वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

India US trade deal: सोशल मीडिया से सड़क तक विरोध क्यों?

India US trade deal: भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर देश में बहस अब सोशल मीडिया की पोस्ट से निकलकर सड़कों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। किसान संगठनों, विशेषकर संयुक्त किसान मोर्चा (SKM), अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) और अन्य किसान समूहों ने हाल ही में घोषित अंतरिम व्यापार ढांचे को “कृषि क्षेत्र के लिए आत्मसमर्पण” करार दिया है। वहीं कुछ राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया है।

हालांकि सरकार का पक्ष है कि यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने, निर्यात के अवसर खोलने और निवेश को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस प्रक्रिया में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चिंताओं को पर्याप्त महत्व मिला है?

किसानों की मुख्य आपत्तियां क्या हैं?

किसान संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित ढांचे के तहत यदि अमेरिकी कृषि और खाद्य उत्पादों — जैसे सोयाबीन तेल, ज्वार (सॉरघम), डेयरी उत्पाद, फल-मेवे या पशु आहार — पर टैरिफ कम किए गए, तो सस्ते आयात भारतीय बाजार में आ सकते हैं।

उनकी आशंकाएं मुख्यतः तीन बिंदुओं पर केंद्रित हैं:

  1. सस्ते आयात का दबाव: अमेरिकी कृषि बड़े पैमाने पर सब्सिडी आधारित है। यदि कम शुल्क पर आयात हुआ तो भारतीय किसानों की लागत-आधारित खेती प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकती है।
  2. MSP और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर: बाजार में कीमतें गिरने से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की प्रासंगिकता और क्रियान्वयन पर दबाव बढ़ सकता है।
  3. गैर-टैरिफ बाधाएं (Non-Tariff Barriers): संयुक्त बयान में अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाधाएं कम करने की बात कही गई है, जिसे किसान संगठन विरोधाभासी मानते हैं, क्योंकि सरकार सार्वजनिक रूप से कृषि हितों की रक्षा का आश्वासन देती रही है।

किसान नेताओं ने इस मुद्दे पर संसद में विस्तृत बहस की मांग की है और कुछ समूहों ने 12 फरवरी से राष्ट्रव्यापी विरोध कार्यक्रमों की घोषणा की है।

सरकार का संभावित तर्क

सरकार और व्यापार समर्थक वर्ग का तर्क है कि:

  • भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में मजबूत भागीदारी के लिए व्यापारिक समझौते आवश्यक हैं।
  • टैरिफ में समायोजन परस्पर लाभकारी हो सकता है, जिससे भारतीय निर्यात (आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल आदि) को अमेरिकी बाजार में अधिक अवसर मिलें।
  • किसी भी संवेदनशील क्षेत्र पर अंतिम निर्णय से पहले चरणबद्ध और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।

यानी सरकार इसे “रणनीतिक संतुलन” के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, न कि “आत्मसमर्पण” के रूप में।

राजनीतिक विमर्श और आरोप

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे ने तीखा राजनीतिक रंग ले लिया है। कुछ यूजर्स ने इसे “राष्ट्रहित बनाम सत्ता हित” के रूप में प्रस्तुत किया है। कुछ पोस्टों में आरोप लगाया गया कि समझौते की शर्तें पारदर्शी नहीं हैं या जानबूझकर छिपाई जा रही हैं।

हालांकि इन दावों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते आम तौर पर जटिल और चरणबद्ध होते हैं, जिनमें तकनीकी वार्ताएं, कानूनी समीक्षा और संसदीय प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।

फिर भी, पारदर्शिता की मांग लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। जब समझौता कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्र को प्रभावित कर सकता हो, तब व्यापक सार्वजनिक चर्चा की अपेक्षा बढ़ जाती है।

क्या भारत ने कुछ “खोया” है?

यह प्रश्न अभी आंशिक और सैद्धांतिक है, क्योंकि अंतिम शर्तें और उनका वास्तविक प्रभाव समय के साथ स्पष्ट होगा। संभावित चिंताएं हैं:

  • नीतिगत स्वायत्तता में कमी यदि गैर-टैरिफ बाधाएं कम करने का दबाव बढ़ता है।
  • घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा का असंतुलन यदि सब्सिडी वाले आयात बिना सुरक्षा उपायों के आते हैं।
  • राजनीतिक असंतोष यदि किसान समुदाय स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है।

दूसरी ओर, संभावित लाभ भी हो सकते हैं — जैसे निर्यात वृद्धि, निवेश प्रवाह और कूटनीतिक मजबूती।

विरोध क्यों तेज हो रहा है?

  1. हाल के वर्षों में कृषि कानूनों को लेकर हुए आंदोलनों की स्मृति अभी ताजा है।
  2. किसान संगठनों को आशंका है कि व्यापार समझौते के माध्यम से वही प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से न आ जाए।
  3. ग्रामीण आय पहले से दबाव में है; ऐसे में बाजार अस्थिरता का भय अधिक संवेदनशील मुद्दा बन जाता है।

सोशल मीडिया ने इस असंतोष को तेज और व्यापक रूप दिया है। “मेड इन इंडिया बनाम मेड इन यूएस” जैसे नारों ने भावनात्मक अपील पैदा की है, जो भारत बंद जैसे आह्वानों को ऊर्जा दे सकती है।

https://x.com/mistry_rafiq/status/2020481862465196402?s=20

आगे का रास्ता

विश्लेषकों के अनुसार समाधान टकराव नहीं, बल्कि संवाद में है। संभावित संतुलन के उपाय हो सकते हैं:

  • संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखना या उच्च टैरिफ बनाए रखना
  • आयात पर सेफगार्ड क्लॉज और क्वांटिटी कैप
  • घरेलू किसानों के लिए सब्सिडी और समर्थन पैकेज
  • संसद और राज्यों के साथ पारदर्शी चर्चा

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुका है। एक पक्ष इसे वैश्विक अवसर मानता है, तो दूसरा इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संभावित आघात।

https://tesariaankh.com/politics-naye-shram-kanoon-mazdoor-vs-corporate-hit/

अंततः लोकतंत्र में किसी भी बड़े आर्थिक निर्णय की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या वह व्यापक सहमति और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ता है। विरोध की आवाजें यदि तथ्यों और संवाद के साथ जुड़ें, तो वे नीतियों को संतुलित बनाने में सहायक हो सकती हैं — और यही किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें