विडंबना यह है कि कई बार वही लोग, जो स्वयं को हिन्दुओं का हितैषी बताते हैं, सनातन की व्यापक अवधारणा का विरोध करते दिखाई देते हैं। इस समूची उठापटक में सबसे हास्यास्पद स्थिति तब बनती है जब “हिन्दू” शब्द की व्याख्या राजनीतिक सुविधा के अनुसार की जाने लगती है—मानो एक नया धर्म गढ़ा जा रहा हो।

इतिहास की दृष्टि से देखें तो “हिन्दू” शब्द मूलतः भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ था। यह शब्द सिन्धु नदी के पार रहने वाले लोगों के लिए बाहरी सभ्यताओं द्वारा प्रयुक्त हुआ। अर्थात् यह एक क्षेत्रीय संकेतक था, ठीक वैसे ही जैसे गुजराती, मद्रासी, बिहारी या यूपी वाले—जो भौगोलिक संबोधन हैं, धर्म नहीं।

सनातन जीवन पद्धतियां

इस क्षेत्र में जन्मी जीवन-पद्धतियाँ—वैदिक, शैव, वैष्णव, शाक्त परंपराएँ—समय के साथ अनेक धाराओं में विकसित हुईं। आगे चलकर जैन, बौद्ध, सिख, ब्रह्म समाज, आर्य समाज जैसी परंपराएँ भी इसी सांस्कृतिक भूमि से निकलीं। इन सबमें मतभेद रहे, पर जीवन-दृष्टि का मूल तत्व—सहअस्तित्व—समान रहा। शैव, शाक्त और वैष्णव जैसे मत अंततः परस्पर घुल-मिल गए। आज जो विष्णु को मानता है, वह शिव को भी नकारता नहीं; जो शिव का उपासक है, वह देवी का सम्मान भी करता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब “धर्म” और “पंथ” में भेद नहीं किया जाता। धर्म का मूल अर्थ है—धारण करने योग्य गुण या कर्तव्य। सूर्य का धर्म है प्रकाश और उष्णता देना, चंद्रमा का धर्म है शीतलता देना, नदी का धर्म है जल प्रदान करना, वृक्ष का धर्म है फल और छाया देना। उसी प्रकार मनुष्य का धर्म क्या है? सहअस्तित्व, करुणा और मानवता।

पंथ या विचारधारा अलग-अलग हो सकती है—जैन, बौद्ध, सिख, पारसी, इस्लाम, ईसाई, सनातन या वैदिक। किंतु यदि मानव धर्म—सहअस्तित्व—समाप्त हो जाए, तो हर पंथ संघर्ष का माध्यम बन जाता है। जब हम अपने-अपने मत को सर्वोपरि रखकर दूसरे के जीवन में हस्तक्षेप करने लगते हैं, वहीं से टकराव जन्म लेता है।

ये कहां जा रहे हम

आज स्थिति यह है कि हम देवताओं तक को जातियों में बाँटने लगे हैं। राम और कृष्ण की जाति खोजी जा रही है। हमारे देवताओं के नाम के आगे कोई जाति-उपाधि नहीं थी; वह हमारी सामाजिक संरचना की देन है, आध्यात्मिक परंपरा की नहीं। यदि लोग अपनी जाति लिखना बंद कर दें तो पहचानना कठिन हो जाएगा कि कौन किस जाति से है। फिर हम किस आधार पर लड़ रहे हैं?

https://x.com/catale7a/status/1986968837343076681?s=20

जब मानव जाति स्वयं संकटों से घिरी है—पर्यावरण, हिंसा, विभाजन, असहिष्णुता—तब जातीय और सांप्रदायिक संकीर्णताओं में उलझना किस लाभ का? प्रेम और सहअस्तित्व ही भविष्य की सुरक्षा हैं।

भारत के विविध प्रांतों में नाम-लेखन की अलग-अलग परंपराएँ हैं—पंजाब में लोग अपने गाँव का नाम जोड़ते हैं, दक्षिण भारत में पिता का नाम जोड़ा जाता है। ये पहचान की सांस्कृतिक विधियाँ हैं, धर्म नहीं। उसी प्रकार “हिन्दू” भी मूलतः एक सांस्कृतिक-भौगोलिक पहचान थी, न कि एक सीमाबद्ध मत।

अरे बोलने से पहले जान तो लो

इसलिए जो लोग हिन्दू होने का दावा करते हैं, उन्हें पहले यह सोचना चाहिए कि उनका वास्तविक धर्म क्या है। यदि वे मानव धर्म—इंसानियत—को नहीं मानते, तो फिर वे किस धर्म की बात कर रहे हैं?

https://tesariaankh.com/current-afairs-bharat-america-vyapar-samjhauta-virodh-kyon/

आज आवश्यकता है आडंबरों और धकोसलों से बाहर निकलने की। जो जिस मत को मानता है, उसका सम्मान करने की। सहअस्तित्व को जीवन का आधार बनाने की। यही इस भूमि की सबसे बड़ी सीख रही है, और यदि इसे ही “हिन्दू राष्ट्रीयता” कहा जाए, तो उसकी आत्मा विभाजन नहीं, समन्वय होगी।

धर्म के नाम पर लड़ना आसान है, धर्म को जीना कठिन। समय आ गया है कि हम यह समझें—हमारा धर्म क्या है, और हम उसे निभा भी रहे हैं या नहीं।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें